हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जन सूचना अधिकार का सम्मान

जनसूचना अधिकारी श्री इंद्रजीत विश्वकर्मा, कोषाध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी,इलाहाबाद व मुख्य कोषाधिकारी, इलाहाबाद। आवास-स्ट्रेची रोड, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद कार्यालय-१२ डी,कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
प्रथम अपीलीय अधिकारी श्री प्रदीप कुमार्, सचिव,हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व अपर जिलाधिकारी(नगर्), इलाहाबाद। आवास-कलेक्ट्रेट, इलाहाबाद कार्यालय-१२डी, कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
दूरभाष कार्यालय - (०५३२)- २४०७६२५
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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

काव्य संग्रह- केदार सम्मान के कवि

हिंदुस्तानी एकेडेमी की अनुपम भेंट

‘केदार शोध पीठ न्यास’ द्वारा प्रतिवर्ष समकालीन हिंदी कवियों में से ऐसे कवि को चयनित कर केदार सम्मान प्रदान किया जाता है जिन्होंने अपनी कविता से केदार नाथ अग्रवाल की जातीय काव्य परंपरा, सौंदर्य, प्रेम और संघर्ष की चेतना को आगे बढ़ाया है। वर्ष 1996 से प्रारम्भ किए गये इस पुरस्कार से अबतक चौदह समकालीन रचनाकारों को सम्मानित किया जा चुका है। हिंदुस्तानी एकेडेमी ने गुणवत्तायुक्त साहित्य के प्रकाशन की अपनी समृद्ध परंपरा का निर्वाह करते हुए इन चौदह पुरस्कृत कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन प्रकाशित किया है। इन कवियों का विवरण निम्नवत है:

वर्ष

कवि

पुरस्कृत कृति

1996

नासिर अहमद सिकंदर

जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में

1997

एकांत श्रीवास्तव

अन्न हैं शब्द मेरे

1998

कुमार अंबुज

क्रूरता और अनंतिम

1999

विनोद दास

वर्णमाला से बाहर

2000

गगन गिल

यह आकांक्षा समय नहीं

2001

हरीश चंद्र पांडे

एक बुरूँश कहीं खिलता है

2002

अनिल कुमार सिंह

पहला उपदेश

2003

हेमंत कुकरेती

चाँद पर नाव

2004

नीलेश रघुवंशी

पानी का स्वाद

2005

आशुतोश दुबे

असंभव सारांश

2006

बद्री नारायण

शब्दपदीयम्‌

2007

अनामिका

खुरदुरी हथेलियाँ

2008

दिनेश कुमार शुक्ल

ललमुनिया की दुनिया

2009

अष्टभुजा शुक्ल

दुःस्वप्न भी आते हैं

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हिंदुस्तानी एकेडेमी के सचिव श्री प्रदीप कुमार ने अपने प्रकाशकीय आलेख में इस पुस्तक की उपादेयता पर प्रकाश डाला है। (बड़ा करके पढ़ने के लिए नीचे के आलेख पर क्लिक करें)

प्रकाशकीय प्रकाशकीय-२

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(पिछला आवरण पृष्ठ- सम्पादक त्रयी के परिचय के साथ)

आशा है यह संकलन काव्य साहित्य के पारखी आलोचकों, अध्येताओं, विद्यार्थियों व सामान्य पाठकों, के लिए अत्यंत उपयोगी होगा।

बुधवार, 26 मई 2010

नलविलास-परिशीलन (Nal Vilas Parishilan : Dr. Arun Kumar Tripathi)

नलविलास-परिशीलन
लेखक : डॉ० अरुण कुमार त्रिपाठी
संस्करण : प्रथम २००९ ई०
मूल्य : २२५/- रुपये दो सौ पच्चीस मात्र
प्रकाशक : सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद।
मुद्रक : एकेडेमी प्रेस, दारागंज, इलाहाबाद।
पृष्ठ : ३६२
आकार एवं आवरण : डिमाई सजिल्द

प्रकाशकीय

लौकिक संस्कृत साहित्य में रामायण और महाभारत दो ऐसे उपजीव्य काव्य हैं जिन पर परवर्ती संस्कृत व हिन्दी साहित्य आश्रित रहा है। कवियों ने अपनी कृति के लिए कथानक का चयन बहुधा रामायण व महाभारत के ही विविध प्रसंगों से किया है। यह जरूर है कि कवि की प्रतिभा व मेधा ने उन कथानकों में अपने हिसाब से रस, छन्द, अलंकार, गुण, वृत्ति व रीति का प्रयोग करके उसे अत्यधिक आकर्षक व रुचिकर बना दिया। जैन महाकवि श्री रामचन्द्र सूरि ने महाभारत की नल दमयन्ती की कथा को उपजीव्य बनाकर नलविलास की रचना बारहवीं शताब्दी ई० में की। यद्यपि नलविलास की रचना पर रायण के नल चरित्र वर्णन का भी प्रभाव परिलक्षित होता है। अनेक जैन विद्वानों की भांति श्री रामचन्द्र सूरि की रचनाओं से मां भारती का भण्डार समृद्ध हुआ है। कवि रामचन्द्र सूरि नाटकों के प्राणभूत रसों को चरमोत्कर्ष तक पहुंचाने वाले नाटककार हैं। उनके नाटक की शैली सरल, सुबोध एवं रसवती हैं। रामचन्द्र सूरि के बारे में कहा जाता है कि वे शताधिक ग्रन्थों के रचयिता थे। वे प्रतिभाशाली कवि व नाटककार के साथ-साथ नाट्‌य शास्त्र के भी उद्‌भट आचार्य थे। ये संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचन्द्र के शिष्यों में अग्रणी थे। श्री सूरि जयसिंह सिद्धराज एवं उनके उत्तराधिकारी कुमारपाल की सभा के विद्वानों में अन्यतम थे।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने विगत वर्षों में ऐसे ग्रन्थों के प्रकाशन व पुनर्प्रकाशन का संकल्प लिया है जिनसे सारस्वत भण्डार की अभिवृद्धि होने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन हो। नल विलास परिशीलन ऐसे ही प्रकाशनों की एक कड़ी है। डॉ० अरुण कुमार त्रिपाठी ने अपनी प्रतिभा एवं खोजी वृत्ति के द्वारा नलविलास के विभिन्न पक्षों एवं प्रसंगों का विद्वत्तापूर्ण विवेचन किया है, जिससे ग्रन्थ अत्यन्त आकर्षक, सुरुचिपूर्ण एवं सरस बन गया है। मेरा विश्वास है कि 'नलविलास-परिशीलन' संस्कृत व हिन्दी साहित्य की कोश वृद्धि करने के साथ-साथ लक्षण ग्रन्थों जैसे काव्यशास्त्र व नाट्‌यशास्त्र के विभिन्न लक्षणों को व्याखयायित करेगा। आशा है कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी के गौरवशाली प्रकाशनों की श्रृंखला में प्रस्तुत पुस्तक 'नलविलास - परिशीलन' भी हिन्दी व संस्कृत के विद्वत्समाज में समान रूप से समादृत होगा।

दिनांक ५ जनवरी २००९
डॉ० एस०के० पाण्डेय
अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व)
इलाहाबाद एवं
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

पुस्तक-लोकार्पण समारोह

पुस्तक-लोकार्पण समारोह


हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान में २८ अप्रैल २०१० दिन बुधवार अपराह्‌न 5:00 बजे एकेडेमी के सभागार में पुस्तक-लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथ श्री विभूति नारायण राय, अध्यक्ष श्री दूधनाथ सिंह, श्री दिनेश कुमार शुक्ल, श्री शीतला प्रसाद श्रीवास्तव जी ने दीप प्रज्ज्वलित करके एवं सरस्वती जी के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ। प्रकाश त्रिपाठी ने कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत किया। हिन्दुस्तानी एकेडेमी की सद्यः प्रकाशित पुस्तकों चिद्‌यात्रा (कविता संकलन) - शीतला प्रसाद श्रीवास्तव, जगदीश गुप्त : व्यक्ति और काव्य- डॉ० प्रकाश त्रिपाठी, रहीम की काव्य-भाषा - डॉ० प्रकाश त्रिपाठी, हिन्दी व्यंग्य और शरद जोशी - डॉ० कमलेश सिंह का लोकार्पण मुख्य अतिथ वी०एन० राय, दूधनाथ सिंह और दिनेश कुमार शुक्ल ने किया। चारों पुस्तकों पर चर्चा करते हुए मुश्ताक अली ने कहा कि यह विमोचन समारोह अनस्टेबलिश्ड लोगों का एक उपक्रम है। इन चारों किताबों में सर्जनात्मक किताब है चिद्‌यात्रा। इसमें ९४ कविताएं संकलित हैं। किन्तु कवि शीतला प्रसाद श्रीवास्तव जी स्वयं को कवि नहीं मानते। उन्होंने अपनी पहली कविता में लिखा है ''जी नहीं मैं कवि नहीं हूं पर कविता रचता हूं।'' उन्होंने अपनी कविताओं में आम आदमी की बात कही है। आज की व्यवस्था में आम आदमी कितना बेचारा हैं। इन सारी कविताओं में कवि एक मूल्य के लिए जीता है। रहीम की काव्यभाषा, जगदीश गुप्तः व्यक्ति और काव्य एवं हिन्दी व्यंग्य और शरद जोशी पुस्तक पर भी उन्होंने चर्चा की।

दिनेश कुमार शुक्ल जी ने चर्चा करते हुए कहा कि आने वाले समय में साहित्य किनारे किया जा रहा है। साहित्य में कटुता का वातावरण है। तटस्थ मूल्यांकन नहीं होता है। साहित्य की दुनिया में जो हाशिये में जा रहा उसके लिए प्रयास करें। इन पुस्तकों का प्रकाशन इसका छोटा सा प्रयास है। कवि शीतला प्रसाद जी सहज स्वभाव के हैं। उनकी कविताओं में सहजता, सरलता है। साहित्य का मंच व्यक्तिगत वैमनस्य निकालने का मंच नहीं होना चाहिए। कविता से ही संवेदना बनती है। जिस दिन आप संवेदनहीन हो जायेंगे ज्ञान भी आपसे दूर चला जायेगा। इसलिए कटुताओं को कम करें। ज्ञान व संवेदना को मिलाने की बात करें।

कार्यक्रम में कवि शीतला प्रसाद श्रीवास्तव जी ने कहा ''मैं इस क्षेत्र में नया हूं। इसलिए स्वयं को कवि नही मानता। कविता लिखी नहीं जाती, कविता का प्रादुर्भाव होता है।'' उन्होंने अपनी कुछ कविताओं को पढ़कर सुनाया।

कार्यक्रम के मुखय अतिथि विभूति नारायण राय ने कहा कि हिन्दी में बहुत दिन तक एक खास मानसिकता में साहित्य लिखा गया। साहित्य में कुछ लोगों का प्रवेश था। पत्रकार, अध्यापक ही साहित्यकार होता था। दूसरे पेशे का यदि कोई साहित्य में आता तो इन्हें अच्छा नहीं लगता। पुलिस जैसी नौकरी से तो खासकर। लेकिन अब समय बदला है। दूसरे पेशे से भी लोग आये उन्होंने जितना लिया उससे ज्यादा दिया। नये-नये शब्द तथा भाषा के नये अनुभव से नयी भाषा जुड़ी। पुलिस महकमें में तो जानवर बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। शीतलाप्रसाद जी के भीतर यदि मनुष्य बचा है तो वह उनके साहित्य से जुड ने के कारण, जो उनकी कविताओं में दिखाई पड ता है। नये साहित्य प्रेमियों के प्रति भी सहृदय होना पड़ेगा। हिन्दी व्यंग्य पर अगर कोई भी काम करेगा तो उसे हिन्दी व्यंग्य और शरद जोशी किताब की आवश्यकता पड़ेगी। नये लोगों से ज्यादा अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

अध्यक्ष पद से दूधनाथ जी ने कहा कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी को अपने प्रकाशन की परम्परा और गौरव को बनाये रखना चाहिए। हिन्दुस्तानी एकेडेमी के प्रकाशनों का एक इतिहास रहा है। यहां से बहुत अच्छी-अच्छी किताबों का प्रकाशन हुआ है। उन्होंने चिद्‌यात्रा पर चर्चा करते हुए कहा कि कविता में एक बिम्बात्मक अलंकृति होती है। विवरण भी हो तो बिम्ब होना चाहिए।जो कि रघुवीर सहाय जी की कविताओं में पाया जाता है। यदि बिम्बात्मक अलंकृति न हो तो वह विवरण जैसी लगने लगती है।

कार्यक्रम के अन्त में एकेडेमी के कोषाध्यक्ष सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए सभी उपस्थित साहित्य प्रेमियों का आवाहन करते हुए कहा कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी की समृद्ध परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए सबका दायित्व है कि वे हिन्दी और उर्दू भाषा और साहित्य के विकास हेतु अपना सक्रिय योगदान दें।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
कोषाध्यक्ष

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

मार्कण्डेय पुराण (एक सांस्कृतिक अध्ययन) Markendeya Puran (Ek Sanskritik Adhyayan)

पुस्तक का नाम : मार्कण्डेय पुराण (एक सांस्कृतिक अध्ययन)
लेखक : डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल
संस्करण : प्रथम - १९६१
द्वितीय - २०१०
मूल्य : १८०.०० (एक सौ अस्सी रुपये मात्र)
प्रकाशक : सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
मुद्रक : एकेडेमी प्रेस, दारागंज, इलाहाबाद
आकार : डिमाई सजिल्द
पृष्ठ : २५१

प्रकाशकीय

भारतीय वाङ्‌मय का बहुत बड़ा हिस्सा धर्म और प्राचीन भारतीय विद्याओं से सम्बन्धित है। हमारी संस्कृति और इतिहास के अध्ययन में यह सब कुछ आधार-सामग्री का काम करता है। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने शुरू से ही इस आधार-सामग्री के शोधपरक संरक्षण का उपक्रम किया है। इसी क्रम में दशकों पहले प्रख्यात विद्वान्‌ डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने ७ दिसम्बर १९५७ को "मार्कण्डेय पुराण" के सांस्कृतिक पक्ष पर एक व्याख्यान दिया था। जिसे बाद में और संवर्धित करके पुस्तक का रूप दिया गया। यह पुस्तक १९६१ में प्रकाशित की गयी। एकेडेमी का यह महत्त्वपूर्ण प्रकाशन अब अप्राप्य है। शोधार्थियों और विद्वत्‌ समाज के आग्रह पर हम इस ग्रन्थ का पुनर्मुद्रण कर रहे हैं। पुस्तक के द्वितीय संस्करण के प्रकाशन में डॉ० सुरेन्द्र पाल सिंह के सहयोग के लिए हम आभारी हैं। आशा है शोधार्थियों और जिज्ञासुओं की एक महती आवश्यकता की पूर्ति इससे सम्भव हो सकेगी।

एक मार्च दो हजार दस
(१/३/२०१०)
राम केवल
सचिव,
हिन्दुस्तानी एकेडेमी,
इलाहाबाद।

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

सूर काव्य : दृष्टि एवं विमर्श

पुस्तक का नाम - सूर काव्य : दृष्टि एवं विमर्श
सम्पादक - डॉ० ब्रजेश्वर वर्मा
सहायक सम्पादक - डॉ० रामजी पाण्डेय
संस्करण - प्रथम
प्रकाशन वर्ष - सन्‌ २०१० ई०
मूल्य - २३०.०० रुपये दो सौ तीस मात्र
प्रकाशक - सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
मुद्रक - एकेडेमी प्रेस, दारागंज, इलाहाबाद
आकार - डिमाई सजिल्द

प्रकाशकीय

भारतीय मनीषा और भारतीय संस्कृति का चरमोत्कर्ष जिन कुछेक विभूतियों में चरितार्थ हुआ है "सूरदास"उनमें से एक हैं। कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि के रूप में उनके अवदान से हम सभी परिचित हैं। फिर भी अकादमिक स्तर पर उनके कृतित्व के शोधपरक अनुशीलन के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। उनके पंचशती समारोह के अवसर पर १९७८ में "हिन्दुस्तानी" पत्रिका का "सूर-विशेषांक" प्रकाशित किया गया था। जिसे विद्वत्‌जनों एवं शोधार्थियों के बीच काफी लोकप्रियता हासिल हुई। आज भी उसकी माँग कम नहीं हुई है। अतः एकेडेमी ने उसको पुस्तकाकार प्रकाशित करने का निर्णय किया। पहले भी "सुमित्रानन्दन पन्त" एवं "प्रेमचन्द" पर प्रकाशित विशेषांकों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। जिसका पाठकों के बीच भरपूर स्वागत हुआ है।

उसी क्रम में शोधार्थियों एवं विद्वत्‌ समाज की माँग को देखते हुए डॉ० ब्रजेश्वर वर्मा द्वारा संपादित यह "सूर-विशेषांक" पुस्तक रूप में प्रकाशित करते हुए हमें अपूर्व प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
३ मार्च सन्‌ २०१०
राम केवल
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी
इलाहाबाद



शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

हिन्दी रंगकर्म के अमृतपुत्र : डॉ० सत्यव्रत सिन्हा


हिन्दी रंगकर्म के अमृतपुत्र : डॉ० सत्यव्रत सिन्हा
डॉ० अनुपम आनन्द
मूल्य १८०.०० सजिल्द
पृष्ठ ३०७
प्रकाशन वर्ष २००९
प्रकाशक एवं वितरक : हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

प्रकाशकीय

रंगकर्म अपने आप में बहुआयामी विधा है। विविध कलाओं का खूबसूरत समुच्चय! और उसी अनुपात में व्यावहारिक स्तर पर उनका संयोजन-प्रदर्शन। कोई भी कला मूलत: जिस आस्वादकर्ता को संबोधित होती है, उसकी इतनी प्रत्यक्ष मौजूदगी और स्वीकृति किसी भी अन्य कला-विधा में नहीं होती। इसीलिए एक सच्चे रंगकर्मी से अपेक्षाकृत अधिक प्रतिबद्धता और गतिशीलता की भी आशा की जाती है। डॉ० सत्यव्रत सिन्हा ऐसे ही कुशल, संवेदनशील और सिद्धहस्त कलाकार थे। अभिनय की प्राथमिक सीढ़ी से चलकर वह कैसे क्रमश: नये-नये सोपान चढ़ते गये होंगे, इसका साक्षात्कार करना सचमुच एक सुखद और स्पृहणीय अनुभव हो सकता है। अन्तत: एक बड़े रंग निर्देशक के रूप में उन्होंने एक उचाई हासिल की, जिनके खाते में तरह-तरह के रंग-प्रयोग दर्ज हैं। इलाहाबाद जैसी सांस्कृतिक नगरी उनके निर्माण-विकास की साक्षी रही है और उनका कार्यस्थल भी। ‘प्रयाग रंगमंच’ जैसी संस्था के संस्थापक के रूप में उनका नाम शुमार किया जाता है। बनारस के बाद शायद इलाहाबाद ही वह नगरी है जहां हिन्दी रंगमंच ने कई महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किये। खास करके आधुनिक रंगमंच की पाश्चात्य परम्पराओं का अवगाहन इलाहाबाद में ही सर्वाधिक संभव हो सका। डॉ० सत्यव्रत सिन्हा उन थोड़े-से शख्सियतों में हैं, जिन्हें इसका श्रेय दिया जा सकता है।

ऐसे अनूठे रंगकर्मी के प्राय: समग्र अवदान को एक पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है। यह महत् कार्य उनके सुपुत्र डॉ० अनुपम आनन्द के लम्बे और समर्पित अध्यवसाय से ही सम्भव हो सका है। अनुपम जी स्वयं एक अच्छे रंगकर्मी और अध्येता हैं। डॉ० सिन्हा की जीवन-यात्रा से लेकर उनके लिखित अवदान और उनसे लिये गये साक्षात्कारों का उन्होंने बड़ी खूबसूरती से संयोजन किया है। जिस आत्मीयता के साथ उन्होंने इस महान रंगकर्मी के जीवन व कर्मवृत्तों को प्रस्तुत किया है, उसके लिए हम उनके ऋणी हैं। आशा है, पाठक और शोधार्थी इस महत्वपूर्ण कृति का भरपूर लाभ उठायेंगे।
२८ सितम्बर २००९
विजयादशमी
डॉ० एस०के० पाण्डेय
सचिव,
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

शनिवार, 26 सितंबर 2009

हिन्दी चिठ्ठों की किताब के लिए अपनी चुनिन्दा पोस्ट भेंजिए...।

हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में अनेक प्रतिष्ठित लेखक और साहित्यकार अपनी रचनाएं अन्तर्जाल पर प्रकाशित कर रहे हैं लेकिन उससे कहीं बड़ी संख्या ऐसे ब्लॉगलेखकों की है जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता के नैसर्गिक प्रवाह को यूँ ही निसृत होने दिया है। अपनी मस्ती में डूबे हुए ये अनूठे चिठेरे इस चक्कर में ही नहीं पड़ते कि उनका लिखा हुआ साहित्य की कोटि में रखा जाता है कि नहीं। बहुत से ब्लॉग लेखक ऐसे भी हैं जो अपनी पोस्टों के माध्यम से समाज, संस्कृति, राजनीति, घर-परिवार, विज्ञान, इतिहास, भूगोल आदि के विषयों पर ज्ञान का असीमित भण्डार उड़ेल रहे हैं। यह सब कुछ हिन्दी ब्लॉग समुच्चय को एक क्लाइडोस्कोप का रुप गुण देता है।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी की स्थापना हिन्दुस्तानी (हिन्दी और उर्दू) भाषा को विकास की सीढ़ियों पर ले जाने वाले सभी सार्थक प्रयासों को एक ऐसा मंच देने के उद्देश्य से हुई थी जहाँ मौलिक प्रतिभाओं को अपनी रचनाधर्मिता को प्रकाशित कराने का अवसर मिले और विद्वानों-मनीषियों के शोधपरक कार्यों को सामान्य विद्यार्थियों, अध्येताओं और साहित्यानुरागियों के उपयोग हेतु सहज ढंग से उपलब्ध कराया जा सके। इन उद्देश्यों की पुर्ति के लिए एकेडेमी द्वारा करीब डेढ़ सौ अमूल्य पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है और साहित्यिक गोष्ठियों, व्याख्यान मालाओं, सेमिनार और प्रतिभा सम्मान समारोहों का आयोजन अनवरत किया जाता रहा है।

अपनी इसी उत्कृष्ट परम्परा के निर्वहन के क्रम में हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के सौजन्य से हिन्दी ब्लॉगिंग के सम्बन्ध में एक राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार का आयोजन आगामी २३-२४ अक्टूबर, २००९ को किया जा रहा है। इस अवसर पर देश भर से अनेक चिठ्ठाकारों को आमन्त्रित कर अभिव्यक्ति के इस नये माध्यम के इतिहास, स्वरूप और प्रमुख प्रवृत्तियों पर दो दिवसीय चर्चा की जाएगी। इस अवसर पर पारम्परिक साहित्य जगत के अनेक प्रतिष्ठित विद्वान भी प्रतिभागी होंगे।
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इस अवसर पर एकेडेमी द्वारा एक पुस्तक का प्रकाशन कर उसके तत्समय लोकार्पण का निर्णय भी लिया गया है जिसमें लगभग पचास चिठ्ठाकारों की चुनी हुई एक-एक ब्लॉग पोस्टों को सम्मिलित कर एक प्रतिनिधि संकलन तैयार किया जाएगा। इसके लिए हिन्दी ब्लॉगर्स से प्रविष्टियाँ आमन्त्रित की जाती हैं। एक ब्लॉगर से केवल एक प्रविष्टि ही स्वीकार की जाएगी। हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा गठित सम्पादक मण्डल प्रविष्टियों के चयन पर विचार करेगा जिसकी संस्तुतियों के आधार पर पुस्तक का अन्तिम रूप निर्धारित किया जाएगा। एकेडेमी के ई-मेल पते (hindustaniacademy@gmail.com) पर अपनी प्रविष्टियाँ दिनांक ५.१०.२००९ की मध्यरात्रि तक अवश्य प्रेषित कर दें।

चिठ्ठाकार मित्रों द्वारा पुस्तक के शीर्षक व आवरण पृष्ठ के सम्बन्ध में यदि कोई सुझाव दिया जाता है तो उसका भी स्वागत है। यह पुस्तक हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से प्रिन्ट माध्यम के लिए एक अनुपम भेंट हो, यही हमारी आकांक्षा है।

सचिव - हिन्दुस्तानी एकेडेमी

रविवार, 16 अगस्त 2009

हिन्दी ब्लॉगजगत का एक झरोखा: सत्यार्थमित्र... (पुस्तक चर्चा)



प्रकाशकीय

अंग्रेजी शब्द ‘ब्लॉग’ वेब-लॉग का संक्षिप्त रूप है जो अमेरिका में १९९७ ई. के दौरान अन्तर्जाल (इण्टरनेट) पर प्रचलन में आया। प्रारम्भ में कुछ ऑनलाइन पत्रिकाओं के ‘लॉग’ प्रकाशित किये जाते थे, जिनमें वेबसाइट के विभिन्न हिस्सों में प्रकाशित विविध सामग्रियों के लिंक दिये गये होते थे तथा साथ में इनके लेखकों की संक्षिप्त टिप्पणियाँ होती थीं। कालान्तर में इन्हें ही ‘ब्लॉग’ कहा जाने लगा और इनके लेखक ‘ब्लॉगर’ कहलाए।

ब्लॉग को विश्व के आम लोगों में भारी लोकप्रियता उस समय मिली जब अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के दौरान एक अमेरिकी सैनिक ने अपने युद्ध सम्बन्धी अनुभव को ब्लॉग के माध्यम से दैनिक आधार पर प्रकाशित करना प्रारम्भ किया। उस समय एण्ड्र्यू सुलीवान के ब्लॉग पृष्ठ को आठ लाख से अधिक लोगों ने खोला व पढ़ा। पाठकों की इतनी बड़ी संख्या प्रिन्ट माध्यम के अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशनों से आगे निकल गयी थी। देखते ही देखते १९९७-९८ के महज दर्जन भर ब्लॉगों से प्रारम्भ होने वाला सहज अभिव्यक्ति का यह नया माध्यम केवल चार वर्षों में दस लाख का आँकड़ा पार कर गया।

शीघ्र ही विश्व की प्रत्येक भाषा में सभी कल्पनीय विषयों और अकल्पनीय मुद्दों पर भी ब्लॉग लिखे जाने लगे। हिन्दी भाषा का प्रथम ब्लॉग नौ दो ग्यारह (९-२-११) प्रारम्भ करने का श्रेय बंगलुरू निवासी आलोक कुमार को जाता है, जिन्होंने पहली बार ब्लॉग को ‘चिठ्ठा’ नाम दिया और इस प्रकार वे ‘आदि-चिठ्ठाकार’ कहलाए। इस चिठ्ठे में उन्होंने कम्प्यूटर जगत के तकनीकी और अपने अन्य व्यक्तिगत अनुभवों को नियमित रूप से प्रकाशित किया। इलाहाबाद की छात्रा रह चुकी डॉ. पूर्णिमा बर्मन द्वारा हिन्दी में संचालित साप्ताहिक अन्तर्जाल पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ में रवि प्रकाश श्रीवास्तव (रवि रतलामी) ने एक आलेख प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था- अभिव्यक्ति का नया माध्यम: ब्लॉग। इस प्रकार के प्रयासों से हिन्दी ब्लॉग लेखन के कार्य में शनैः शनैः प्रगति होने लगी। प्रारम्भिक चिठ्ठाकारों में रवि रतलामी, देबाशीष, जीतेन्द्र चौधरी, अतुल अरोरा, अनूप शुक्ल, पंकज नरूला इत्यादि प्रमुख रहे।

अप्रैल २००३ में प्रारम्भ होने के बाद हिन्दी भाषा के चिठ्ठों की संख्या में वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। करीब छः साल बाद भी अभी कुल हिन्दी चिठ्ठों की संख्या दस हजार के आसपास ही है। इनमें भी नियमित रूप से सक्रिय रहने वाले हिन्दी चिठ्ठे ढाई हजार के आसपास ही हैं। वर्तमान में यह माध्यम तेजी से बढ़ रहा है। प्रतिदिन औसतन पच्चीस-तीस नये ब्लॉग हिन्दी ब्लॉग जगत से जुड़ रहे हैं। ब्लॉगर और वर्डप्रेस जैसे जालघर मुफ़्त में ब्लॉग लिखने और प्रकाशित करने की सुविधा देते हैं। ब्लॉग लेखक को कम्प्यूटर तकनीक का भी प्रारम्भिक ज्ञान ही पर्याप्त होता है।

ब्लॉगों की लोकप्रियता और अन्तर्जाल से जुड़े प्रबुद्ध वर्ग के लिए इसकी सहजता और सरलता ने प्रिन्ट माध्यम में भी इनकी चर्चा को अपरिहार्य बना दिया है। प्रायः सभी अखबारों और पत्र पत्रिकाओं द्वारा हिन्दी ब्लॉग जगत में प्रकाशित होने वाली रोचक और ज्ञान बर्द्धक जानकारी को अपने पृष्ठों में प्रमुख स्थान दिया जा रहा है। अनेक कवि, लेखक, पत्रकार, स्तम्भकार, वैज्ञानिक, समाजसेवी और अन्य प्रबुद्ध पेशों से जुड़े लोग अपनी बात रखने के लिए इस माध्यम की ओर झुक रहे हैं। इस माध्यम से ज्ञान-विज्ञान, संगीत, कला, संस्कृति, राजनीति, व्यापार, इतिहास, परिवार व समाज आदि अनेकानेक विषयों पर विचारों का आदान-प्रदान किया जा रहा है। ऐसे में पारम्परिक साहित्य के दृष्टिकोण से कुछ लोग ब्लॉग पर प्रकाशित सामग्री को साहित्य से इतर श्रेणी में रखने का विचार रख रहे हैं।

आचार्य मम्मट ने अपनी कालजयी कृति ‘काव्यप्रकाश’ के प्रथम उल्लास (खण्ड) में साहित्य के प्रयोजन की व्याख्या करते हुए बताया है कि साहित्य सृजन का उद्देश्य यश की प्राप्ति, अर्थोपार्जन, मानव व्यवहार का ज्ञान एवम्‌ अशुभ का शमन करना है। यह कार्य पत्नी के समान हितैषी और सद्‌प्रेरणा देने वाला होता है। इस दृष्टिकोण से देखा जाय तो ब्लॉग पर प्रकाशित अधिकांश सामग्री साहित्य की श्रेणी मॆं रखी जा सकती है। गुणवत्ता की दृष्टि से अच्छा और खराब कोटि का साहित्य इलेक्ट्रॉनिक और प्रिन्ट दोनो माध्यमों में समान रूप से पाया जाता है। ब्लॉग के माध्यम में चूँकि किसी प्रकार की मात्रात्मक सीमा या सम्पादकीय कैंची क्रियाशील नहीं है कदाचित्‌ इसलिए इसमें गुणवत्तायुक्त सामग्री का अनुपात थोड़ा कम हो सकता है। किन्तु इसका दूसरा पहलू यह है कि इस माध्यम में ब्लॉग लेखक को अपने विचार प्रकट करने की जो असीम और अनमोल स्वतन्त्रता मिली हुई है उससे उपजे साहित्य में एक अलग तरह की निर्दोष यायावरी और नैसर्गिक पारदर्शिता भी आ जाती है। मुक्त बाजार के नियम तो अपनी जगह हैं ही। यहाँ आना बेशक आसान है लेकिन ब्लॉग मंच पर सक्रिय बने रहना और निरन्तर आगे बढ़ते रहना उतना ही मुश्किल है। यहाँ वही जम पाएगा जिसमें दम होगा।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के प्रमुख उद्देश्यों में हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास के विविध सोपानों पर कदम मिलाकर चलते हुए इस अनुष्ठान में सक्रिय प्रतिभाग करना है। इसकी सिद्धि के लिए एक ओर जहाँ मूर्धन्य विद्वानों और मनीषियों की शोधपरक और कालजयी कृतियों को प्रकाशित कर प्रबुद्ध विद्यार्थियों और अध्येताओं को उत्कृष्ट विषय सामग्री उपलब्ध करायी जा रही है तो दूसरी ओर प्रतिभाशाली उदीयमान लेखकों और साहित्यकारों की उर्वर विचारभूमि से पैदा होने वाली नवीन रचनाओं को स्थान देकर उन्हें आम पाठक वर्ग में प्रतिष्ठित करने का प्रयास भी किया जाता है, ताकि वे बदलते युग के साथ तादात्म्य बिठाते हुए परम्परा और आधुनिकता का उत्कृष्ट सम्मिश्रण प्रस्तुत कर सकें। श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के ब्लॉग लेखों के संकलन का यह पुस्तकीय प्रकाशन इस उद्देश्य की कसौटी पर पूर्णतः खरा उतरता है।

पुस्तक: सत्यार्थमित्र (ब्लॉगपोस्ट संग्रह)
लेखक: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
प्रकाशक: हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
पृष्ठ सं. : २८८
मूल्य: रु. १९५/- मात्र

सरकारी उत्तरदायित्व के पद पर रहते हुए श्री त्रिपाठी ने व्यक्तिगत रूप में अपने आस-पास की दुनिया से संवेदना का जो रिश्ता कायम कर रखा है वह इनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकता है। “यह सरकारी ‘असरकारी’ क्यों नहीं है?” नामक पोस्ट में इनकी बेचैनी साफ झलकती है। बुजुर्ग पेंशनभोगियों की हालत बयान करती इनकी ग़ज़ल “हम हैं जिन्दा ये बताने का वक्त आया है” मन में सिहरन पैदा कर देती है। सरकारी नियम-कायदों के अनुपालन में कैसी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो सकती है इसका एक रोचक किस्सा “तिल ने जो दर्द दिया” में पढ़ने को मिलेगा। पारिवारिक और सामाजिक मुद्दों पर सिद्धार्थ जी की लेखनी बेजोड़ चलती है। “उफ़ ये मध्यम वर्ग”, “प्रकृति ने औरतों को क्या कम कष्ट दिए हैं?” और “लो, मैं आ गया सिर मुड़ाकर…” जैसे लेख इनकी प्रगतिशील सोच और रुढियों-आडम्बरों के विरुद्ध निर्भीक लेखन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। कम्प्यूटर कीऔर इन्टरनेट की दुनिया में गोते लगा रहे एक ब्लॉगर के व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में क्या परिवर्तन आ जाते हैं और उसे कैसी परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं इसकी झलक भी लेखक ने “समय कम पड़ने लगा है”, “ब्लॉगरी ने जिन्दगी बदल दी” जैसे लेखों में बखूबी दिखायी है। “किताबों की खुसर-फुसर” सुनकर उसे लिपिबद्ध कर देना एक विलक्षण प्रतिभा की ओर इशारा करता है। ‘पुराण चर्चा’ के माध्यम से श्री त्रिपाठी ने हमारे आदि ग्रन्थों में निहित अनेक रोचक और उपयोगी जानकारी खोजकर प्रस्तुत की है। ‘धुन्धकारी’ की कथा व ‘ढपोर शंख’ का आख्यान विशेष रोचक बन पड़ा है। कदाचित्‌ इसीलिए वर्तमान ब्लॉगजगत के शीर्ष पुरुष ज्ञानदत्त पाण्डेय ने शुरू में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि ‘सिद्धार्थ जी में उत्कृष्टतम ब्लॉगर बनने का पूरा रॉ-मटीरियल है।’

इस पुस्तक में जो आलेख सम्मिलित किये गये हैं वे अप्रैल २००८ से मार्च २००९ के बीच इनके नियमित ब्लॉग सत्यार्थमित्र पर प्रकाशित हुए हैं। सभी आलेख अत्यन्त रोचक, और भावपूर्ण शैली में लिखे गये हैं। गम्भीर और संवेदनशील विषय भी कहीं बोझिल नहीं हो पाये हैं। भाषा का प्रवाह और लालित्य पाठक को आद्योपान्त बाँधे रखता है। इन लेखों में जिस दुनिया की बात की गयी है वह हमारे आस-पास की सुपरिचित घरेलू दुनिया है जिसमें हम नित्य-प्रति साँस ले रहे हैं। यह पुस्तक उन साहित्य प्रेमियों के लिए विशेष उपयोगी और लाभप्रद है जो अभी इन्टरनेट की दुनिया से पूरी तरह नहीं जुड़ सके हैं। आशा है कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी के गौरवशाली प्रकाशनों की सृंखला में इस पुस्तक का सुधी पाठकों और साहित्यप्रेमियों द्वारा हृदय से स्वागत किया जाएगा।

हम इस पुस्तक के लेखक श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी को इस अनुपम कृति के प्रकाशन के अवसर पर साधुवाद देते हैं और उनके सफल और उज्ज्वल लेखकीय भविष्य की कामना करते हैं।

डॉ. एस. के. पाण्डेय
सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी
१२ डी, कमला नेहरू मार्ग, इलाहाबाद।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

सोमवार, 13 जुलाई 2009

पुस्तक चर्चा: चन्द्रालोक परिशीलन

 

ChandraLokParishilan

   चन्द्रालोक परिशीलन
लेखिका: डॉ० स्मिता अग्रवाल
मूल्य : २५० रुपये , पृष्ठ ३४० सजिल्द


 

प्रकाशन वर्ष २००९ 

 

 

‘चन्द्रालोक’ कोई साधारण ग्रन्थ नहीं है। दस मयूखों में विभक्त यह ग्रन्थ स्वयं में अनेक काव्यशास्त्रीय आचार्यों के सिद्धान्तों के मनन-चिन्तन पूर्वक निकाला गया नवनीत है। चन्द्रालोक की शैली नवीन एवं सूत्रात्मक है, जिसके कारण कहीं-कहीं पर आचार्य अपने सिद्धान्तों को स्पष्ट करने में असमर्थ हैं। अत: उनके ज्ञान हेतु पूर्ववर्ती एवं कतिपय पश्चाद्वर्ती आचार्यों के ग्रन्थों का अवलम्बन आवश्यक है।
आचार्य जयदेव संस्कृत काव्यशास्त्रीय आचार्यों के मध्य तक एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। जयदेव न केवल आलंकारिक हैं, अपितु ध्वनिवादी आचार्य भी हैं। जयदेव की दोनों कृतियॉं चन्द्रालोक तथा प्रसन्नराघव नाटक उनकी अद्भुत कविप्रतिभा एवं विलक्षणता को प्रकट करती है। चन्द्रालोक काव्यशास्त्र का ग्रन्थ है, तो प्रसन्नराघव नाट्यविद्या का ग्रन्थ। जयदेव कवि होने के साथ सहृदय एवं तार्किक भी हैं। उन्होंने न केवल अपने पूर्ववर्ती आचार्यों की परम्परा को आगे बढ़ाया, अपितु संस्कृत-साहित्य को ‘चन्द्रालोक’ के रूप में अनूठी, गूढ़, सैद्धान्तिक कृति प्रदान की।
चन्द्रालोक में काव्यस्वरूप से सम्बद्ध प्रत्येक मयूख नवीन सिद्धान्त को प्रतिपादित करता है। मम्मट के उत्तराधिकारी के रूप में यदि आचार्य जयदेव की कल्पना की जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जयदेव ने अपने ग्रन्थ का आधार मम्मट द्वारा प्रणीत काव्यप्रकाश को ही बनाया है। आचार्य अप्पयदीक्षित जो आचार्य जयदेव के अलंकार प्रसंग से अत्यन्त प्रभावित थे तथा चन्द्रालोक के पंचम मयूख को ही आधार बनाकर उन्होंने सम्पूर्ण ग्रन्थ ‘कुवलयानन्द’ की रचना की - उन्हें ग्रहण करने का यथेष्ट प्रयास ग्रन्थ में किया गया है। (

डॉ.एस.के.पाण्डेय)

बुधवार, 10 जून 2009

पुस्तक चर्चा: भारतीय ज्योतिष में प्रयाग

प्रयाग अनादिकाल से तीर्थराज की पदवी से विभूषित रहा है। यह ऋषियों, मुनियों, सन्तों एवं साधकों की पावन तपस्थली एवं साधनास्थली रही है। इसका ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं पौराणिक महत्व रहा है। न केवल यहॉं भगवती गंगा, यमुना और सरस्वती का दिव्य संगम है, प्रत्युत यहॉं वेदत्रयी का भी संगम है। इसकी अभिपुष्टि दक्ष प्रजापति के दशाश्वमेध यज्ञ से होती है। यहीं पर ब्रह्मा ने भी अनेक यज्ञों को सम्पादित किया था। वेद भगवान् की प्रवृत्ति यज्ञ है। यज्ञ कालाश्रयी हैं तथा कालज्ञ ही ज्योतिर्विद है। अतएव महात्मा लगध ने आर्च एवं याजुष ज्योतिष में कहा है - जो सम्यक रूप से ज्योतिषशास्त्र को जानता है वह यथार्थ में यज्ञ को जानता है।

भारतीय ज्योतिष में प्रयाग

प्रकाशक: हिन्दुस्तानी एकेडेमी
मूल्य: २२५ दो सौ पचीस रूपये मात्र
पृष्ठ: ३६०

   

 

 

 

भारतीय ज्योतिष में प्रयाग का योगदान स्वत: सिद्ध है। उसको अपनी लेखनी द्वारा जनसामान्य के समक्ष उपस्थापित करने का प्रशंसनीय प्रयास प्रस्तुत ग्रन्थ में विद्वान लेखक एवं ज्योतिर्विद डॉ० गिरिजा शंकर शास्त्री द्वारा किया गया है। भारतीय ज्योतिषशास्त्र के जिज्ञासुओं एवं अध्येताओं के लिए यह ग्रन्थ वस्तुत: रत्नप्रदीप है तथा संग्रहणीय भी।
डॉ० एस०के० पाण्डेय
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

रविवार, 7 जून 2009

पुस्तक चर्चा- हरि चरित: एक दुर्लभ धरोहर का प्रकाशन

हरि चरित्र अवधी भाषा का श्रीकृष्ण सम्बन्धी काव्य है। परम वैष्णव लालचदास कृत इस ग्रन्थ का रचनाकाल संवत् १५८७ बताया जाता है। हरि चरित्र में हरि गुनगान है- श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं का मनोहर वर्णन है जो श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध में पाई जाती हैं। हरि चरित्र इसलिए अपर नाम भागवत भाषा है। हरि चरित्र को एक पूरक कृतित्व कहा जाता है। रायबरेली उ०प्र० निवासी लालचदास ने अपने जीवन काल में इसके ४५ अध्यायों को ही लिखा था। उनके स्वर्गवास के पश्चात् उनके शिष्य आसानन्द ने पर्याप्त अन्तराल में इसे ९० अध्यायों में पूरा किया।

हरिचरित का मुखपृष्ठ

मूल्य ३७५ तीन सौ पचहत्तर रुपये मात्र
पृष्ठ ६५८ सजिल्द


हरि चरित्र में दोहा-चौपाई छन्द का प्रयोग हुआ है। यह काव्यग्रन्थ, रस, छन्द, अलंकार आदि काव्य सौष्ठवों से परिपूर्ण है। भाव व भाषा गाम्भीर्य के साथ भाषा में प्रवाह व सरसता है। इस भक्तिकाव्य को संकलित व सम्पादित करने का महान कार्य विज्ञान परिषद के प्रधानमंत्री प्रो० शिवगोपाल मिश्र ने किया है। ऐसे विलक्षण व महत्वपूर्ण अवधी भाषा के काव्य को सम्पादित कर प्रो० शिवगोपाल मिश्र ने मॉं सरस्वती के कोश में अभिवृद्धि की है।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी को ऐसी महनीय कृति प्रकाशित करते हुए न केवल अतिशय प्रसन्नता हो रही है अपितु गर्व की अनुभूति भी हो रही है। मुझे विश्वास है कि हरि चरित्र एकेडेमी के महत्वपूर्ण प्रकाशनों में अपना स्थान बनाएगा। आधुनिक हिन्दी के साथ-साथ अवधी, भोजपुरी व ब्रजभाषा के विद्वानों द्वारा भी यह ग्रन्थ समादृत होगा ऐसा मेरा अन्तर्मन कह रहा है। अस्तु।
रंग पंचमी, चैत्र कृष्ण
संवत् २०६५
डॉ० एस०के० पाण्डेय
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

बुधवार, 3 जून 2009

पुस्तक चर्चा: कविता की जातीयता

कविता की जातीयता / डॉ. कविता वाचक्नवी / हिन्दुस्तानी एकेडेमी , १२ डी , कमला नेहरु मार्ग , इलाहाबाद - २११ ००१ / २००९ / २२५ रुपये / पृष्ठ
३६६[सजिल्द].


हिन्दुस्तानी एकेडेमी के ताजा प्रकाशन के रूप में आयी इस पुस्तक का प्राक्कथन डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय जी ने लिखा है। यहाँ उसे अविकल प्रस्तुत किया जा रहा है;

मुखपृष्ठ कविता की जातीयता

 

 

'जातीय' यहाँ 'राष्ट्रीय' का पर्याय है, परंतु यह राष्ट्र ‘नेशन’ नहीं है। जातीय या राष्ट्रीय का गहरा सांस्कृतिक अर्थ है, जो भौगोलिक या राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है। इस ग्रन्थ की लेखिका डॉ. कविता वाचक्नवी ने राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लिखा है- "जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं, उसके तत्त्वों का अन्वेषण भारतीय जातीयता की व्याख्या करने में समर्थ होगा। " डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राष्ट्र के तीन घटक माने हैं- भूमि, जन और संस्कृति। इनमें से किसी एक की भी अनुपस्थिति में राष्ट्र की कल्पना संभव नहीं है। भारतीय राष्ट्र में ‘भूमि’ के अंतर्गत, वर्तमान राजनीतिक और भौगोलिक सीमा से बाहर ऐसे भूखण्डों का समावेश भी किया जाता है जो परंपरा से उसके अंग रहे हैं और उसके सांस्कृतिक परिसर में आते हैं, परंतु बाद के दौर में किन्हीं राजनीतिक-भौगोलिक या अन्य कारणों से अलग जा पडे़ हैं। यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि बृहत्तर भारत की अवधारणा उन भागों का अधिग्रहण करने की आकांक्षा नहीं है। [न दूर दूर तक इसकी कल्पना है] क्योंकि वृहत्तर अर्थ में ‘राष्ट्रीयता’ अधिकार का कोई दावा नहीं, वह सांस्कृतिक जुडा़वों की एक अमूर्त संहिति है।
संस्कृति हमारे लिए दार्शनिक, आध्यात्मिक, नैतिक, कलात्मक और प्रवृत्तिगत संसार की अनुगूँज है। वह मूलतः मनुष्य से, प्रकृति से, धर्म से, मूल्य से, आत्मा से, समाज से, विश्व से हमारे संबंधों की प्रकृति सूचित करती है। [इस सूची को बढा़या जा सकता है] अर्थात हमारे अन्तर्सम्बन्धात्मक -बोध और मूल्य-संकल्पना का स्वभाव या प्रकृति क्या है! इसे पहचान कर हम देशों, संस्कृतियों या राष्ट्रों को समझ सकते हैं।
उदाहरण के लिए पश्चिम प्रकृति से मनुष्य के संबंध द्वन्द्वात्मक मानता है। वह प्रकृति पर विजय पाने का लक्ष्य रखता है, जबकि भारत प्रकृति को चिति का स्वरूप मानते हुए प्रणत होता है। धर्म को वह किसी एक समुदाय या पूजा विधि में केन्द्रित न मानते हुए उसकी बहुलता को मान्यता देता है। वह धर्म का अर्थ अभ्युदय और कल्याण की प्राप्ति मानता है। मनुष्य और समाज के बीच द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों को मान्यता न देते हुए वह समूह या समाज से व्यक्ति की लयात्मकता को मान देता है। विश्व से उसके संबंध में आत्मविजय का भाव न होकर ग्रहण और सामंजस्य का भाव है। उसकी चाहत है-‘आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः -’संसार का जो भी श्रेष्ठ है, भद्र है उसे मैं अपना बना लूँ। यह ग्रहण है अधिग्रहण नहीं; जिसके कारण देव जाति नष्ट हो गई थी। जयशंकर प्रसाद ने लिखा है कि देवताओं को सब कुछ स्वायत्त था- ‘बल, वैभव, आनंद अपार’, परंतु परिणाम क्या हुआ? समूल विनाश। सब कुछ को स्वायत्त करने में नहीं, सब कुछ के श्रेष्ठ ग्रहण में ही कल्याण निहित है। आत्मा से भी भारतीय मनुष्य का संबंध अहम् भाव का अनुभव नहीं है, सर्वात्मवाद को वह अपनी शिराओं में पाता है - सबका विकास, सबका उन्नयन, सबका आनन्द भारतीय स्वभाव की मूल संस्कृति है।
भारत के भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक चरित्र में सामासिकता है, जिसके केन्द्र में है सहिष्णुता, जिसे नरेश मेहता, ‘वैष्णवता’ कहते हैं | वैष्णवता का मूल करुणा है। गाँधी की प्रार्थना में था ‘वैष्णवजन तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाणे रे’। वैष्णवी भारत एक सहिष्णु, संवेदनशील, सामासिक भारत है, संगम जिसका स्वभाव है। विश्वभर में क्या कहीं ‘संगम’ को पावन मान कर पूजा जाता है? संगम भारत की सामासिकता की बोध-भूमि है। संस्कृति प्रकारांतर से हमारी सर्जनात्मक चेतना है जिसमें सौन्दर्य, गतिशीलता, उर्वरता, संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता है। वह भारत के लिए जड़ प्रत्यय नहीं है और जिनके लिए है वे शायद भारत और भारतीय संस्कृति की आत्मा से परिचित नहीं हैं। भारत की संस्कृति का निर्माण, नीति के उपदेशों या धर्म ग्रंथों से नहीं, काव्य ग्रन्थों से हुआ है। रामायण महाभारत तो सांस्कृतिक अवबोधन के काव्य हैं ही, वेद भी एक अर्थ में महान काव्य है। इसलिए भारतीयता का संधान भारतीय काव्य में करना एक सार्थक कार्य है।
डॉ. कविता वाचक्नवी ने अपने पर्यालोचन के लिए जातीयता की संकल्पना की दृष्टि से आधुनिक हिन्दी कविता को चुना है। बीसवीं शती के प्रारम्भ से लगभग ९वें दशक तक के कवियों को इसमें सम्मिलित किया गया है। यह समयावधि निरंतर लंबी हुई है क्योंकि समय की गति निरंतर तीव्र होती गई है और इसी गति से कविता भी बढ़ी है। भारतेंदु से लेकर उदय प्रकाश तक के काव्य-समय ने कितने परिवर्तन देखे हैं। इसलिए कदाचित भारतीयता की अभिव्यक्ति को किसी एक ढांचे में ढालना संभव नहीं हुआ है। भारतेंदु के समय में भारतीयता किस सामयिकता और सांस्कृतिक अवधारणा में व्यक्त हुई है, फिर मैथिलीशरण गुप्त और अन्य राष्ट्रीय भावधारा के कवियों में भारतीयता का क्या स्वरूप रहा है? छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, नई कविता और उत्तरकाव्य में भारतीयता किस रूप में उपस्थित है? यह सब देखना सरल काम नहीं है। इसके विवेचन में सर्वसमावेशिता का आग्रह प्रायः रहा है। आशय यह कि ऐसी समस्त बातें यदि हम भारतीयता के भीतर समाहित करते चले जाएँ जो युगानुरूप रचनाओं की विषय-वस्तु रही हैं तो स्वयं राष्ट्रीयता या भारतीयता के अपरिभाषेय होने का संकट बना रहता है। तब यह जानना दूभर हो जाता है कि हमारा आशय राष्ट्रीयता या जातीयता से क्या है और वह कौन-सा काव्य है जिसे हम इसके बाहर रखते हैं? कविता जी को इस समस्या का सामना करना पडा़ है। संभवतः इसीलिए उन्होंने भारतीयता का केनवास काफी विशाल रखा है।
आधुनिक युग की एक दूसरी समस्या यह है कि हम जैसे-जैसे आधुनिकता से उत्तर आधुनिकता और पराआधुनिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं, हमारे संबंध अपनी जातीय विरासत से खिसकते चले जा रहे हैं। ऐसे में यह अपरिहार्य लगता है कि हम नए सिरे से एक ओर तो विरासत की व्याख्या करें और दूसरी ओर अपने व्यवहार की समीक्षा भी करें। क्या कारण है कि नई पीढी़ अपनी विरासत से तो परायापन अनुभव करे जबकि पश्चिम से आती विचारधाराओं या विचारों को अपनाते हुए उसे ही आधुनिकता का पर्याय मानने लगे। यानी दूसरों की विरासत तो नई और अपनी विरासत पुरानी। इस अंतर्विरोध की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए। शायद इनके बीच से ही आधुनिकता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है और साहित्य और जातीयता के गतिशील संबंधों की सर्जनात्मकता पहचानी जा सकती है तथा समय की आँधियों में बह जाने वाले समूह से अलग साहित्य का एक नया रचनात्मक पाठ बनाने की पहल की जा सकती है।
डॉ. वाचक्नवी के इस ग्रन्थ की विशेषता यह भी है कि उन्होंने साहित्य और जातीयता के पारंपरिक संबंधों को पहचानते हुए भी इस संबंध को गतिशीलता दी, उनका यह काम किसी हद तक नवीनतम जीन्स प्रौद्योगिकी के अनुरूप ही है जो जीन्स और डीएनए में वंश, जाति, देश आदि के तत्वों की उपस्थिति सिद्ध कर चुकी है। इसी प्रक्रिया में वह विकास की पुष्टि करती है। यह ध्यातव्य है कि संसार में सब कुछ चलित है, यदि आधुनिकता की अवधारणा गतिशील है तो जातीयता की अवधारणा भी गतिशील है। इसी पारस्परिक गतिशीलता में जातीयता और आधुनिकता की प्रीतिकर सन्निधि पहचानने की कोशिश ही इस ग्रंथ का प्रयोजन भी है और चुनौती भी।
जैसे भाव की चिरंतन उपस्थिति होने पर भी भावात्मक संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं, वैसे ही राष्ट्रीयता की चेतना बनी रहने के बाद भी समयानुसार राष्ट्र से रचनाकार के संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं। इसका मोटा उदाहरण यह है कि स्वाधीनता-संग्राम के दौर में कवियों के लिए राष्ट्रीयता या भारतीयता से संबंध का अर्थ अलग था। उस समय व्यक्त राष्ट्रीयता मूर्त और सोद्देश्य थी, जबकि आज़ादी के बाद राष्ट्र से जनता की तरह कवि के संबंध भी बदल गए। इसलिए इस दौर में काव्य में राष्ट्रीयता की पहचान अलग ढंग से हो सकती है। यहाँ आकर राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों को वह अपने केंद्र में रखती है। इस युग में राष्ट्रीयता की साहित्य में पहचान कठिन हुई है जो बाद के काल में निरंतर कठिनतर और कठिनतम होती चली गई है, इस हद तक कि लगने लगता है कि इन कवियों में राष्ट्रीयता या जातीयता की खोज एक दकियानूसी सोच है। परन्तु कविता के विन्यास के ऐसे अनेक पक्ष होते हैं, जैसे भाषा, प्रतीक, बिम्ब, रूपक आदि, जिनमें राष्ट्र झाँके बिना नहीं रहता। इसके अलावा राष्ट्रीय सोच बहुत कुछ समकालीन राष्ट्रीय प्रश्नों से जुड़ जाता है। यहीं राष्ट्रीयता और इसके इतर काव्य को पहचानना चुनौती बन जाता है। कभी-कभी यह सरलीकरण का शिकार हो जाता है जो मूल आशय तक पहुँचने की दिक्कतें हैं।
डॉ. वाचक्नवी ने यह बेहतर आँका है कि भारतेंदु युग, राष्ट्रीय काव्यधारा युग और छायावादी युग के स्वाधीनता पूर्व के प्रत्यय अलग प्रणाली और संज्ञा में ढले थे जबकि छायावादोत्तर और उसके भी उत्तर युग में अलग प्रत्यय अलग प्रणाली में ढले हैं। अतीत के आदर्श का स्मरण एक युग की जातीयता थी जिसमें प्रकृति और जीवन की अंतश्चेतना का उद्‌घाटन किया गया था। इसके बाद देश में पसरे शोषित पीड़ितों के अधिकार और स्थिति का संज्ञान लिया गया है। इसके बाद वरण कि स्वाधीनता और भिन्न-भिन्न सूक्ष्म मार्गों की तलाश में निहित अभिव्यक्ति में राष्ट्रीयता थी और वर्तमान में अपने समय, परिवेश, मनुष्यता के बाह्यान्तर में घटित परिवर्तनों को व्यक्त करना भारतीयता माना गया। नितांत आज में जो एक तरफ से भूमण्डलीकरण का दौर कहा जाता है, राष्ट्रीयता की खोज शायद राष्ट्र की ओर से खडे़ होकर प्रतिवाद के स्वर हैं या अन्य प्रकार की निष्पत्तियाँ हैं। समयानुसार बदलते साहित्यिक प्रत्ययों और मुहावरों में जातीयता को परिभाषित करने की इस कोशिश पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
मैं डॉ. कविता वाचक्नवी को एक अनिवार्य विषय ['' कविता की जातीयता''] पर हिन्दी पाठक का ध्यान आकर्षित करने और दूर तक राष्ट्रीयता की गतिशीलता को कविता-धाराओं में पहचानने के दुस्तर कार्य को सम्पन्न करने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ। प्रवाहों के बीच एक निष्पक्ष धारणा से मूल्याँकन करने का एक कठिन काम उन्होंने किया है।

( लेखक प्रख्यात आलोचक व पूर्वग्रह के सम्पादक हैं तथा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक व नया ज्ञानोदय के संपादक रहे हैं । )

गुरुवार, 29 जनवरी 2009

एकेडेमी में पुस्तक-लोकार्पण और सम्मान समारोह सम्पन्न:

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार एकेडेमी सभागार में गत २७ जनवरी को प्रदेश के उच्च शिक्षा मन्त्री डॉ. राकेश धर त्रिपाठी ने एकेडेमी द्वारा हाल ही में प्रकाशित तीन पुस्तकों का लोकार्पण किया। इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री प्रेमशंकर गुप्त ने की।

जिन पुस्तकों का लोकार्पण किया गया उनमें एकेडेमी के सचिव डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय द्वारा सम्पादित ‘सूर्य विमर्श’ नामक ग्रन्थ भी था जिसकी चर्चा यहाँ पूर्व में की जा चुकी है। सूर्य से सम्बन्धित प्रायः सभी आयामों को छूने वाली यह हिन्दी में लिखी गयी सम्भवतः सबसे अच्छी पुस्तक है जिसे निश्चित ही भविष्य में एक सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इसके अतिरिक्त एकेडेमी द्वारा वर्ष १९३३ ई. में प्रकाशित की गयी पुस्तक ‘भारतीय चित्रकला’ का द्वितीय संस्करण (पुनर्मुद्रण) भी लोकार्पित किया गया। इस पुस्तक को तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (यू.पी.) के एक प्रशासनिक अधिकारी श्री नानालाल चमनलाल मेहता, आई.सी.एस. द्वारा लिखा गया था। लेखक ने इस पुस्तक की रचना में मैथिली शरण गुप्त, ठाकुर दलजीत सिंह राठौर और डॉ. ताराचन्द के योगदान का विशेष उल्लेख किया है। इस विषय पर हिन्दी में लिखी गयी कदाचित्‌ यह पहली पुस्तक है जो भारतीय चित्रकला के सम्बन्ध में मौलिक जानकारी प्रदान करती है।



किन्तु जिस पुस्तक ने एकेडेमी के प्रकाशन इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर सबको अचम्भित कर दिया है वह है डॉ. कविता वाचक्नवी द्वारा एक शोध-प्रबन्ध के रूप में अत्यन्त परीश्रम से तैयार की गयी कृति “समाज-भाषाविज्ञान; रंग-शब्दावली: निराला-काव्य”। इस सामग्री को पुस्तक का आकार देने के सम्बन्ध में एक माह पूर्व तक किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। स्वयं लेखिका के मन में भी ऐसा विचार नहीं आया था। लेकिन एकेडेमी के सचिव ने संयोगवश इस प्रकार की दुर्लभ और अद्‌भुत सामग्री देखते ही इसके पुस्तक के रूप में प्रकाशन का प्रस्ताव रखा जिसे सकुचाते हुए ही सही इस विदुषी लेखिका द्वारा स्वीकार करना पड़ा। कदाचित्‌ संकोच इसलिए था कि दोनो का एक-दूसरे से परिचय मुश्किल से दस-पन्द्रह मिनट पहले ही हुआ था। यह नितान्त औपचारिक मुलाकात अचानक एक मिशन में बदल गयी और देखते ही देखते मात्र पन्द्रह दिनों के भीतर न सिर्फ़ बेहद आकर्षक रूप-रंग में पुस्तक का मुद्रण करा लिया गया अपितु एक गरिमापूर्ण समारोह में इसका लोकार्पण भी कर दिया गया। रंग शब्दों को लेकर हिन्दी में अपनी तरह का यह पहला शोधकार्य है। इसके साथ ही साथ महाप्राण निराला के कालजयी काव्य का रंगशब्दों के आलोक में किया गया समाज-भाषावैज्ञानिक अध्ययन भावी शोधार्थियों के लिए एक नया क्षितिज खोलता है। निश्चय ही यह पुस्तक हिदी साहित्य के अध्येताओं के लिए नयी विचारभूमि उपलब्ध कराएगी।



इस समारोह में एकेडेमी की ओर से हिन्दी, संस्कृत एवम उर्दू के दस लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों को सम्मानित भी किया गया। यद्यपि इनमें से डॉ. दूधनाथ सिंह, डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा, डॉ. अली अहमद फ़ातमी और श्री एम.ए.कदीर अलग-अलग व्यक्तिगत, पारिवारिक या स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से उपस्थित नहीं हो सके, तथापि सभागार में उपस्थित विशाल विद्वत्‌ समाज के बीच छः विद्वानों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए शाल, नारियल, व सरस्वती की अष्टधातु की प्रतिमा भेंट कर सम्मानित किया गया। प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किए गए। एकेडेमी द्वारा अन्य अनुपस्थित विद्वानों के निवास स्थान पर जाकर उन्हें सम्मान-भेंट व प्रमाण-पत्र प्रदान कर दिया जाएगा।
इस अवसर के कुछ यादगार क्षण हमने कैमरे में कैद किए सिर्फ़ आपके लिए-

IMG_4843सचिव द्वारा अतिथियों का स्वागत


IMG_4847लोकार्पण: समाज-भाषाविज्ञान रंग-शब्दावली: निराला काव्य


IMG_4849लोकार्पण: भारतीय चित्रकला


IMG_4862सम्मानित: प्रो. चण्डिका प्रसाद शुक्ल


IMG_4866सम्मानित: डॉ. मोहन अवस्थी


IMG_4870सम्मानित: प्रो. मृदुला त्रिपाठी


IMG_4872 सम्मानित: डॉ. विभुराम मिश्र


IMG_4881सम्मानित: डॉ. किशोरी लाल


IMG_4875सम्मानित: डॉ. कविता वाचक्नवी


IMG_4889गुरुजनों के गुरु: प्रो. चण्डिका प्रसाद शुक्ल का सम्बोधन


IMG_4904डॉ. कविता वाचक्नवी के भावुक क्षण


IMG_4917मन्त्र-मुग्ध श्रोता


IMG_4919चमत्कृत दर्शक


IMG_4926ताकि सनद रहे...!


IMG_4935एकेडेमी के कोषाध्यक्ष द्वारा आभार-ज्ञापन


पुस्तक परिचय:
समाज-भाषाविज्ञान रंग-शब्दावली : निराला-काव्य
लेखिका- डॉ. कविता वाचक्नवी
पृष्ठ-२३१ मूल्य- रु.१५०/-

भारतीय चित्रकला
लेखक- नानालाल चमनलाल मेहता, आई.सी.एस.
पृष्ठ- १४४ मूल्य- रु.१५०/-

सूर्य विमर्श
सम्पादक- डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय
पृष्ठ-३२४ मूल्य- रु.१७५/-

प्रकाशक:
हिन्दुस्तानी एकेडेमी
१२, कमला नेहरू मार्ग
इलाहाबाद, .प्र.
२११००१
दूरभाष- ०५३२-२६००६२५


प्रस्तुति-
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
कोषाध्यक्ष- हिन्दुस्तानी एकेडेमी

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

नववर्ष की अनुपम भेंट: सूर्यविमर्श

हिन्दुस्तानी एकेडेमी में सूर्य षष्ठी समारोह की झलकियाँ आपने इन पन्नों पर देखी थीं। उसी समय हमारे मन में यह विचार आया कि सूर्य के सम्बन्ध में जो विस्तृत ज्ञान इधर-उधर विखरा पड़ा है उसे एक स्थान पर पुस्तक के रूप में जिज्ञासु पाठकों को उपलब्ध कराया जाय। उसी स्वप्न का साकार रूप यह अनुपम पुस्तक सूर्य विमर्श जो संस्था के सचिव डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय के अथक परीश्रम और दृढ़ इच्छा शक्ति का परिणाम है।






पुस्तक

सूर्य विमर्श (३२४ पृष्ठ)

प्रकाशक

हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

संपादक

डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय,
सचिव- हिन्दुस्तानी एकेडेमी

मूल्य

रू.१७५/- मात्र










वैदिक वाङ्‍मय से लेकर लौकिक संस्कृत वाङ्‍मय तक भगवान सूर्य की सर्वातिशायी महिमा प्रख्यापित है। सूर्य ही प्रत्यक्ष देवता हैं। वे संपूर्ण जगत के नेत्र और सभी जीवों की उत्पत्ति के स्थान है। सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत की आत्मा हैं। सूर्य आत्मा जगतस्तथुषश्च- ऋग्वेद। सूर्य से इस पृथ्वी पर जीवन है। सूर्य द्वारा ही सम्पूर्ण जगत धारण किया जा रहा है। सूर्य से ही यह प्रकाशित होता है। और उसी के द्वारा निःस्वार्थ भाव से इसका पालन किया जाता है। परात्पर रूप में सूर्य ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के भी स्वामी हैं। उन्हें ही देवता, यज्ञ और यज्ञों का फल भी बताया गया है। सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप है। सूर्य की आराधना चिन्ता और शोक को मिटाने वाली है और आयुर्वर्धक है। यह अज्ञान, जड़ता और अन्धकार का नाशक है। यह सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है।

सूर्य के इन्हीं स्वरूपों, शक्तियों एवं महिमा को केन्द्र में रखकर इस अद्‍भुत ग्रन्थ का सम्पादन किया गया है। न केवल वेदों, उपनिषदों व पुराणों में सूर्य के विविध रूपों, गुणों, एवं कर्मों का वर्णन इस पुस्तक में है अपितु सूर्य का आधुनिक वैज्ञानिक स्वरूप भी वेवेचित किया गया है। सूर्य से सम्बन्धित कोई भी पक्ष अछूता न रहे इसका यथा सम्भव प्रयास पुस्तक में दृष्टिगोचर होता है।



विषयानुक्रम



कालिदास की रचनाओं में तपश्चचर्या एवं सूर्योपासना
प्रो. सुरेश चन्द्र पाण्डेय पृ.सं.११

सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च- एक विश्लेषण
प्रो. विनोद चन्द्र श्रीवास्तव पृ.सं.१६

‘सोऽस्तु सूर्य: श्रिये व:’ मयूर-विरचित सूर्यशतक : एक चर्चा
डॉ.जगन्नाथ पाठक पृ.सं.२०

विष्णुसहस्रनाम में सूर्य तत्त्व
गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव पृ.सं.२६

सूर्य: विज्ञान की दृष्टि में
डॉ.जयन्त नाथ त्रिपाठी पृ.सं.३२

सूर्योपासना : चिकित्सा के सन्दर्भ में
डॉ.भगवत शरण शुक्ल पृ.सं.३९

भारतीय कला में सूर्य का अंकन
डॉ.विमल चन्द्र शुक्ल पृ.सं.४४

सूर्योज्योति: ज्योति: सूर्य:
डॉ.करुणा अग्रवाल पृ.सं.४८

उणादिकोष में सूर्य सन्दर्भ
डॉ.आनन्द कुमार श्रीवास्तव पृ.सं.५२

ऋग्वेद में सूर्य तत्त्व
डॉ.रामनरेश त्रिपाठी पृ.सं.६०

ज्योतिष में सूर्य जनित अनिष्ट योग
डॉ.सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय पृ.सं.६७

वास्तुमण्डल में सूर्य
डॉ.शैलजा पाण्डेय पृ.सं.८२

सूर्यषष्ठी
डॉ.शैल कुमारी मिश्र पृ.सं.८८

सूर्य महिमा एवं सूर्योपासना
डॉ.राममुनि पाण्डेय पृ.सं.९३

ब्रह्मपुराण में सूर्य माहात्म्य
डॉ.कमलेश कुमार त्रिपाठी पृ.सं.९८

सूर्य का धारण-आकर्षण विज्ञान
डॉ.उर्मिला श्रीवास्तव पृ.सं.१०३

वेदों में सूर्यवाची शब्दों की सार्थकता
डॉ.राजेन्द्र त्रिपाठी ‘रसराज’पृ.सं.१०९

ब्रह्मवैवर्तपुराण की दृष्टि में सूर्य
डॉ.सुरेन्द्र पाल सिंह पृ.सं.११५

सूर्यपूजा और कोणार्क : मूक इतिहास एवं मुखर किंवदन्तियाँ
डॉ.बनमाली विश्वाल पृ.सं.१२९

लौकिक सूर्य का भौतिक परिचय
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी पृ.सं.१४६

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में सूर्य की अवस्थिति
डॉ.गिरिजा शंकर शास्त्री पृ.सं.१६६

भविष्य पुराण में सूर्य
डॉ.दीपा अग्रवाल पृ.सं.१७९

सूर्य की कतिपय विशिष्ट प्रतिमायें
डॉ.ओमप्रकाश लाल श्रीवास्तव पृ.सं.१८३

सूर्य तत्त्व
डॉ.जनार्दन प्रसाद पाण्डेय पृ.सं.

वैदिक देवता सूर्य
डॉ.पुष्पलता अग्रवाल पृ.सं.१९४

लौकिक संस्कृत वाङ्‌मय में ‘सूर्य’
डॉ.निरुपमा त्रिपाठी पृ.सं.१९८

वेदों में सूर्य व उसकी अभिराम किरणें
डॉ.अर्चना सिंह पृ.सं.२०२

पूर्वी भारत में ही सूर्यषष्ठी व्रत क्यों?
डॉ.जयनारायण मिश्र पृ.सं.२०५

वास्तु विज्ञान में सूर्य विचार
डॉ.सोम प्रकाश पाण्डेय पृ.सं.२०७

सूर्य विश्लेषण- ज्योतिष की दृष्टि में
डॉ.राकेश कुमार पाण्डेय पृ.सं.२१२

सूर्य विज्ञान प्रणेता योगीराजाधिराज विशुद्धानन्द परमहंस
डॉ.मीता बनर्जी पृ.सं.२१७

जगदात्मा सूर्यदेव
डॉ.सावित्री दुबे पृ.सं.२२४

ऋग्वेद में सूर्य एवं सूर्य-ऊर्जोत्पत्ति विज्ञान
डॉ.अपराजिता मिश्रा पृ.सं.२२७

कलचुरि अभिलेखों में सूर्य एवं सूर्य पुत्र रेवन्त
डॉ.सत्यप्रकाश श्रीवास्तव पृ.सं.२३१

प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान और सूर्य
हिमांशु पाण्डेय पृ.सं.२३४

आदित्याय नम¨ नम:
डॉ.कनक लता दुबे पृ.सं.२३८

श्रीमद्भागवत महापुराण में सूर्य महिमा
डॉ.मालागुहा मजुमदार पृ.सं.२४१

सूर्य पुराण - एक विश्लेषण
योगेश कुमार पाण्डेय पृ.सं.२४५

वैदिक संहिताओं में सूर्य विज्ञान एवं वृष्टि विज्ञान में सूर्य की स्थिति
डॉ.अनिता सेनगुप्ता पृ.सं.२४९

द्वादशादित्य
डॉ.बीना मिश्रा पृ.सं.२५३

संस्दृत में सूर्य की अवधारणा
डॉ.रुबी वर्मा पृ.सं.२६१

सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च
सुरचना त्रिवेदी पृ.सं.२६७

पुराणेषु सूर्यतत्त्वम्
आचार्य दिवाकर मिश्र पृ.सं.२७२

वास्तुशास्त्र और सूर्य
डॉ.विजय कर्ण पृ.सं.२७६

पुराणों में सूर्य तत्त्व प्रतिष्ठा
डॉ.सुनीता जायसवाल पृ.सं.२८०

पुराणेषु सूर्यतत्त्वम्
डॉ.स्मिता अग्रवाल पृ.सं.२८६

सूर्य: ऊर्जा का अक्षय स्रोत (वैदिक परिप्रेक्ष्य में)
डॉ.कौमुदी श्रीवास्तव पृ.सं.२९१

सूर्योपासना की प्राचीन परम्परा और प्रयाग
डॉ.मीनू अग्रवाल पृ.सं.२९५

सूर्य की वैदिक कालीन अवधारणा
डॉ.ज्योति कपूर पृ.सं.३०१

वृष्टि विज्ञान में सूर्य की स्थिति
डॉ.अरुण कुमार त्रिपाठी पृ.सं.३०४

अग्निपुराण में सूर्य वर्णन
सन्तोष कुमार मिश्र पृ.सं.३१०

वैदिक देव सूर्य- एक अवलोकन
वीरेन्द्र कुमार मौर्य पृ.सं.३१३

सूर्यतत्त्व विमर्श
प्रो. यदुनाथ प्रसाद दुबे पृ.सं.३१६

चाक्षुषोपनिषद्
पृ.सं.३२१

आदित्यहृदय स्तोत्रम्
पृ.सं.३२२

महाभारत में युधिष्ठिर कृत सूर्य की स्तुति
पृ.सं.३२४

उम्मीद है आपको यह पुस्तक पसन्द आएगी। बस आदेश भेजिए। पुस्तकें हम अपने डाक व्यय पर उपलब्ध कराएंगे।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

कोषाध्यक्ष- हिन्दुस्तानी एकेडेमी

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