हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जन सूचना अधिकार का सम्मान

जनसूचना अधिकारी श्री इंद्रजीत विश्वकर्मा, कोषाध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी,इलाहाबाद व मुख्य कोषाधिकारी, इलाहाबाद। आवास-स्ट्रेची रोड, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद कार्यालय-१२ डी,कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
प्रथम अपीलीय अधिकारी श्री प्रदीप कुमार्, सचिव,हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व अपर जिलाधिकारी(नगर्), इलाहाबाद। आवास-कलेक्ट्रेट, इलाहाबाद कार्यालय-१२डी, कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
दूरभाष कार्यालय - (०५३२)- २४०७६२५
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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

काव्य संग्रह- केदार सम्मान के कवि

हिंदुस्तानी एकेडेमी की अनुपम भेंट

‘केदार शोध पीठ न्यास’ द्वारा प्रतिवर्ष समकालीन हिंदी कवियों में से ऐसे कवि को चयनित कर केदार सम्मान प्रदान किया जाता है जिन्होंने अपनी कविता से केदार नाथ अग्रवाल की जातीय काव्य परंपरा, सौंदर्य, प्रेम और संघर्ष की चेतना को आगे बढ़ाया है। वर्ष 1996 से प्रारम्भ किए गये इस पुरस्कार से अबतक चौदह समकालीन रचनाकारों को सम्मानित किया जा चुका है। हिंदुस्तानी एकेडेमी ने गुणवत्तायुक्त साहित्य के प्रकाशन की अपनी समृद्ध परंपरा का निर्वाह करते हुए इन चौदह पुरस्कृत कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन प्रकाशित किया है। इन कवियों का विवरण निम्नवत है:

वर्ष

कवि

पुरस्कृत कृति

1996

नासिर अहमद सिकंदर

जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में

1997

एकांत श्रीवास्तव

अन्न हैं शब्द मेरे

1998

कुमार अंबुज

क्रूरता और अनंतिम

1999

विनोद दास

वर्णमाला से बाहर

2000

गगन गिल

यह आकांक्षा समय नहीं

2001

हरीश चंद्र पांडे

एक बुरूँश कहीं खिलता है

2002

अनिल कुमार सिंह

पहला उपदेश

2003

हेमंत कुकरेती

चाँद पर नाव

2004

नीलेश रघुवंशी

पानी का स्वाद

2005

आशुतोश दुबे

असंभव सारांश

2006

बद्री नारायण

शब्दपदीयम्‌

2007

अनामिका

खुरदुरी हथेलियाँ

2008

दिनेश कुमार शुक्ल

ललमुनिया की दुनिया

2009

अष्टभुजा शुक्ल

दुःस्वप्न भी आते हैं

front-coverमुखपृष्ठ kedar samman -flapफ्लैप

हिंदुस्तानी एकेडेमी के सचिव श्री प्रदीप कुमार ने अपने प्रकाशकीय आलेख में इस पुस्तक की उपादेयता पर प्रकाश डाला है। (बड़ा करके पढ़ने के लिए नीचे के आलेख पर क्लिक करें)

प्रकाशकीय प्रकाशकीय-२

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(पिछला आवरण पृष्ठ- सम्पादक त्रयी के परिचय के साथ)

आशा है यह संकलन काव्य साहित्य के पारखी आलोचकों, अध्येताओं, विद्यार्थियों व सामान्य पाठकों, के लिए अत्यंत उपयोगी होगा।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

बीसवीं शताब्दी हाशिए की शताब्दी थी: विभूति नारायन राय

जन्मशती उत्सव कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए कुलपति का उद्‌बोधन

इस वर्ष हिंदी के चार महान कवियों के जन्म के सौ साल पूरे हुए हैं। शमशेर, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन अब से सौ साल पहले पैदा हुए। उनका जीवन बीसवीं सदी का साक्षी रहा। उन्होंने जो कुछ लिखा उसमें उनके देश और काल की छाया स्वाभाविक रूप से परिलक्षित होती है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा इन चार कवियों की जन्मशती मनाने के बहाने बीसवी सदी का सिंहावलोकन करने के उद्देश्य से साहित्यिक गोष्ठियों की एक शृंखला प्रारम्भ किया जा रहा है। ये कार्यक्रम देश के विभिन्न शहरों में आयोजित होंगे। समापन कार्यक्रम दिल्ली में होगा।  इसी शृंखला का उद्घाटन कार्यक्रम आज गांधी-जयंती के अवसर पर वर्धा स्थित विश्वविद्यालय प्रांगण में आयोजित हुआ।

उद्‌घाटन सत्र की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध समालोचक निर्मला जैन ने किया और उद्घाटन वक्तव्य विश्वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह ने दिया। वक्ताओं द्वारा चारो कवियों की तुलनात्मक चर्चा की गयी। इस ब्लॉग की पिछली दो पोस्टें उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान ‘लाइव’ (यहाँ और यहाँ) प्रकाशित की गयीं।

DSC03350विषय प्रवर्तन- विभूति नारायण राय 

DSC03352 नामवर सिंह व निर्मला जैन

सबसे पहले विषय प्रवर्तन करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने इस कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए बताया कि कोई भी रचना न सिर्फ़ इसके रचनाकार के व्यक्तित्व का आइना होती है बल्कि उसके देश-काल के बारे में भी बहुत कुछ बताती है। साहित्यकार अपने समाज और देश-काल के बारे में बहुत संवेदनशील होता है, इसलिए उसकी कृतियाँ उसके समय का ऐतिहासिक दस्तावेज होती हैं। इन चार कवियों के रचना संसार में विचरण करते हुए हम बीसवीं सदी  में भी विचरण कर रहे होते हैं। इस प्रकार इस पूरे कार्यक्रम का एक उद्देश्य तो हिंदी साहित्य के इन चार महान विभूतियों व उनके रचनाकर्म के प्रति सम्मान की भावना को रेखांकित करने का है तो दूसरा उद्देश्य बीसवीं शताब्दी की प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास भी है।

बीसवीं शताब्दी को यदि एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं उसे हाशिए की शताब्दी कहना चाहूंगा। इस सदी में उपनिवेशवाद का अंत हुआ, लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ स्थापित हुईं और सदियों से समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग- जैसे दलित, आदिवासी और स्त्रियाँ- पहली बार मनुष्य का जीवन जीने का अवसर पा सके। इससे पहले हाशिए पर अटके लोगों के मानवाधिकार समाज के प्रभु वर्ग द्वारा अपहृत कर लिए गये थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई और विश्व मानवाधिकारों के चार्टर की घोषणा हुई तो मानव सभ्यता को जो उपहार मिला वह किसी भी धार्मिक पुस्तक से नहीं मिल पाया था।

इस कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण में नामवर जी ने बीसवी सदी को सर्वाधिक क्रांतिकारी घटनाओं की शताब्दी बताया। ऐसी शताब्दी जिसमें दो-दो विश्वयुद्ध हुए, विश्व की शक्तियों के दो ध्रुव बने, फिर तीसरी दुनिया अस्तित्व में आयी। समाजवाद का जन्म हुआ। सदी का अंत आते-आते इन ध्रुवो के बीच की दूरी मिटती गयी। तीसरी दुनिया भी बाकी दुनिया में मिलती गयी और समाजवाद प्रायः समाप्त हो गया। नामवर जी ने नागार्जुन की प्रशंसा करते हुए कहा कि बाबा ने काव्य के भीतर बहुत से साहसिक विषयों का समावेश कर दिया जो इसके पहले कविता के संभ्रांत समाज में वर्जित सा था। दलितों, म्लेच्छों, वंचितों और शोषितों को उन्होंने अपनी कविता में पिरोकर प्रभु वर्ग के सामने खड़ा कर दिया। चमरौंधा जूता पहनाकर ए.सी. ड्राइंग रूम में घुसा दिया। ऐसे पात्र इससे पहले प्रेमचंद की कहानियों में ही पाये जाते थे। नागार्जुन के दोहे सुनाकर उन्होंने दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

खड़ी हो गयी चाँपकर कंकालों की हूक।

नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक॥

जली ठूठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक

बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक

कार्यक्रम में निर्मला जैन ने अध्यक्षीय भाषण दिया जिसका संक्षिप्त व्यौरा पिछली ‘लाइव’ पोस्ट में दे चुका हूँ।

अभी प्रथम दिवस का दूसरा सत्र चल रहा है जो अज्ञेय पर केंद्रित है। इस सत्र के प्रमुख वक्ता हैं- प्रो. गंगा प्रसाद विमल, राजकिशोर, प्रो. बलराम प्रसाद त्रिपाठी, सुरेन्द्र वर्मा, डॉ. विजय शर्मा, डॉ. कृपाशंकर चौबे, मनोज कुमार पांडेय, शशिभूषण। कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के रीडर शंभू गुप्त जी कर रहे हैं।

 

DSC03364द्वितीय सत्र में मंचासीन- (दाएँ से) राजकिशोर, कृपाशंकर चौबे, सुरेंद्र वर्मा, गंगा प्रसाद विमल, बलराम प्रसाद त्रिपाठी, शम्भू गुप्त 

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विपुल दर्शक दीर्घा- कुलपति विभूति नारायण राय (कुर्ते में) राजकिशोर जी को सुनते हुए।

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

बुधवार, 26 मई 2010

नलविलास-परिशीलन (Nal Vilas Parishilan : Dr. Arun Kumar Tripathi)

नलविलास-परिशीलन
लेखक : डॉ० अरुण कुमार त्रिपाठी
संस्करण : प्रथम २००९ ई०
मूल्य : २२५/- रुपये दो सौ पच्चीस मात्र
प्रकाशक : सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद।
मुद्रक : एकेडेमी प्रेस, दारागंज, इलाहाबाद।
पृष्ठ : ३६२
आकार एवं आवरण : डिमाई सजिल्द

प्रकाशकीय

लौकिक संस्कृत साहित्य में रामायण और महाभारत दो ऐसे उपजीव्य काव्य हैं जिन पर परवर्ती संस्कृत व हिन्दी साहित्य आश्रित रहा है। कवियों ने अपनी कृति के लिए कथानक का चयन बहुधा रामायण व महाभारत के ही विविध प्रसंगों से किया है। यह जरूर है कि कवि की प्रतिभा व मेधा ने उन कथानकों में अपने हिसाब से रस, छन्द, अलंकार, गुण, वृत्ति व रीति का प्रयोग करके उसे अत्यधिक आकर्षक व रुचिकर बना दिया। जैन महाकवि श्री रामचन्द्र सूरि ने महाभारत की नल दमयन्ती की कथा को उपजीव्य बनाकर नलविलास की रचना बारहवीं शताब्दी ई० में की। यद्यपि नलविलास की रचना पर रायण के नल चरित्र वर्णन का भी प्रभाव परिलक्षित होता है। अनेक जैन विद्वानों की भांति श्री रामचन्द्र सूरि की रचनाओं से मां भारती का भण्डार समृद्ध हुआ है। कवि रामचन्द्र सूरि नाटकों के प्राणभूत रसों को चरमोत्कर्ष तक पहुंचाने वाले नाटककार हैं। उनके नाटक की शैली सरल, सुबोध एवं रसवती हैं। रामचन्द्र सूरि के बारे में कहा जाता है कि वे शताधिक ग्रन्थों के रचयिता थे। वे प्रतिभाशाली कवि व नाटककार के साथ-साथ नाट्‌य शास्त्र के भी उद्‌भट आचार्य थे। ये संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचन्द्र के शिष्यों में अग्रणी थे। श्री सूरि जयसिंह सिद्धराज एवं उनके उत्तराधिकारी कुमारपाल की सभा के विद्वानों में अन्यतम थे।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने विगत वर्षों में ऐसे ग्रन्थों के प्रकाशन व पुनर्प्रकाशन का संकल्प लिया है जिनसे सारस्वत भण्डार की अभिवृद्धि होने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन हो। नल विलास परिशीलन ऐसे ही प्रकाशनों की एक कड़ी है। डॉ० अरुण कुमार त्रिपाठी ने अपनी प्रतिभा एवं खोजी वृत्ति के द्वारा नलविलास के विभिन्न पक्षों एवं प्रसंगों का विद्वत्तापूर्ण विवेचन किया है, जिससे ग्रन्थ अत्यन्त आकर्षक, सुरुचिपूर्ण एवं सरस बन गया है। मेरा विश्वास है कि 'नलविलास-परिशीलन' संस्कृत व हिन्दी साहित्य की कोश वृद्धि करने के साथ-साथ लक्षण ग्रन्थों जैसे काव्यशास्त्र व नाट्‌यशास्त्र के विभिन्न लक्षणों को व्याखयायित करेगा। आशा है कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी के गौरवशाली प्रकाशनों की श्रृंखला में प्रस्तुत पुस्तक 'नलविलास - परिशीलन' भी हिन्दी व संस्कृत के विद्वत्समाज में समान रूप से समादृत होगा।

दिनांक ५ जनवरी २००९
डॉ० एस०के० पाण्डेय
अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व)
इलाहाबाद एवं
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

पुस्तक-लोकार्पण समारोह

पुस्तक-लोकार्पण समारोह


हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान में २८ अप्रैल २०१० दिन बुधवार अपराह्‌न 5:00 बजे एकेडेमी के सभागार में पुस्तक-लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथ श्री विभूति नारायण राय, अध्यक्ष श्री दूधनाथ सिंह, श्री दिनेश कुमार शुक्ल, श्री शीतला प्रसाद श्रीवास्तव जी ने दीप प्रज्ज्वलित करके एवं सरस्वती जी के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ। प्रकाश त्रिपाठी ने कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत किया। हिन्दुस्तानी एकेडेमी की सद्यः प्रकाशित पुस्तकों चिद्‌यात्रा (कविता संकलन) - शीतला प्रसाद श्रीवास्तव, जगदीश गुप्त : व्यक्ति और काव्य- डॉ० प्रकाश त्रिपाठी, रहीम की काव्य-भाषा - डॉ० प्रकाश त्रिपाठी, हिन्दी व्यंग्य और शरद जोशी - डॉ० कमलेश सिंह का लोकार्पण मुख्य अतिथ वी०एन० राय, दूधनाथ सिंह और दिनेश कुमार शुक्ल ने किया। चारों पुस्तकों पर चर्चा करते हुए मुश्ताक अली ने कहा कि यह विमोचन समारोह अनस्टेबलिश्ड लोगों का एक उपक्रम है। इन चारों किताबों में सर्जनात्मक किताब है चिद्‌यात्रा। इसमें ९४ कविताएं संकलित हैं। किन्तु कवि शीतला प्रसाद श्रीवास्तव जी स्वयं को कवि नहीं मानते। उन्होंने अपनी पहली कविता में लिखा है ''जी नहीं मैं कवि नहीं हूं पर कविता रचता हूं।'' उन्होंने अपनी कविताओं में आम आदमी की बात कही है। आज की व्यवस्था में आम आदमी कितना बेचारा हैं। इन सारी कविताओं में कवि एक मूल्य के लिए जीता है। रहीम की काव्यभाषा, जगदीश गुप्तः व्यक्ति और काव्य एवं हिन्दी व्यंग्य और शरद जोशी पुस्तक पर भी उन्होंने चर्चा की।

दिनेश कुमार शुक्ल जी ने चर्चा करते हुए कहा कि आने वाले समय में साहित्य किनारे किया जा रहा है। साहित्य में कटुता का वातावरण है। तटस्थ मूल्यांकन नहीं होता है। साहित्य की दुनिया में जो हाशिये में जा रहा उसके लिए प्रयास करें। इन पुस्तकों का प्रकाशन इसका छोटा सा प्रयास है। कवि शीतला प्रसाद जी सहज स्वभाव के हैं। उनकी कविताओं में सहजता, सरलता है। साहित्य का मंच व्यक्तिगत वैमनस्य निकालने का मंच नहीं होना चाहिए। कविता से ही संवेदना बनती है। जिस दिन आप संवेदनहीन हो जायेंगे ज्ञान भी आपसे दूर चला जायेगा। इसलिए कटुताओं को कम करें। ज्ञान व संवेदना को मिलाने की बात करें।

कार्यक्रम में कवि शीतला प्रसाद श्रीवास्तव जी ने कहा ''मैं इस क्षेत्र में नया हूं। इसलिए स्वयं को कवि नही मानता। कविता लिखी नहीं जाती, कविता का प्रादुर्भाव होता है।'' उन्होंने अपनी कुछ कविताओं को पढ़कर सुनाया।

कार्यक्रम के मुखय अतिथि विभूति नारायण राय ने कहा कि हिन्दी में बहुत दिन तक एक खास मानसिकता में साहित्य लिखा गया। साहित्य में कुछ लोगों का प्रवेश था। पत्रकार, अध्यापक ही साहित्यकार होता था। दूसरे पेशे का यदि कोई साहित्य में आता तो इन्हें अच्छा नहीं लगता। पुलिस जैसी नौकरी से तो खासकर। लेकिन अब समय बदला है। दूसरे पेशे से भी लोग आये उन्होंने जितना लिया उससे ज्यादा दिया। नये-नये शब्द तथा भाषा के नये अनुभव से नयी भाषा जुड़ी। पुलिस महकमें में तो जानवर बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। शीतलाप्रसाद जी के भीतर यदि मनुष्य बचा है तो वह उनके साहित्य से जुड ने के कारण, जो उनकी कविताओं में दिखाई पड ता है। नये साहित्य प्रेमियों के प्रति भी सहृदय होना पड़ेगा। हिन्दी व्यंग्य पर अगर कोई भी काम करेगा तो उसे हिन्दी व्यंग्य और शरद जोशी किताब की आवश्यकता पड़ेगी। नये लोगों से ज्यादा अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

अध्यक्ष पद से दूधनाथ जी ने कहा कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी को अपने प्रकाशन की परम्परा और गौरव को बनाये रखना चाहिए। हिन्दुस्तानी एकेडेमी के प्रकाशनों का एक इतिहास रहा है। यहां से बहुत अच्छी-अच्छी किताबों का प्रकाशन हुआ है। उन्होंने चिद्‌यात्रा पर चर्चा करते हुए कहा कि कविता में एक बिम्बात्मक अलंकृति होती है। विवरण भी हो तो बिम्ब होना चाहिए।जो कि रघुवीर सहाय जी की कविताओं में पाया जाता है। यदि बिम्बात्मक अलंकृति न हो तो वह विवरण जैसी लगने लगती है।

कार्यक्रम के अन्त में एकेडेमी के कोषाध्यक्ष सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए सभी उपस्थित साहित्य प्रेमियों का आवाहन करते हुए कहा कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी की समृद्ध परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए सबका दायित्व है कि वे हिन्दी और उर्दू भाषा और साहित्य के विकास हेतु अपना सक्रिय योगदान दें।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
कोषाध्यक्ष

शनिवार, 26 सितंबर 2009

हिन्दी चिठ्ठों की किताब के लिए अपनी चुनिन्दा पोस्ट भेंजिए...।

हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में अनेक प्रतिष्ठित लेखक और साहित्यकार अपनी रचनाएं अन्तर्जाल पर प्रकाशित कर रहे हैं लेकिन उससे कहीं बड़ी संख्या ऐसे ब्लॉगलेखकों की है जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता के नैसर्गिक प्रवाह को यूँ ही निसृत होने दिया है। अपनी मस्ती में डूबे हुए ये अनूठे चिठेरे इस चक्कर में ही नहीं पड़ते कि उनका लिखा हुआ साहित्य की कोटि में रखा जाता है कि नहीं। बहुत से ब्लॉग लेखक ऐसे भी हैं जो अपनी पोस्टों के माध्यम से समाज, संस्कृति, राजनीति, घर-परिवार, विज्ञान, इतिहास, भूगोल आदि के विषयों पर ज्ञान का असीमित भण्डार उड़ेल रहे हैं। यह सब कुछ हिन्दी ब्लॉग समुच्चय को एक क्लाइडोस्कोप का रुप गुण देता है।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी की स्थापना हिन्दुस्तानी (हिन्दी और उर्दू) भाषा को विकास की सीढ़ियों पर ले जाने वाले सभी सार्थक प्रयासों को एक ऐसा मंच देने के उद्देश्य से हुई थी जहाँ मौलिक प्रतिभाओं को अपनी रचनाधर्मिता को प्रकाशित कराने का अवसर मिले और विद्वानों-मनीषियों के शोधपरक कार्यों को सामान्य विद्यार्थियों, अध्येताओं और साहित्यानुरागियों के उपयोग हेतु सहज ढंग से उपलब्ध कराया जा सके। इन उद्देश्यों की पुर्ति के लिए एकेडेमी द्वारा करीब डेढ़ सौ अमूल्य पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है और साहित्यिक गोष्ठियों, व्याख्यान मालाओं, सेमिनार और प्रतिभा सम्मान समारोहों का आयोजन अनवरत किया जाता रहा है।

अपनी इसी उत्कृष्ट परम्परा के निर्वहन के क्रम में हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के सौजन्य से हिन्दी ब्लॉगिंग के सम्बन्ध में एक राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार का आयोजन आगामी २३-२४ अक्टूबर, २००९ को किया जा रहा है। इस अवसर पर देश भर से अनेक चिठ्ठाकारों को आमन्त्रित कर अभिव्यक्ति के इस नये माध्यम के इतिहास, स्वरूप और प्रमुख प्रवृत्तियों पर दो दिवसीय चर्चा की जाएगी। इस अवसर पर पारम्परिक साहित्य जगत के अनेक प्रतिष्ठित विद्वान भी प्रतिभागी होंगे।
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इस अवसर पर एकेडेमी द्वारा एक पुस्तक का प्रकाशन कर उसके तत्समय लोकार्पण का निर्णय भी लिया गया है जिसमें लगभग पचास चिठ्ठाकारों की चुनी हुई एक-एक ब्लॉग पोस्टों को सम्मिलित कर एक प्रतिनिधि संकलन तैयार किया जाएगा। इसके लिए हिन्दी ब्लॉगर्स से प्रविष्टियाँ आमन्त्रित की जाती हैं। एक ब्लॉगर से केवल एक प्रविष्टि ही स्वीकार की जाएगी। हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा गठित सम्पादक मण्डल प्रविष्टियों के चयन पर विचार करेगा जिसकी संस्तुतियों के आधार पर पुस्तक का अन्तिम रूप निर्धारित किया जाएगा। एकेडेमी के ई-मेल पते (hindustaniacademy@gmail.com) पर अपनी प्रविष्टियाँ दिनांक ५.१०.२००९ की मध्यरात्रि तक अवश्य प्रेषित कर दें।

चिठ्ठाकार मित्रों द्वारा पुस्तक के शीर्षक व आवरण पृष्ठ के सम्बन्ध में यदि कोई सुझाव दिया जाता है तो उसका भी स्वागत है। यह पुस्तक हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से प्रिन्ट माध्यम के लिए एक अनुपम भेंट हो, यही हमारी आकांक्षा है।

सचिव - हिन्दुस्तानी एकेडेमी

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

अभिनन्दन, विमोचन के बहाने गुरु-महिमा पर चर्चा...

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्त्वावधान में गत शनिवार को एकेडेमी सभागार में संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रख्यात विद्वान, शिक्षक एवं राष्ट्रपति सम्मान से सुशोभित प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे का अभिनन्दन समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व कुलपति व प्रतिष्ठित मनीषी प्रो०गोविन्द चन्द्र पान्डेय ने की। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व कुलपति प्रो० के०बी० पाण्डेय समारोह के मुख्य अतिथि रहे।  दीप प्रज्ज्वालन के बाद डॉ. दिवाकर दीक्षित एवं उनके शिष्यों ने वैदिक मंगलाचरण से कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। लौकिक मंगलाचरण सुश्री स्मृति शुक्ला ने प्रस्तुत किया जो बहुत सराहा गया।। सचिव डॉ एस०के० पाण्डेय ने अतिथियों का स्वागत करते हुए अपने गुरू प्रो.सुरेश चन्द्र पाण्डेय जी की महनीय कर्तव्यपरायणता और सच्चे गुरूत्व की चर्चा की तथा लिखित अभिनन्दन पत्र का वाचन कर प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे को सम्मान स्वरूप अंगवस्त्र, नारियल तथा देवी सरस्वती की प्रतिमा के साथ समर्पित किया। इस अवसर पर प्रो०हरिदत्त शर्मा, प्रो०मृदुला त्रिपाठी, डॉ. गिरिजा शंकर शास्त्री, डॉ. राम मुनि पाण्डेय, श्री राजा राम उपाध्याय, डॉ मृदुला जायसवाल आदि ने प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे का वाचिक अभिनन्दन करते हुए अपने उद्‌गार व्यक्त किये।



इस समारोह में एकेडेमी से प्रकाशित निम्न चार पुस्तकों का लोकार्पण किया गया।



1. साहित्य-शेवधि’ (प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे अभिनन्दन ग्रन्थ) प्रधान सम्पादक - डॉ एस०के०पाण्डेय, मूल्य:३००/- पृष्ठ: ४३४

साहित्य-शेवधि 

 

2. राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश’ – डॉ. उमेश कुमार मिश्र मूल्य:११०/- पृष्ठ: १५२ राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश

 

3. चन्द्रालोक परिशीलन - डॉ स्मिता अग्रवाल मूल्य:२५०/- पृष्ठ: ३४०

चन्द्रालोक परिशीलन

 

4. नलविलास परिशीलन - डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी मूल्य:२२५/- पृष्ठ: २४४
नल-विलास परिशीलन

 

साहित्य शेवधि नामक अभिनन्दन ग्रन्थ में वस्तुतः प्रो. पाण्डेय के व्यक्तित्व के बारे में बहुत कम आलेख लिखे गये हैं (स्वयं गुरू जी ने अपने शिष्यों को मना कर दिया था।) इसमें संस्कृत और हिन्दी भाषा व साहित्य से जुड़े अनेक विद्वानों द्वारा विविध वि्षयों पर लिखित उत्कृष्ट कोटि के लगभग अस्सी लेख संकलित किये गये हैं। इन लेखकों में तीस प्रोफ़ेसर हैं और उन्चास शोध-उपाधि से सम्पन्न लेक्चरर और रीडर हैं। अनेक लेखक विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपति व विभागाध्यक्ष जैसे उच्च पदों पर आसीन हैं, या रहे हैं। गुरु-महिमा को रेखांकित करने वाला यह ग्रन्थ निश्चित रूप से पुस्तक प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अमूल्य धरोहर है।



‘राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश’ नामक पुस्तक में डॉ. उमेश कुमार मिश्र ने इस मध्ययुगीन गौरव ग्रन्थ मे उल्लिखित कश्मीर के कतिपय प्रसिद्ध राजाओं तथा मन्त्रियों का चरित्र बहुत रोचक शैली में प्रस्तुत किया है।



चन्द्रालोक परिशीलन में विद्वान लेखिका डॉ.स्मिता अग्रवाल ने अनुष्टुप छन्द में काव्यशास्त्रीय सिद्धान्त पर लिखे गये ग्रन्थ ‘चन्द्रालोक’ का परिशीलन किया है। इसमें कुल दस ‘मयूख’ हैं। इस लक्षण ग्रन्थ का साहित्य शास्त्रीय मूल्यांकन शोधार्थियों और उच्चस्तरीय अध्येताओं के लिए दिग्दर्शक का कार्य करेगा।



नलविलास-परिशीलन में डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी ने नल-दमयन्ती कथा के उद्भव को रेखांकित करते हुए इस कथानक पर आधारित ४१ ग्रन्थों का परिचय देते हुए इसमें से कुछ ग्रन्थों पर नाट्यशास्त्रीय विकास की दृष्टि से प्रकाश डाला है। ग्रन्थकार ने नाट्यदर्पण के प्रणेता जैनाचार्य श्री रामचन्द्र सूरि के विस्तृत परिचय के साथ उनके ग्रन्थ नलविलास नाटक पर विशेष ध्यान आकृष्ट किया है।



उपर्युक्त पुस्तकों के लोकार्पण के बाद गुरुवर्य के सम्मान में उनके अनेक शिष्यों ने अभिनन्दन करते हुए उनके प्रति श्रद्धा और आभार का भाव व्यक्त किया। सभा की अध्यक्षता करते हुए प्रो०गोविन्द चन्द्र पाण्डेय ने कहा कि प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे बहुत स्पष्टवादी तथा सरल बात कहने वाले हैं। मैं समझता हूँ कि सही मनुष्य को पहचानने के लिए सबसे सरल तरीका है उसकी जीवन शैली को जानना। एक उत्कृष्ट व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है कि उसकी बातें  खरी, तथा सीधी-सरल होनी चाहिए तथा आचार विचार सरल होना चाहिए। पाण्डे जी में ये दोनो बातें हैं इसलिए मेरे मन में उनके लिए बहुत आदर है।



मुख्य अतिथि प्रो०के०बी० पाण्डेय जी ने सभा को सम्बोधित करते हुए गुरू की तुलना माता से करते हुए कहा कि "माता को एक सत्पुत्र को जन्म देने और सत्पुरुष बनाने में कितना कष्ट होता है। प्रो०पाण्डे तो सैकड़ों सत्पुत्रों के सारस्वत जन्मदाता हैं और उनको सत्पुरुष बनाने में कितना कष्ट हुआ होगा इसका सहज अनुमान किया जा सकता है। अत: प्रो०पाण्डे तो अभिनन्दनीय हैं ही। मुख्य अतिथि ने बताया कि प्रो०पाण्डे पर गीता का श्लोक ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां’ को अक्षरश: चरितार्थ है।



कार्यक्रम का संचालन डॉ आनन्द कुमार श्रीवास्तव ने किया तथा कार्यक्रम के अन्त में एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने उपस्थित विद्वानों, अतिथियों, दर्शकों, श्रोताओ, और मीडिया के लोगों को एकेडेमी की ओर से धन्यवाद ज्ञापित किया।



(प्रस्तुति: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रविवार, 16 अगस्त 2009

हिन्दी ब्लॉगजगत का एक झरोखा: सत्यार्थमित्र... (पुस्तक चर्चा)



प्रकाशकीय

अंग्रेजी शब्द ‘ब्लॉग’ वेब-लॉग का संक्षिप्त रूप है जो अमेरिका में १९९७ ई. के दौरान अन्तर्जाल (इण्टरनेट) पर प्रचलन में आया। प्रारम्भ में कुछ ऑनलाइन पत्रिकाओं के ‘लॉग’ प्रकाशित किये जाते थे, जिनमें वेबसाइट के विभिन्न हिस्सों में प्रकाशित विविध सामग्रियों के लिंक दिये गये होते थे तथा साथ में इनके लेखकों की संक्षिप्त टिप्पणियाँ होती थीं। कालान्तर में इन्हें ही ‘ब्लॉग’ कहा जाने लगा और इनके लेखक ‘ब्लॉगर’ कहलाए।

ब्लॉग को विश्व के आम लोगों में भारी लोकप्रियता उस समय मिली जब अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के दौरान एक अमेरिकी सैनिक ने अपने युद्ध सम्बन्धी अनुभव को ब्लॉग के माध्यम से दैनिक आधार पर प्रकाशित करना प्रारम्भ किया। उस समय एण्ड्र्यू सुलीवान के ब्लॉग पृष्ठ को आठ लाख से अधिक लोगों ने खोला व पढ़ा। पाठकों की इतनी बड़ी संख्या प्रिन्ट माध्यम के अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशनों से आगे निकल गयी थी। देखते ही देखते १९९७-९८ के महज दर्जन भर ब्लॉगों से प्रारम्भ होने वाला सहज अभिव्यक्ति का यह नया माध्यम केवल चार वर्षों में दस लाख का आँकड़ा पार कर गया।

शीघ्र ही विश्व की प्रत्येक भाषा में सभी कल्पनीय विषयों और अकल्पनीय मुद्दों पर भी ब्लॉग लिखे जाने लगे। हिन्दी भाषा का प्रथम ब्लॉग नौ दो ग्यारह (९-२-११) प्रारम्भ करने का श्रेय बंगलुरू निवासी आलोक कुमार को जाता है, जिन्होंने पहली बार ब्लॉग को ‘चिठ्ठा’ नाम दिया और इस प्रकार वे ‘आदि-चिठ्ठाकार’ कहलाए। इस चिठ्ठे में उन्होंने कम्प्यूटर जगत के तकनीकी और अपने अन्य व्यक्तिगत अनुभवों को नियमित रूप से प्रकाशित किया। इलाहाबाद की छात्रा रह चुकी डॉ. पूर्णिमा बर्मन द्वारा हिन्दी में संचालित साप्ताहिक अन्तर्जाल पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ में रवि प्रकाश श्रीवास्तव (रवि रतलामी) ने एक आलेख प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था- अभिव्यक्ति का नया माध्यम: ब्लॉग। इस प्रकार के प्रयासों से हिन्दी ब्लॉग लेखन के कार्य में शनैः शनैः प्रगति होने लगी। प्रारम्भिक चिठ्ठाकारों में रवि रतलामी, देबाशीष, जीतेन्द्र चौधरी, अतुल अरोरा, अनूप शुक्ल, पंकज नरूला इत्यादि प्रमुख रहे।

अप्रैल २००३ में प्रारम्भ होने के बाद हिन्दी भाषा के चिठ्ठों की संख्या में वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। करीब छः साल बाद भी अभी कुल हिन्दी चिठ्ठों की संख्या दस हजार के आसपास ही है। इनमें भी नियमित रूप से सक्रिय रहने वाले हिन्दी चिठ्ठे ढाई हजार के आसपास ही हैं। वर्तमान में यह माध्यम तेजी से बढ़ रहा है। प्रतिदिन औसतन पच्चीस-तीस नये ब्लॉग हिन्दी ब्लॉग जगत से जुड़ रहे हैं। ब्लॉगर और वर्डप्रेस जैसे जालघर मुफ़्त में ब्लॉग लिखने और प्रकाशित करने की सुविधा देते हैं। ब्लॉग लेखक को कम्प्यूटर तकनीक का भी प्रारम्भिक ज्ञान ही पर्याप्त होता है।

ब्लॉगों की लोकप्रियता और अन्तर्जाल से जुड़े प्रबुद्ध वर्ग के लिए इसकी सहजता और सरलता ने प्रिन्ट माध्यम में भी इनकी चर्चा को अपरिहार्य बना दिया है। प्रायः सभी अखबारों और पत्र पत्रिकाओं द्वारा हिन्दी ब्लॉग जगत में प्रकाशित होने वाली रोचक और ज्ञान बर्द्धक जानकारी को अपने पृष्ठों में प्रमुख स्थान दिया जा रहा है। अनेक कवि, लेखक, पत्रकार, स्तम्भकार, वैज्ञानिक, समाजसेवी और अन्य प्रबुद्ध पेशों से जुड़े लोग अपनी बात रखने के लिए इस माध्यम की ओर झुक रहे हैं। इस माध्यम से ज्ञान-विज्ञान, संगीत, कला, संस्कृति, राजनीति, व्यापार, इतिहास, परिवार व समाज आदि अनेकानेक विषयों पर विचारों का आदान-प्रदान किया जा रहा है। ऐसे में पारम्परिक साहित्य के दृष्टिकोण से कुछ लोग ब्लॉग पर प्रकाशित सामग्री को साहित्य से इतर श्रेणी में रखने का विचार रख रहे हैं।

आचार्य मम्मट ने अपनी कालजयी कृति ‘काव्यप्रकाश’ के प्रथम उल्लास (खण्ड) में साहित्य के प्रयोजन की व्याख्या करते हुए बताया है कि साहित्य सृजन का उद्देश्य यश की प्राप्ति, अर्थोपार्जन, मानव व्यवहार का ज्ञान एवम्‌ अशुभ का शमन करना है। यह कार्य पत्नी के समान हितैषी और सद्‌प्रेरणा देने वाला होता है। इस दृष्टिकोण से देखा जाय तो ब्लॉग पर प्रकाशित अधिकांश सामग्री साहित्य की श्रेणी मॆं रखी जा सकती है। गुणवत्ता की दृष्टि से अच्छा और खराब कोटि का साहित्य इलेक्ट्रॉनिक और प्रिन्ट दोनो माध्यमों में समान रूप से पाया जाता है। ब्लॉग के माध्यम में चूँकि किसी प्रकार की मात्रात्मक सीमा या सम्पादकीय कैंची क्रियाशील नहीं है कदाचित्‌ इसलिए इसमें गुणवत्तायुक्त सामग्री का अनुपात थोड़ा कम हो सकता है। किन्तु इसका दूसरा पहलू यह है कि इस माध्यम में ब्लॉग लेखक को अपने विचार प्रकट करने की जो असीम और अनमोल स्वतन्त्रता मिली हुई है उससे उपजे साहित्य में एक अलग तरह की निर्दोष यायावरी और नैसर्गिक पारदर्शिता भी आ जाती है। मुक्त बाजार के नियम तो अपनी जगह हैं ही। यहाँ आना बेशक आसान है लेकिन ब्लॉग मंच पर सक्रिय बने रहना और निरन्तर आगे बढ़ते रहना उतना ही मुश्किल है। यहाँ वही जम पाएगा जिसमें दम होगा।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के प्रमुख उद्देश्यों में हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास के विविध सोपानों पर कदम मिलाकर चलते हुए इस अनुष्ठान में सक्रिय प्रतिभाग करना है। इसकी सिद्धि के लिए एक ओर जहाँ मूर्धन्य विद्वानों और मनीषियों की शोधपरक और कालजयी कृतियों को प्रकाशित कर प्रबुद्ध विद्यार्थियों और अध्येताओं को उत्कृष्ट विषय सामग्री उपलब्ध करायी जा रही है तो दूसरी ओर प्रतिभाशाली उदीयमान लेखकों और साहित्यकारों की उर्वर विचारभूमि से पैदा होने वाली नवीन रचनाओं को स्थान देकर उन्हें आम पाठक वर्ग में प्रतिष्ठित करने का प्रयास भी किया जाता है, ताकि वे बदलते युग के साथ तादात्म्य बिठाते हुए परम्परा और आधुनिकता का उत्कृष्ट सम्मिश्रण प्रस्तुत कर सकें। श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के ब्लॉग लेखों के संकलन का यह पुस्तकीय प्रकाशन इस उद्देश्य की कसौटी पर पूर्णतः खरा उतरता है।

पुस्तक: सत्यार्थमित्र (ब्लॉगपोस्ट संग्रह)
लेखक: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
प्रकाशक: हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
पृष्ठ सं. : २८८
मूल्य: रु. १९५/- मात्र

सरकारी उत्तरदायित्व के पद पर रहते हुए श्री त्रिपाठी ने व्यक्तिगत रूप में अपने आस-पास की दुनिया से संवेदना का जो रिश्ता कायम कर रखा है वह इनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकता है। “यह सरकारी ‘असरकारी’ क्यों नहीं है?” नामक पोस्ट में इनकी बेचैनी साफ झलकती है। बुजुर्ग पेंशनभोगियों की हालत बयान करती इनकी ग़ज़ल “हम हैं जिन्दा ये बताने का वक्त आया है” मन में सिहरन पैदा कर देती है। सरकारी नियम-कायदों के अनुपालन में कैसी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो सकती है इसका एक रोचक किस्सा “तिल ने जो दर्द दिया” में पढ़ने को मिलेगा। पारिवारिक और सामाजिक मुद्दों पर सिद्धार्थ जी की लेखनी बेजोड़ चलती है। “उफ़ ये मध्यम वर्ग”, “प्रकृति ने औरतों को क्या कम कष्ट दिए हैं?” और “लो, मैं आ गया सिर मुड़ाकर…” जैसे लेख इनकी प्रगतिशील सोच और रुढियों-आडम्बरों के विरुद्ध निर्भीक लेखन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। कम्प्यूटर कीऔर इन्टरनेट की दुनिया में गोते लगा रहे एक ब्लॉगर के व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में क्या परिवर्तन आ जाते हैं और उसे कैसी परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं इसकी झलक भी लेखक ने “समय कम पड़ने लगा है”, “ब्लॉगरी ने जिन्दगी बदल दी” जैसे लेखों में बखूबी दिखायी है। “किताबों की खुसर-फुसर” सुनकर उसे लिपिबद्ध कर देना एक विलक्षण प्रतिभा की ओर इशारा करता है। ‘पुराण चर्चा’ के माध्यम से श्री त्रिपाठी ने हमारे आदि ग्रन्थों में निहित अनेक रोचक और उपयोगी जानकारी खोजकर प्रस्तुत की है। ‘धुन्धकारी’ की कथा व ‘ढपोर शंख’ का आख्यान विशेष रोचक बन पड़ा है। कदाचित्‌ इसीलिए वर्तमान ब्लॉगजगत के शीर्ष पुरुष ज्ञानदत्त पाण्डेय ने शुरू में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि ‘सिद्धार्थ जी में उत्कृष्टतम ब्लॉगर बनने का पूरा रॉ-मटीरियल है।’

इस पुस्तक में जो आलेख सम्मिलित किये गये हैं वे अप्रैल २००८ से मार्च २००९ के बीच इनके नियमित ब्लॉग सत्यार्थमित्र पर प्रकाशित हुए हैं। सभी आलेख अत्यन्त रोचक, और भावपूर्ण शैली में लिखे गये हैं। गम्भीर और संवेदनशील विषय भी कहीं बोझिल नहीं हो पाये हैं। भाषा का प्रवाह और लालित्य पाठक को आद्योपान्त बाँधे रखता है। इन लेखों में जिस दुनिया की बात की गयी है वह हमारे आस-पास की सुपरिचित घरेलू दुनिया है जिसमें हम नित्य-प्रति साँस ले रहे हैं। यह पुस्तक उन साहित्य प्रेमियों के लिए विशेष उपयोगी और लाभप्रद है जो अभी इन्टरनेट की दुनिया से पूरी तरह नहीं जुड़ सके हैं। आशा है कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी के गौरवशाली प्रकाशनों की सृंखला में इस पुस्तक का सुधी पाठकों और साहित्यप्रेमियों द्वारा हृदय से स्वागत किया जाएगा।

हम इस पुस्तक के लेखक श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी को इस अनुपम कृति के प्रकाशन के अवसर पर साधुवाद देते हैं और उनके सफल और उज्ज्वल लेखकीय भविष्य की कामना करते हैं।

डॉ. एस. के. पाण्डेय
सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी
१२ डी, कमला नेहरू मार्ग, इलाहाबाद।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

पुस्तक चर्चा: एक संग्रहणीय ग्रन्थ



राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश
लेखक डॉ० उमेश कुमार मिश्र
मूल्य ११० रुपये पृष्ठ १५२ सजिल्द
प्रकाशन वर्ष २००९


वस्तुत: पूर्वाग्रह रहित होकर घटनाओं का यथातथ्य वर्णन करना ही इतिहास है। इस वैशिष्ट्य से युक्त राजतरंगिणी अपनी काव्यात्मक सरसता के कारण इतिहास ग्रन्थ के अतिरिक्त उत्कृष्ट काव्य भी है। इसके ऐतिहासिक, भौगोलिक, सामाजिक तथा राजनैतिक वर्णनों की प्रामाणिकता असंदिग्ध है, क्योंकि नीलमतपुराण इसका प्रमाण है, जो कल्हण के सामने था।
भारतवर्ष के प्राचीन काव्य रामायण तथा महाभारत के समान ही राजतरंगिणी मध्ययुगीन गौरवग्रन्थ है। यद्यपि इस ग्रन्थ में कश्मीर के कतिपय राजाओं तथा मंत्रियों का चरित्र ही लेखबद्ध किया गया है, तो भी तत्कालीन राजाओं, मंत्रियों के चारित्रिक विशेषताओं की पर्याप्त झलक मिल जाती है। साथ ही सम्यक् समीक्षण-दृष्टि के कारण ग्रन्थ की उपयोगिता कश्मीर की तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति की दृष्टि से अत्यधिक बढ़ जाती है।

प्रस्तुति: हिन्दुस्तानी एकेडेमी

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

कवि गोष्ठी सम्पन्न

इलाहाबाद ३ अगस्त, २००९। हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद के तत्वावधान में आज राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की जयन्ती को कवि-दिवस के रूप में मनाया गया। इस उपलक्ष्य में हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सभागार में एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया। Image000 गोष्ठी का शुभारम्भ एकेडेमी के सचिव डा० एस०के० पाण्डेय जी ने अपने स्वागत भाषण से किया। इस काव्य-गोष्ठी की अध्यक्षता श्री बुद्धिसेन शर्मा जी ने एवं संचालन श्री सुधांशु उपाध्याय जी ने किया। काव्य-गोष्ठी में श्री श्लेष गौतम, श्रीमती लक्ष्मी मिश्रा, श्री राजेश वर्मा, श्री गिरिजेश श्रीवास्तव ‘बन्धु’, श्री अमिताभ त्रिपाठी, श्री शैलेन्द्र श्रीवास्तव ‘मधुर’, श्री विवेक सत्यांशु, श्री जयप्रकाश शर्मा ‘प्रकाश’, डा० विजयानन्द, श्री अमरनाथ श्रीवास्तव, श्री यश मालवीय, ख्वाजा जावेद अख्तर, श्री हरिशंकर द्विवेदी एवं कु० मीनूरानी दुबे ने अपने काव्यपाठ से श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध किया। कार्यक्रम के अन्त में एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ने धन्यवाद ज्ञापित करके कार्यक्रम का समापन किया।

 

(डॉ०एस०के०पाण्डेय)
सचिव,
हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

शनिवार, 1 अगस्त 2009

राष्ट्रकवि की जयन्ती पर कवि सम्मेलन: हिन्दुस्तानी एकेडेमी में

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयन्ती पर सोमवार दिनांक ३ अगस्त, २००९ को अपराह्न ४:३० बजे एकेडेमी सभागार में कवि-गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। काव्य-गोष्ठी में सभी सादर आमंत्रित हैं।

 

 

(डॉ० एस०के० पाण्डेय) सचिव,

हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

सोमवार, 13 जुलाई 2009

पुस्तक चर्चा: चन्द्रालोक परिशीलन

 

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   चन्द्रालोक परिशीलन
लेखिका: डॉ० स्मिता अग्रवाल
मूल्य : २५० रुपये , पृष्ठ ३४० सजिल्द


 

प्रकाशन वर्ष २००९ 

 

 

‘चन्द्रालोक’ कोई साधारण ग्रन्थ नहीं है। दस मयूखों में विभक्त यह ग्रन्थ स्वयं में अनेक काव्यशास्त्रीय आचार्यों के सिद्धान्तों के मनन-चिन्तन पूर्वक निकाला गया नवनीत है। चन्द्रालोक की शैली नवीन एवं सूत्रात्मक है, जिसके कारण कहीं-कहीं पर आचार्य अपने सिद्धान्तों को स्पष्ट करने में असमर्थ हैं। अत: उनके ज्ञान हेतु पूर्ववर्ती एवं कतिपय पश्चाद्वर्ती आचार्यों के ग्रन्थों का अवलम्बन आवश्यक है।
आचार्य जयदेव संस्कृत काव्यशास्त्रीय आचार्यों के मध्य तक एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। जयदेव न केवल आलंकारिक हैं, अपितु ध्वनिवादी आचार्य भी हैं। जयदेव की दोनों कृतियॉं चन्द्रालोक तथा प्रसन्नराघव नाटक उनकी अद्भुत कविप्रतिभा एवं विलक्षणता को प्रकट करती है। चन्द्रालोक काव्यशास्त्र का ग्रन्थ है, तो प्रसन्नराघव नाट्यविद्या का ग्रन्थ। जयदेव कवि होने के साथ सहृदय एवं तार्किक भी हैं। उन्होंने न केवल अपने पूर्ववर्ती आचार्यों की परम्परा को आगे बढ़ाया, अपितु संस्कृत-साहित्य को ‘चन्द्रालोक’ के रूप में अनूठी, गूढ़, सैद्धान्तिक कृति प्रदान की।
चन्द्रालोक में काव्यस्वरूप से सम्बद्ध प्रत्येक मयूख नवीन सिद्धान्त को प्रतिपादित करता है। मम्मट के उत्तराधिकारी के रूप में यदि आचार्य जयदेव की कल्पना की जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जयदेव ने अपने ग्रन्थ का आधार मम्मट द्वारा प्रणीत काव्यप्रकाश को ही बनाया है। आचार्य अप्पयदीक्षित जो आचार्य जयदेव के अलंकार प्रसंग से अत्यन्त प्रभावित थे तथा चन्द्रालोक के पंचम मयूख को ही आधार बनाकर उन्होंने सम्पूर्ण ग्रन्थ ‘कुवलयानन्द’ की रचना की - उन्हें ग्रहण करने का यथेष्ट प्रयास ग्रन्थ में किया गया है। (

डॉ.एस.के.पाण्डेय)

रविवार, 7 जून 2009

पुस्तक चर्चा- हरि चरित: एक दुर्लभ धरोहर का प्रकाशन

हरि चरित्र अवधी भाषा का श्रीकृष्ण सम्बन्धी काव्य है। परम वैष्णव लालचदास कृत इस ग्रन्थ का रचनाकाल संवत् १५८७ बताया जाता है। हरि चरित्र में हरि गुनगान है- श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं का मनोहर वर्णन है जो श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध में पाई जाती हैं। हरि चरित्र इसलिए अपर नाम भागवत भाषा है। हरि चरित्र को एक पूरक कृतित्व कहा जाता है। रायबरेली उ०प्र० निवासी लालचदास ने अपने जीवन काल में इसके ४५ अध्यायों को ही लिखा था। उनके स्वर्गवास के पश्चात् उनके शिष्य आसानन्द ने पर्याप्त अन्तराल में इसे ९० अध्यायों में पूरा किया।

हरिचरित का मुखपृष्ठ

मूल्य ३७५ तीन सौ पचहत्तर रुपये मात्र
पृष्ठ ६५८ सजिल्द


हरि चरित्र में दोहा-चौपाई छन्द का प्रयोग हुआ है। यह काव्यग्रन्थ, रस, छन्द, अलंकार आदि काव्य सौष्ठवों से परिपूर्ण है। भाव व भाषा गाम्भीर्य के साथ भाषा में प्रवाह व सरसता है। इस भक्तिकाव्य को संकलित व सम्पादित करने का महान कार्य विज्ञान परिषद के प्रधानमंत्री प्रो० शिवगोपाल मिश्र ने किया है। ऐसे विलक्षण व महत्वपूर्ण अवधी भाषा के काव्य को सम्पादित कर प्रो० शिवगोपाल मिश्र ने मॉं सरस्वती के कोश में अभिवृद्धि की है।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी को ऐसी महनीय कृति प्रकाशित करते हुए न केवल अतिशय प्रसन्नता हो रही है अपितु गर्व की अनुभूति भी हो रही है। मुझे विश्वास है कि हरि चरित्र एकेडेमी के महत्वपूर्ण प्रकाशनों में अपना स्थान बनाएगा। आधुनिक हिन्दी के साथ-साथ अवधी, भोजपुरी व ब्रजभाषा के विद्वानों द्वारा भी यह ग्रन्थ समादृत होगा ऐसा मेरा अन्तर्मन कह रहा है। अस्तु।
रंग पंचमी, चैत्र कृष्ण
संवत् २०६५
डॉ० एस०के० पाण्डेय
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

गुरुवार, 14 मई 2009

हिन्दुस्तानी का विशेषांक: पण्डित विद्यानिवास मिश्र

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                                        सम्पादकीय
पंडित विद्यानिवास  मिश्र ऐसे विशाल वटवृक्ष के समान थे जिसकी सघनता में संस्कृति, परम्परा और संस्कारों के बीज प्रस्फुटित होते हैं। उन्हें भारतीयता, भारतीय संस्कृति और उसके मूल्य बोध से अपार लगाव था। वे पंक्ति पावन ब्राह्मण थे। वह ऐसे बुजुर्ग थे जिन्हें अपनी परम्परा, विश्वासों और आस्थाओं के प्रति अटूट निष्ठा थी, जिसे वह आजीवन निभाते रहे। धोती-कुर्ता और माथे पर चन्दन उनकी पहचान थी, जो देश हो या विदेश कभी नहीं मिटी। उनके जाने से रिक्त हुआ स्थान आज ज्यों का त्यों खाली पड़ा है। कहते हैं समय के साथ घाव भर जाता है पर यह घाव आज भी हरा है। इसके मिटने के आसार फिलहाल दिखाई नहीं पड़ते। ‘हिन्दुस्तानी’ का यह अंक उनकी स्मृतियों को समर्पित है।

 

 

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पंडित विद्यानिवास  मिश्र जी सम्पूर्ण विश्व के साथ जीवन को जोड़कर देखने वाले भारतीय विचारक थे। उन्हें ‘विश्व मन की बेचैनी’ की थाह थी। ‘संस्कृति के नये संदर्भ’ व्याख्यानमाला के अन्तर्गत ‘विश्वमन की बेचैनी’ विषय पर हिन्दुस्तानी एकेडेमी में उन्होंने कहा था ‘मनुष्य ही सबकुछ है। मनुष्य की चिन्ता करनी चाहिए। मनुष्य है तो सब-कुछ है। मनुष्य ही ईश्वर को बनानेवाला है। मनुष्य सारे विश्व की कल्पना करनेवाला है। मनुष्य मनुष्य को केन्द्र मानकर सारे विश्व की चिन्ता करने वाला है। मनुष्य के लिए सारी पृथ्वी उपभोग के रूप में प्रस्तुत है। मनुष्य को केन्द्र मानकर सारे विश्व की अवधारणा में कहीं न कहीं दरार पड़ गयी है। केवल एक केन्द्र मानने से काम नहीं चलेगा। अनेक केन्द्र हैं। सबसे बड़ी सकारात्मक हलचल इस बहुकेन्दता को पहचानने की है। अगर केवल मनुष्य को केन्द्र में रखते हैं तो जीवन का विनाश होता है। विनाश होने की संभावना होती है। प्रत्येक अनुशासन में यह बात दिखायी पड़ रही है। चाहे मनोविज्ञान हो, चाहे राजनीति हो, चाहे अर्थशास्त्र हो, चाहे जीव विज्ञान हो, वनस्पति विज्ञान हो, सभी जगह यही दिखायी पड़ता है कि इन पदाथो± को न देखो, पदाथो± की सम्बद्धता को देखो, इकाई को न देखो, इकाइयों के ग्रन्थन को देखो।’
पंडित जी के लिए ‘मानुष सत्य’ ही सर्वोपरि है, इसीलिये उनकी मूल चिन्ता ‘विश्व मन की बेचैनी’ को लेकर थी। पं० विद्यानिवास  मिश्र ने अपनी मौलिक प्रतिभा और साधना के द्वारा भारतीय चिंतक तथा संस्कृति पुरुष के प्रतीक के रुप में प्रतिष्ठा अर्जित की थी। डॉ० राम मनोहर लोहिया के साहचर्य में उन्होंने धार्मिक परम्पराओं की भी पड़ताल की और धर्म की जड़ता को स्पष्ट किया। ‘धर्म की जड़ता ही अधर्म है, धर्म का ठहराव ही अधर्म है और इसलिए धर्म की गतिशीलता समस्त (भारतीय) दर्शनों, साहित्यों और कलाओं पर छायी हुई है।’
भारतीय चिन्तन परम्परा में गहरे तक पैठे पंडित जी ने रूढ़िवाद और जड़ता पर गहरे प्रहार किये। नवीन को संस्कारित रूप में स्वीकारा और एक नयी दिशा दी। उनका वैदुष्य सूखे पाण्डित्य और संकीर्णता से अलग सर्जनशील था जहाँ नवीनता के लिए सदैव जगह थी। अनेक विदेश यात्राओं ने पण्डित जी के भीतर हमेशा कुछ नया जोड़ा। भारतीयता से परिपूर्ण मन को संजोते हुए उन्होंने हमेशा नये को स्वीकारा, उसे जगह दी। उनका परम्परित मन संकीर्ण नहीं था, बल्कि रूढ़, जड़ और घिसे-पिटे नियमों के लिए उनके मन में कोई जगह न थी। उन्हें भारतीय संस्कृति और संस्कारों के प्रति अपूर्व आस्था थी। परन्तु उनकी आस्तिकता में जड़ता नहीं थी। वे मेधा और प्रज्ञा के साथ साहित्य में नित नये अर्थों का उन्मेष करने वाले थे। उन्होंने ‘भारतीयता की पहचान’ निबन्ध संग्रह के आमुख में लिखा है -
‘भारतीयता की पहचान एक सतत् व्यापार है और वह वस्तुत: अपनी ही पहचान है, इसलिए मैं इसकी सार्थकता निरन्तर अनुभव करता हूँ। इस प्रयत्न में अपनी ही संस्कृति के Åपर केवल आस्था नहीं होती, वरन् विश्व संस्कृति को भी समझने के लिए एक खुला मन मिलता है, जो किसी भी जातीय या देशीय पूर्वाग्रह से मुक्त है।’
हिन्दुस्तानी का यह अंक पंडित जी की स्मृतियों को संजोने का एक प्रयास है। इसमें मिश्र जी के विविध रुप हैं। मुख्य आलेखों में ‘परम्परा बंधन नहीं’ - प्रेमशंकर जी का आलेख, ‘जातीय स्मृति की धूपछाँह’ - निर्मल वर्मा का, ‘शास्त्र और लोक के बीच’ - अशोक बाजपेयी जी का, पंडित विद्या  निवास मिश्र : विद्या और विनय का संश्लेषण - डॉ० रामकमल राय का, पंडित विद्या निवास मिश्र और हिन्दी पत्रकारिता - अच्युतानंद मिश्र जी का, विद्यानिवास   मिश्र : सामंजस्य और समन्वय के बीच - डॉ० रामस्वरुप चतुर्वेदी जी का, डॉ० विद्यानिवास मिश्र : संस्कृति और लोक चेतना के चितेरे - डॉ० मधुसूदन पाटिल का, प्रो० विद्यानिवास  मिश्र : एक बहुआयामी व्यक्तित्व - डॉ० रामनरेश त्रिपाठी जी का महत्त्वपूर्ण हैं। डॉ० शिवगोपाल मिश्र जी के सौजन्य से पंडित जी के अमरीका प्रवास के दौरान डॉ० उदयनारायण तिवारी जी को लिखे गये चार पत्र भी इसमें सम्मलित किये गये हैं। साथ ही डॉ० कविता वाचक्नवी द्वारा पंडित विद्यानिवास मिश्र जी से लिया गया साक्षात्कार भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हमने सामग्री को सांगोपांग बनाने का प्रयास किया है। आशा है यह अंक अक्षर पुरुष पं० विद्यानिवास  मिश्र जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को सम्पूर्णता के साथ हमारे समक्ष रखेगा।


  

 

डॉ० एस०के० पाण्डेय
    सचिव
    हिन्दुस्तानी एकेडेमी
    इलाहाबाद

सोमवार, 2 मार्च 2009

केदार नाथ अग्रवाल की काव्य सम्पदा पर गोष्ठी

 

 

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हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व साहित्य भण्डार, इलाहाबाद के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक ४.०३.२००९, दिन बुधवार, अपराह्न २:०० बजे, हिन्दुस्तानी एकेडेमी सभागार में "केदारनाथ अग्रवाल की काव्य सम्पदा" पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया है। जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार श्री दूधनाथ सिंह करेंगे तथा विचार गोष्ठी में प्रो० राजेन्द्र कुमार, डॉ० मत्स्येन्द्र नाथ शुक्ल तथा वाराणसी से पधारे श्री आशीष त्रिपाठी मुख्य वक्ता होंगे।

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जन्म: 01 अप्रैल 1911 निधन: 22 जून 2000

 

जन्म स्थान

ग्राम कामासिन, जिला बाँदा, उत्तर प्रदेश


केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिशील काव्य-धारा के एक प्रमुख कवि थे। उनका पहला काव्य-संग्रह युग की गंगा आज़ादी के पहले मार्च, 1947 में प्रकाशित हुआ। हिंदी साहित्य के इतिहास को समझने के लिए यह

संग्रह एक बहुमूल्य दस्तावेज़ है। केदारनाथ अग्रवाल ने मार्क्सवादी दर्शन को जीवन का आधार मानकर जनसाधारण के जीवन की गहरी व व्यापक संवेदना को अपनी कविताओं में मुखरित किया है। कवि केदार की जनवादी लेखनी पूर्णरूपेण भारत की सोंधी मिट्टी की देन है। इसीलिए इनकी कविताओं में भारत की धरती की सुगंध और आस्था का स्वर मिलता है।

केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं का अनुवाद रूसी, जर्मन, चेक और अंग्रेज़ी में हुआ है। उनका कविता-संग्रह 'फूल नहीं, रंग बोलते हैं', सोवियतलैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित हो चुका है :

केदारनाथ अग्रवाल के प्रमुख कविता संग्रह है : (1) युग की गंगा, (2) फूल नहीं, रंग बोलते हैं, (3) गुलमेंहदी, (4) हे मेरी तुम!, (5) बोलेबोल अबोल, (6) जमुन जल तुम, (7) कहें केदार खरी खरी, (8) मार प्यार की थापें आदि।


गुरुवार, 1 जनवरी 2009

नववर्ष की अनुपम भेंट: सूर्यविमर्श

हिन्दुस्तानी एकेडेमी में सूर्य षष्ठी समारोह की झलकियाँ आपने इन पन्नों पर देखी थीं। उसी समय हमारे मन में यह विचार आया कि सूर्य के सम्बन्ध में जो विस्तृत ज्ञान इधर-उधर विखरा पड़ा है उसे एक स्थान पर पुस्तक के रूप में जिज्ञासु पाठकों को उपलब्ध कराया जाय। उसी स्वप्न का साकार रूप यह अनुपम पुस्तक सूर्य विमर्श जो संस्था के सचिव डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय के अथक परीश्रम और दृढ़ इच्छा शक्ति का परिणाम है।






पुस्तक

सूर्य विमर्श (३२४ पृष्ठ)

प्रकाशक

हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

संपादक

डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय,
सचिव- हिन्दुस्तानी एकेडेमी

मूल्य

रू.१७५/- मात्र










वैदिक वाङ्‍मय से लेकर लौकिक संस्कृत वाङ्‍मय तक भगवान सूर्य की सर्वातिशायी महिमा प्रख्यापित है। सूर्य ही प्रत्यक्ष देवता हैं। वे संपूर्ण जगत के नेत्र और सभी जीवों की उत्पत्ति के स्थान है। सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत की आत्मा हैं। सूर्य आत्मा जगतस्तथुषश्च- ऋग्वेद। सूर्य से इस पृथ्वी पर जीवन है। सूर्य द्वारा ही सम्पूर्ण जगत धारण किया जा रहा है। सूर्य से ही यह प्रकाशित होता है। और उसी के द्वारा निःस्वार्थ भाव से इसका पालन किया जाता है। परात्पर रूप में सूर्य ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के भी स्वामी हैं। उन्हें ही देवता, यज्ञ और यज्ञों का फल भी बताया गया है। सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप है। सूर्य की आराधना चिन्ता और शोक को मिटाने वाली है और आयुर्वर्धक है। यह अज्ञान, जड़ता और अन्धकार का नाशक है। यह सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है।

सूर्य के इन्हीं स्वरूपों, शक्तियों एवं महिमा को केन्द्र में रखकर इस अद्‍भुत ग्रन्थ का सम्पादन किया गया है। न केवल वेदों, उपनिषदों व पुराणों में सूर्य के विविध रूपों, गुणों, एवं कर्मों का वर्णन इस पुस्तक में है अपितु सूर्य का आधुनिक वैज्ञानिक स्वरूप भी वेवेचित किया गया है। सूर्य से सम्बन्धित कोई भी पक्ष अछूता न रहे इसका यथा सम्भव प्रयास पुस्तक में दृष्टिगोचर होता है।



विषयानुक्रम



कालिदास की रचनाओं में तपश्चचर्या एवं सूर्योपासना
प्रो. सुरेश चन्द्र पाण्डेय पृ.सं.११

सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च- एक विश्लेषण
प्रो. विनोद चन्द्र श्रीवास्तव पृ.सं.१६

‘सोऽस्तु सूर्य: श्रिये व:’ मयूर-विरचित सूर्यशतक : एक चर्चा
डॉ.जगन्नाथ पाठक पृ.सं.२०

विष्णुसहस्रनाम में सूर्य तत्त्व
गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव पृ.सं.२६

सूर्य: विज्ञान की दृष्टि में
डॉ.जयन्त नाथ त्रिपाठी पृ.सं.३२

सूर्योपासना : चिकित्सा के सन्दर्भ में
डॉ.भगवत शरण शुक्ल पृ.सं.३९

भारतीय कला में सूर्य का अंकन
डॉ.विमल चन्द्र शुक्ल पृ.सं.४४

सूर्योज्योति: ज्योति: सूर्य:
डॉ.करुणा अग्रवाल पृ.सं.४८

उणादिकोष में सूर्य सन्दर्भ
डॉ.आनन्द कुमार श्रीवास्तव पृ.सं.५२

ऋग्वेद में सूर्य तत्त्व
डॉ.रामनरेश त्रिपाठी पृ.सं.६०

ज्योतिष में सूर्य जनित अनिष्ट योग
डॉ.सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय पृ.सं.६७

वास्तुमण्डल में सूर्य
डॉ.शैलजा पाण्डेय पृ.सं.८२

सूर्यषष्ठी
डॉ.शैल कुमारी मिश्र पृ.सं.८८

सूर्य महिमा एवं सूर्योपासना
डॉ.राममुनि पाण्डेय पृ.सं.९३

ब्रह्मपुराण में सूर्य माहात्म्य
डॉ.कमलेश कुमार त्रिपाठी पृ.सं.९८

सूर्य का धारण-आकर्षण विज्ञान
डॉ.उर्मिला श्रीवास्तव पृ.सं.१०३

वेदों में सूर्यवाची शब्दों की सार्थकता
डॉ.राजेन्द्र त्रिपाठी ‘रसराज’पृ.सं.१०९

ब्रह्मवैवर्तपुराण की दृष्टि में सूर्य
डॉ.सुरेन्द्र पाल सिंह पृ.सं.११५

सूर्यपूजा और कोणार्क : मूक इतिहास एवं मुखर किंवदन्तियाँ
डॉ.बनमाली विश्वाल पृ.सं.१२९

लौकिक सूर्य का भौतिक परिचय
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी पृ.सं.१४६

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में सूर्य की अवस्थिति
डॉ.गिरिजा शंकर शास्त्री पृ.सं.१६६

भविष्य पुराण में सूर्य
डॉ.दीपा अग्रवाल पृ.सं.१७९

सूर्य की कतिपय विशिष्ट प्रतिमायें
डॉ.ओमप्रकाश लाल श्रीवास्तव पृ.सं.१८३

सूर्य तत्त्व
डॉ.जनार्दन प्रसाद पाण्डेय पृ.सं.

वैदिक देवता सूर्य
डॉ.पुष्पलता अग्रवाल पृ.सं.१९४

लौकिक संस्कृत वाङ्‌मय में ‘सूर्य’
डॉ.निरुपमा त्रिपाठी पृ.सं.१९८

वेदों में सूर्य व उसकी अभिराम किरणें
डॉ.अर्चना सिंह पृ.सं.२०२

पूर्वी भारत में ही सूर्यषष्ठी व्रत क्यों?
डॉ.जयनारायण मिश्र पृ.सं.२०५

वास्तु विज्ञान में सूर्य विचार
डॉ.सोम प्रकाश पाण्डेय पृ.सं.२०७

सूर्य विश्लेषण- ज्योतिष की दृष्टि में
डॉ.राकेश कुमार पाण्डेय पृ.सं.२१२

सूर्य विज्ञान प्रणेता योगीराजाधिराज विशुद्धानन्द परमहंस
डॉ.मीता बनर्जी पृ.सं.२१७

जगदात्मा सूर्यदेव
डॉ.सावित्री दुबे पृ.सं.२२४

ऋग्वेद में सूर्य एवं सूर्य-ऊर्जोत्पत्ति विज्ञान
डॉ.अपराजिता मिश्रा पृ.सं.२२७

कलचुरि अभिलेखों में सूर्य एवं सूर्य पुत्र रेवन्त
डॉ.सत्यप्रकाश श्रीवास्तव पृ.सं.२३१

प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान और सूर्य
हिमांशु पाण्डेय पृ.सं.२३४

आदित्याय नम¨ नम:
डॉ.कनक लता दुबे पृ.सं.२३८

श्रीमद्भागवत महापुराण में सूर्य महिमा
डॉ.मालागुहा मजुमदार पृ.सं.२४१

सूर्य पुराण - एक विश्लेषण
योगेश कुमार पाण्डेय पृ.सं.२४५

वैदिक संहिताओं में सूर्य विज्ञान एवं वृष्टि विज्ञान में सूर्य की स्थिति
डॉ.अनिता सेनगुप्ता पृ.सं.२४९

द्वादशादित्य
डॉ.बीना मिश्रा पृ.सं.२५३

संस्दृत में सूर्य की अवधारणा
डॉ.रुबी वर्मा पृ.सं.२६१

सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च
सुरचना त्रिवेदी पृ.सं.२६७

पुराणेषु सूर्यतत्त्वम्
आचार्य दिवाकर मिश्र पृ.सं.२७२

वास्तुशास्त्र और सूर्य
डॉ.विजय कर्ण पृ.सं.२७६

पुराणों में सूर्य तत्त्व प्रतिष्ठा
डॉ.सुनीता जायसवाल पृ.सं.२८०

पुराणेषु सूर्यतत्त्वम्
डॉ.स्मिता अग्रवाल पृ.सं.२८६

सूर्य: ऊर्जा का अक्षय स्रोत (वैदिक परिप्रेक्ष्य में)
डॉ.कौमुदी श्रीवास्तव पृ.सं.२९१

सूर्योपासना की प्राचीन परम्परा और प्रयाग
डॉ.मीनू अग्रवाल पृ.सं.२९५

सूर्य की वैदिक कालीन अवधारणा
डॉ.ज्योति कपूर पृ.सं.३०१

वृष्टि विज्ञान में सूर्य की स्थिति
डॉ.अरुण कुमार त्रिपाठी पृ.सं.३०४

अग्निपुराण में सूर्य वर्णन
सन्तोष कुमार मिश्र पृ.सं.३१०

वैदिक देव सूर्य- एक अवलोकन
वीरेन्द्र कुमार मौर्य पृ.सं.३१३

सूर्यतत्त्व विमर्श
प्रो. यदुनाथ प्रसाद दुबे पृ.सं.३१६

चाक्षुषोपनिषद्
पृ.सं.३२१

आदित्यहृदय स्तोत्रम्
पृ.सं.३२२

महाभारत में युधिष्ठिर कृत सूर्य की स्तुति
पृ.सं.३२४

उम्मीद है आपको यह पुस्तक पसन्द आएगी। बस आदेश भेजिए। पुस्तकें हम अपने डाक व्यय पर उपलब्ध कराएंगे।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

कोषाध्यक्ष- हिन्दुस्तानी एकेडेमी

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2008

हिन्दुस्तानी त्रैमासिक का ताजा अंक प्रकाशित... तुरन्त मंगाएं

हिन्दुस्तानी त्रैमासिक शोध एवं सृजन पत्रिका का ताजा अंक (अक्टूबर-दिसम्बर२००८) प्रकाशित हो गया है। हिन्दुस्तानी एकेडेमी पर उपलब्ध प्रतियों की संख्या सीमित है। अपनी प्रति डाक से प्राप्त करने के लिए यहाँ से जानें क्या करना है।

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प्रस्तुति: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
कोषाध्यक्ष- हिन्दुस्तानी एकेडेमी

शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

एकेडेमी के उम्दा प्रकाशन... डाक से मंगाएं

हिन्दुस्तानी (त्रैमासिक पत्रिका)

एकेडेमी द्वारा प्रकाशित हिन्दुस्तानीने विगत ७७ वर्षों से हिन्दी भाषा और साहित्य के संवर्द्धन और अनुशीलन की दिशा में शोध सम्बन्धी प्रमुख पत्रिका के रूप में हिन्दी संसार में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया है।

इस त्रैमासिक को प्रायः सभी प्रतिष्ठित विद्वानों एवं शोधकर्ताओं का सहयोग प्राप्त है। प्राचीन एवं नवीन, दोनो प्रकार के साहित्य से सम्बन्धित आलोचनात्मक एवं शोधपूर्ण सामग्री इस पत्रिका में प्रकाशित होती है।

हिन्दुस्तानी सन् १९३१ से प्रकाशित हो रही है। वर्ष १९५८ से अबतक के अंकों का वार्षिक मूल्य रु. १२० मात्र तथा एक अंक का मूल्य रु. ३० चला आ रहा है। स्थायी ग्राहकों को डाक व्यय नहीं देना पड़ता है।

पुस्तक प्रकाशन

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के उद्देश्यों में हिन्दी तथा उसके अन्य रूपों, शैलियों; जैसे- उर्दू, ब्रज, अवधी, भोजपुरी आदि का सवर्द्धन और संरक्षण करना है। इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए निम्न प्रकार के प्रकाशन किए जाते हैं:-
  1. मौलिक एवं सृजनात्मक साहित्य का अनुवाद
  2. विभिन्न देशी-विदेशी भाषाओं से सृजनात्मक साहित्य का अनुवाद
  3. सन्दर्भ एवं कोष-ग्रन्थ
  4. हिन्दी के साथ ही अन्य भाषाओं के कालजयी ग्रन्थों का अनुवाद
  5. प्राचीन एवं मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य का शुद्ध सम्पादन
  6. उच्चस्तरीय विचार गोष्ठियों में पढ़े गये पत्रों और व्याख्यानों का प्रकाशन


उपर्युक्त श्रेणियों में अभी तक एकेडेमी द्वारा बड़ी मात्रा में पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है। आम पाठकों को सहज सुलभ कराने के लिए पुस्तकों का मूल्य यथासम्भव कम से कम रखा गया है। रु.५०० से अधिक मूल्य की पुस्तकें एक साथ मंगाने पर डाक खर्च एकेडेमी स्वयं वहन करती है।

नीचे एकेडेमी के प्रकाशनों की सूची दी जा रही है, जिसमें पुस्तक का नाम, पृष्ठ संख्या, (यथास्थिति)लेखक, अनुवादक, संपादक, संकलनकर्ता का नाम और निर्धारित मूल्य का विवरण दिया गया है। शीघ्र ही यहाँ चुनिन्दा पुस्तकों की विषय-वस्तु से भी परिचित कराने का प्रयास होगा। यदि किसी विशेष पुस्तक के बारे में जानकारी चाहिए तो ई-मेल (hindustaniacademy@gmail.com) से या डाक के पते [ सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी; 12,कमला नेहरू मार्ग,इलाहाबाद) पर पूछ सकते हैं।

(सभी चेक या बैंकड्राफ्ट हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद के नाम से स्वीकार किए जाएंगे।)
हिन्दी
काव्य
1. वेलक्रिसन रुकमणी री (मूल पाठ) पृष्ठ : 36
संपादक : ठाकुर रामसिंह, सूर्यकरण पारीक मूल्य: 5.00

2. हिन्दी वीरकाव्य-संग्रह पृष्ठ : 288
संपादक : गणेश प्रसाद द्विवेदी मूल्य: 60.00
संशो0 : डॉ. उदयनारायण तिवारी

3. हिन्दी सन्तकाव्य संग्रह (तृतीय संस्करण) पृष्ठ : 344
संपादक : गणेश प्रसाद द्विवेदी मूल्य: 75.00
संशो0 : पं0 परशुराम द्विवेदी

4. कहरानामा-मसलानामा पृष्ठ : 106
संपादक : अमरबहादुर सिंह ‘अमरेश’ मूल्य: 25.00

5. केशव ग्रन्थावली (तीन खण्ड)
प्रथम खण्ड पृष्ठ :288 मूल्य:100.00
द्वि्तीय खण्ड पृष्ठ :235 मूल्य: 150.00
तृ्तीय खण्ड पृष्ठ :359 मूल्य: 125.00

6. हिन्दी की नखशिख-परम्परा पृष्ठ : 128
एवं बलभद्र-कृत ‘सिखनख’
संपादक : डॉ. सज्जनराम केणी मूल्य: 35.00

7. गेरू की लिपियाँ पृष्ठ : 128
रचनाकार : अमरनाथ श्रीवास्तव मूल्य: 60.00

8. माँ के लिए (अप्राप्य) पृष्ठ : 76
रचनाकार : डॉ. जगदीश गुप्त (तमिल अनुवाद सहित)

9. है तो है (गजल) पृष्ठ : 112
रचनाकार : एहतराम इस्लाम मूल्य: 70.00

10. पंचवटी (मराठी अनुवाद) पृष्ठ : 58
अनुवादक : श्रीकृष्ण खड़पेकर मूल्य: 45.00

11. मेधावी (प्रबन्ध काव्य) पृष्ठ : 260
रचनाकार : रांगेय राघव मूल्य: 100.00

12. समय आने दो पृष्ठ : 92
रचनाकार : शिवकुटी लाल वर्मा मूल्य: 60.00

13. दीप देहरी द्वार (कविता संग्रह) पृष्ठ : 119
रचनाकार : लक्ष्मीकांत वर्मा मूल्य: 150.00

14. चावल नये-नये (काव्य-संग्रह) पृष्ठ : 95
रचनाकार : सुश्री सुषमा सिंह मूल्य: 75.00

15. रूप लहरिया पृष्ठ : 286
कवि : डॉ. राय राजेश्वर बली मूल्य: 100.00

16. सतकवि गिरा विलास पृष्ठ : 153
संपादक : डॉ. शिवगोपाल मिश्र मूल्य: 50.00

17. दीये का राम पृष्ठ : 136
रचनाकार : श्री नर्मदेश्वर उपाध्याय मूल्य: 75.00

संकलित उर्दू काव्य

18. उर्दू-काव्य की एक नयी धारा पृष्ठ : 266
संक0 : उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ मूल्य: 50.00

नाटक

19. हड़ताल पृष्ठ : 104
मूल लेखक : गाल्सवर्दी : अनुवादक : प्रेमचन्द मूल्य: 25.00

20. नातन पृष्ठ : 340
मूल लेखक : गाल्सवर्दी : अनुवादक : मिर्जा अबुल फजल मूल्य: 50.00

21. अमृत की खोज पृष्ठ : 112
लेखक : डॉ. रामकुमार वर्मा मूल्य: 40.00

कथा साहित्य

22. माटि खाईं जनावरा पृष्ठ : 285
लेखक : सर्वदानन्द 75.00

23. माधवराव सप्रे की कहानियाँ पृष्ठ : 64
सम्पादक : देवी प्रसाद वर्मा मूल्य: 25.00

निबन्ध

24. साहित्य की मान्यताएं पृष्ठ : 170
लेखक : भगवती चरण वर्मा मूल्य: 60.00

25. युगल चरण पृष्ठ : 144
लेखक : उमाकान्त मालवीय मूल्य: 50.00

साहित्य का इतिहास

26. सरोज-सर्वेक्षण पृष्ठ : 1032
लेखक : डॉ. किशोरी लाल गुप्त मूल्य: 300.00

27. हिन्दुई साहित्य का इतिहास पृष्ठ : 445
लेखक : गार्सा द तासी
अनुवादक : डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय मूल्य: 125.00

28. भारतीय स्वातं×य-आन्दोलन और हिन्दी साहित्य पृष्ठ : 324
लेखिका : डॉ. कीर्ति लता मूल्य: 100.00

29. तेलुगु वाङमय की विभिन्न विधाएं पृष्ठ : 152
लेखक : डॉ. बालशौरि रेड्डी मूल्य: 60.00

समीक्षा

30. आधुनिक हिन्दी का आदिकाल पृष्ठ : 251
लेखक : श्री नारायण चतुर्वेदी मूल्य: 100.00

31. हिन्दी वीरकाव्य (1600-1800 ई0) पृष्ठ : 420
लेखक : टीकम सिंह तोमर मूल्य: 100.00

32. बीसलदेव रासो (एक गवेषणा) पृष्ठ : 85
लेखक : सीताराम शास्त्री मूल्य: 40.00

33. सन्त साहित्य की लौकिक पृष्ठभूमि पृष्ठ : 336
लेखक : ओम प्रकाश शर्मा मूल्य: 100.00

34. मध्यकालीन हिन्दी सन्त : विचार और साधना पृष्ठ : 574
लेखक : डॉ. केशनीप्रसाद चौरसिया मूल्य: 150.00

35. सन्त चरनदास पृष्ठ : 449
लेखक : त्रिलोकी नारायण दीक्षित मूल्य: 100.00

36. सन्त तुकाराम पृष्ठ : 226
लेखक : डॉ. हरि रामचन्द्र दिवेकर मूल्य: 50.00

37. हिन्दी सन्तकाव्य में मधुर भावना पृष्ठ : 272
लेखक : डॉ. प्रवेश विरमानी मूल्य: 100.00

38. मानस में तत्सम शब्द पृष्ठ : 352
लेखक : डॉ. गया प्रसाद शर्मा मूल्य: 125.00

39. प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति पृष्ठ : 335
लेखक : डॉ. संजय कुमार सिंह मूल्य: 200.00

40. संस्कृत की कालजयी कृतियाँ पृष्ठ : 311
हिन्दी वाङमय के दर्पण में
लेखक : डॉ. दादूराम शर्मा मूल्य: 160.00

41. जायसी पृष्ठ : 120
लेखक : विजय देव नारायण साही मूल्य: 70.00

42. मध्यकालीन हिन्दी काव्य में सांस्कृतिक समन्वय पृष्ठ : 272
लेखक : डॉ. अब्दुल बिस्मिल्लाह मूल्य: 100.00

43. मध्ययुगीन हिन्दी कृष्णभक्ति धारा और चैतन्य सम्प्रदाय पृष्ठ : 448
लेखिका : डॉ. मीरा श्रीवास्तव मूल्य: 250.00

44. हिन्दी कृष्णभक्ति काव्य पर पुराणों का प्रभाव पृष्ठ : 238
लेखिका : डॉ. शशि अग्रवाल मूल्य: 75.00

45. डिंगल साहित्य पृष्ठ : 380
लेखक : डॉ. जगदीश प्रसाद मूल्य: 100.00

46. आधुनिक हिन्दी काव्य में नारी भावना पृष्ठ : 276
लेखिका : डॉ. शैल कुमार मूल्य: 30.00

47. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पृष्ठ : 320
लेखक : बृजरत्न दास मूल्य: 100.00

48. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (संक्षिप्त) पृष्ठ : 186
मूल्य: 25.00

49. हिन्दी की स्वच्छन्दतावादी समीक्षा के नये आयाम पृष्ठ : 191
लेखिका : डॉ. शर्मिला डॉली कुद्दूसी मूल्य: 280.00

50. देवराज उपाध्याय की स्वच्छन्दवादी समीक्षा-दृष्टि पृष्ठ : 86
लेखिका : डॉ. शर्मिला डॉली कुद्दूसी मूल्य: 180.00

51. श्री शंकराचार्य पृष्ठ : 327
लेखक : आचार्य बदलेव उपाध्याय मूल्य: 160.00

52. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल : एक दृष्टि पृष्ठ : 242
संपादक : डॉ. रामकुमार वर्मा तथा अन्य मूल्य: 100.00

53. छठवाँ दशक (शीघ्र प्रकाश्य) (द्वितीय संस्करण) पृष्ठ : 321
लेखक : विजय देवनारायण साही मूल्य: 150.00

54. हिन्दी नाटक और रंगमंच पृष्ठ : 200
संपादक : डॉ. रामकुमार वर्मा तथा अन्य मूल्य: 75.00

55. हिन्दी आलोचना : अतीत और वर्तमान पृष्ठ : 66
व्याख्याकार : डॉ. प्रभाकर माचवे मूल्य: 40.00

56. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काव्य दर्शन पृष्ठ : 240
लेखक : डॉ. रमाशंकर तिवारी मूल्य: 125.00

57. तुलसी-साहित्य की अर्थ-समस्याएँ और उनका निदान पृष्ठ : 466
लेखक : डॉ. नरेन्द्रदेव पाण्डेय मूल्य: 175.00

58. संस्कृत वाङमय का हिन्दी राम-काव्य पर प्रभाव पृष्ठ : 460
लेखक : डॉ. ज्ञानशंकर पाण्डेय मूल्य: 175.00

59. कम्ब-रामायण और रामचरित मानस के नारी पात्र :
एक तुलनात्मक अध्ययन पृष्ठ : 215
लेखक : रवीन्द्रनाथ सिंह मूल्य: 100.00

60. सूर और सूर नवीन पृष्ठ : 280
लेखक : किशोरी लाल गुप्त मूल्य: 125.00

61. नैषध परिशीलन पृष्ठ : 560
लेखक : डॉ. चण्डिका प्रसाद शुक्ल मूल्य: 200.00

62. हिन्दी साहित्य का रेखांकन पृष्ठ : 172
लेखक : एडविन ग्रीब्ज : अनुवादक : डॉ. किशोरी लाल मूल्य: 120.00

63. साहित्य, सौन्दर्य और संस्कृति पृष्ठ : 78
लेखक : गोविन्द चन्द्र पाण्डे मूल्य: 70.00

64. साहित्यकार और चिन्तक : आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पृष्ठ : 138
लेखक : डॉ. रामकमल राय मूल्य: 250.00

65. नयी कविता : नयी दृष्टि पृष्ठ : 293
लेखक : डॉ. रामकमल राय मूल्य: 250.00

66. हिन्दी के आदि शैलीकार सदलमिश्र पृष्ठ : 366
लेखक : डॉ. नागेन्द्र नाथ पाण्डेय मूल्य: 260.00

67. महाकवि सुमित्रानन्दन पंत -सृजन और चिंतन पृष्ठ : 233
संपादक : हरिमोहन मालवीय
डॉ. अनिल कुमार सिंह मूल्य: 120.00

68. बच्चन व्यक्ति और रचनाकार पृष्ठ : 136
लेखक : डॉ. श्यामसुन्दर घोष मूल्य: 140.00

69. प्रेमचन्द-सृजन एवं चिन्तन पृष्ठ : 172
प्रधान संपादक : डॉ. रामकुमार वर्मा मूल्य: 130.00

साहित्यालोचन

70. पाश्चात्य साहित्यालोचन के सिद्धान्त (अप्राप्य) पृष्ठ : 242
लेखक : लीलाधर गुप्त : भूमिका : डॉ. अमरनाथ झा मूल्य: 30.00

71. श्रृंगार परिशीलन पृष्ठ : 313
लेखक : आचार्य चण्डिका प्रसाद शुक्ल मूल्य: 125.00

72. सहृदय और साधरणीकरण पृष्ठ : 124
लेखक : डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी मूल्य: 60.00

लोक साहित्य

73. भोजपुरी लोकगाथा पृष्ठ : 376
लेखक : डॉ. सत्यव्रत सिन्हा मूल्य: 100.00

74. हरियाना प्रदेश का लोक साहित्य (अप्राप्य) पृष्ठ : 500
लेखक : डॉ. शंकर लाल यादव मूल्य: 40.00

75. मालवी लोक साहित्य पृष्ठ : 506
लेखक : श्याम परमार मूल्य: 125.00

76. भोजपुरी लोक-साहित्य का सांस्कृतिक अध्ययन पृष्ठ : 389
लेखक : डॉ. श्रीधर मिश्र मूल्य: 125.00

77. भारतीय लोक-विश्वास पृष्ठ : 452
लेखक : कृष्ण देव उपाध्याय मूल्य: 200.00

पत्र साहित्य

78. द्विवेदी-युग के साहित्यकारों के कुछ पत्र पृष्ठ : 238
संपादक : बैजनाथ सिंह ‘विनोद’ मूल्य: 100.00

79. गालिब के पत्र (दो भाग) (भाग 1 अप्राप्य)
संपादक तथा लिप्यंतरकार : श्रीराम शर्मा, रामनिवास शर्मा मूल्य: 100.00

भाषा विज्ञान

80. हिन्दी भाषा का इतिहास पृष्ठ : 344
लेखक : डॉ. धीरेन्द्र वर्मा मूल्य: 100.00

81. हिन्दी भाषा और लिपि पृष्ठ : 80
लेखक : डा0 धीरेन्द्र वर्मा मूल्य: 30.00

82. हिन्दी भाषा के विकास की दिशाएँ पृष्ठ : 76
लेखक : सुधाकर पाण्डेय मूल्य: 30.00

83. आर्य और द्रविड़ भाषा-परिवारों का सम्बन्ध पृष्ठ : 62
लेखक : डॉ. रामविलास शर्मा मूल्य: 30.00

84. कृषक जीवन-सम्बन्धी ब्रज भाषा-शब्दावली
लेखक : डॉ. अम्बाप्रसाद -‘सुमन
भाग-1 पृष्ठ 345 मूल्य: 100.00
भाग-2 पृष्ठ 602 मूल्य: 125.00

85. निमाड़ी और उसका साहित्य पृष्ठ : 512
लेखक : डॉ. कृष्ण लाल ‘हंस’ मूल्य: 100.00

86. आगरा जिले की बोली पृष्ठ : 172
लेखक : डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी मूल्य: 60.00

87. सूरसागर-शब्दावली पृष्ठ : 366
लेखिका : निर्मला सक्सेना मूल्य: 125.00

88. अभिधान-अनुशीलन पृष्ठ : 528
लेखक : विद्याभूषण ‘विभू’ मूल्य: 150.00

89. मथुरा जिले की बोली पृष्ठ : 412
लेखक : डॉ. चन्द्रभान रावत मूल्य: 125.00

90. अर्थविज्ञान की दृष्टि से हिन्दी एवं
बँगला शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन पृष्ठ : 498
लेखक : डॉ. राधाकृष्ण सहाय मूल्य: 125.00

91. अवधी का विकास पृष्ठ : 311
लेखक : डॉ. बाबूराम सक्सेना मूल्य: 125.00

92. हिन्दी भाषा और नागरी लिपि पृष्ठ : 343
संक0 : लक्ष्मीकान्त वर्मा मूल्य: 100.00

93. खड़ीबोली विकास के आरम्भिक चरण पृष्ठ : 375
लेखिका : डॉ. उषा माथुर मूल्य: 120.00

94. हिन्दी कथा कोष पृष्ठ : 140
(प्राचीन नामों और पौराणिक कथाओं का कोष) मूल्य: 60.00

95. हिन्दी भारतीय भाषाओं में समान तत्व पृष्ठ : 116
लेखक : डॉ. कैलाश चन्द्र भाटिया मूल्य: 70.00

दर्शन

96. अमरीकी दर्शन का इतिहास पृष्ठ : 366
मूल लेखक : हर्बर्ड डब्ल्यू श्नाइडर
अनुवादक : ओमप्रकाश दीपक मूल्य: 75.00

97. मानव का उज्ज्वल भविष्य पृष्ठ : 187
मूल लेखक : इरविन डी कैन्हम : अनुवादक : जयन्त मूल्य: 60.00

मनोविज्ञान

98. जीववृत्ति-विज्ञान पृष्ठ : 160
लेखक : डॉ. महाजोत सहाय मूल्य: 25.00

99. विचार-विज्ञान पृष्ठ : 312
लेखक : डॉ. हरद्वारीलाल शर्मा मूल्य: 75.00

100. रोगी मन पृष्ठ : 419
लेखक : सूरजनारायण मुन्शी, साहिवत्री एम0 निगम मूल्य: 150.00

101. मनस्तत्व पृष्ठ : 366
लेखक : यशदेवशल्य मूल्य: 125.00

धर्म, नीति और संस्कृति

102. अभिधर्म कोष (चार भाग में) [अनुपलब्ध]
प्रथम खण्ड- पृष्ठ : 466 मूल्य: 180.00
द्वितीय खण्ड- पृष्ठ : 298 मूल्य: 150.00
तृतीय खण्ड- पृष्ठ: 200 मूल्य: 100.00
चतुर्थ खण्ड- पृष्ठ : 276 मूल्य: 125.00

103. मध्यकालीन भारतीय संस्कृति पृष्ठ : 188
लेखक : डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा मूल्य: 75.00

104. अश्वघोष की कृतियों में चित्रित भारतीय संस्कृति पृष्ठ : 174
लेखिका : किश्वर जबीं नसरीन मूल्य: 75.00

105. व्रत और त्यौहार : पौराणिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पृष्ठ : 195
लेखिका : डॉ. शान्ति जैन मूल्य: 80.00

106. महामति प्राणनाथ कुलजम स्वरूप और इस्लाम धर्म पृष्ठ : 196
लेखक : डॉ. अन्सारुल हक अन्सारी मूल्य: 120.00

107. चिन्मय भारत (आर्ष चिन्तन के बुनियादी सूत्र) पृष्ठ : 201
लेखक : कुबरेनाथ राय मूल्य: 180.00

108. भाषा और राष्ट्रीय अस्मिता पृष्ठ : 153
संपादक : डॉ. रामकमल राय मूल्य: 150.00

109. जैन पुराणों का सांस्कृतिक अध्ययन पृष्ठ : 553
लेखक : डॉ. देवी प्रसाद मिश्र मूल्य: 225.00

सामाजिक विषय

110. भारतवर्ष का सामाजिक इतिहास पृष्ठ : 418
लेखक : विमलचन्द्र पाण्डेय मूल्य: 200.00

111. भ्रष्टाचार और लोकसतर्कता पृष्ठ : 66
लेखक : नित्येन्द्र नाथ शील मूल्य: 30.00

112. ग्रामीण अर्थशास्त्र पृष्ठ : 324
लेखक : ब्रजगोपाल भटनागर : संशो0 : दयाशंकर दुबे मूल्य: 100.00

113. अर्थशास्त्र के मूल सिद्धान्त पृष्ठ : 422
लेखक : भगवान दास अवस्थी मूल्य: 100.00

114. इंग्लैण्ड की शासन प्रणाली पृष्ठ : 380
लेखक : हर्षनाथ मिश्र मूल्य: 80.00

115. लोकतन्त्र की कसौटियाँ पृष्ठ : 171
लेखक : विजयदेव नारायण साही मूल्य: 80.00

उपयोगी कला

116. चर्म बनाने के सिद्धान्त पृष्ठ : 240
लेखक : देवदत्त अरोड़ा मूल्य: 75.00

ललित कला

117. भारतीय संस्कृति में ललित कला का महत्त्व पृष्ठ : 64
लेखक : ठाकुर जयदेव सिंह मूल्य: 35.00

118. चित्रकला और संस्कृत साहित्य पृष्ठ : 212
लेखिका : डॉ. मधूलिका अग्रवाल मूल्य: 300.00

इतिहास, सभ्यता तथा पुरातत्त्व

119. फ्रांस का इतिहास पृष्ठ : 152
लेखक : हेरम्ब चतुर्वेदी मूल्य: 100.00

120. हमारे पुराने नगर पृष्ठ : 131
लेखक : डॉ. उदयनारायण राय (अजिल्द) मूल्य: 50.00

121. कश्मीर पृष्ठ : 82
लेखक : भगवतीशरण सिंह मूल्य: 40.00

संस्मरण साहित्य

122. बँगला देश के अंचल में (सचित्र) पृष्ठ : 201
लेखक : सूर्यप्रसन्न वाजपेयी मूल्य: 80.00

123. अभय कुमार की आत्म कहानी पृष्ठ : 120
लेखक : डॉ. एन.ई.विश्वनाथ अय्यर मूल्य: 50.00

विज्ञान

124. चुम्बकत्व और विद्युत पृष्ठ : 746
लेखक : निहाल करण सेठी मूल्य: 200.00

125. कुछ आधुनिक आविष्कार पृष्ठ : 302
लेखक : डॉ. सत्यप्रकाश मूल्य: 100.00

126. ग्रह-नक्षत्र पृष्ठ : 35
लेखक : डॉ. सम्पूर्णानन्द मूल्य: 30.00

127. हिन्दी विज्ञान साहित्य का सर्वेक्षण पृष्ठ : 108
लेखक : डॉ. शिवगोपाल मिश्र मूल्य: 100.00

128. विकासवाद पृष्ठ : 120
लेखक : दयानन्द पन्त मूल्य: 50.00

चिकित्सा

129. नारी और मातृत्व सुख
(चरक एवं सुश्रुत द्वारा प्रतिपादित) पृष्ठ : 117
लेखिका : डॉ. किश्वर जबीं नसरीन मूल्य: 120.00

उर्दू

1. फोरेब अमल (नाटक) जान गाल्सवर्दी पृष्ठ : 293
अनुवादक : जगतमोहन खाँ मूल्य: 100.00

2. नौतर्ज मुरस्सा (ड0क्रा0) पृष्ठ : 236
संपादक : मीर मोहम्मद साहब तहसीन मूल्य: 80.00

3. नातन : लेसिंग (0क्रा0)पृष्ठ : 451
अनुवादक : मो0 नईमुल रहमान मूल्य: 125.00

4. इन्तखाबे दाग (0क्रा0)पृष्ठ : 288
संपादक : डॉ. मोहम्मद अकील रिजवी मूल्य: 125.00

5. बुनियादी हिन्दुस्तानी (0क्रा0)पृष्ठ : 32
मोहम्मद अजमल खाँ मूल्य: 10.00

6. सुल्तान महमूद गजनवी : मोहम्मद हबीब (0क्रा0)पृष्ठ : 70
अनुवादक : सैयद जमील हुसैन मूल्य: 25.00

7. माशियात : मकसद और मेन्हाज (0क्रा0)पृष्ठ : 118
डॉ. जाकिर हुसैन मूल्य: 25.00

8. हम-आप (0क्रा0) पृष्ठ : 219
मौलाना अब्दुल माजिद दरियाबादी मूल्य: 100.00

9. हिन्दुस्तान का नया दस्तूरे-हुकूमत (0क्रा0) पृष्ठ : 167
कृष्ण प्रसाद कौल मूल्य: 75.00

10. इन्साफ : जान गाल्सवर्दी (0क्रा0) पृष्ठ : 215
अनुवादक : मु0 दयानारायण निगम मूल्य: 125.00

11. इन्तखाब कलामे आतिश (0क्रा0) पृष्ठ : 170
संपादक : डॉ. एजाज हुसैन मूल्य: 80.00

12. अध्यात्म रामायण (रायल) पृष्ठ : 656
गुरू नारायण मूल्य: 150.00

13. करूने वस्ता में हिन्दुस्तानी तहजीब (रायल) पृष्ठ : 238
डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा मूल्य: 100.00

14. आलमे हैवानी (रायल) पृष्ठ : 687
दुनिया के शीरखर जानवरों का यान
ब्रजेश बहादुर मूल्य: 150.00

15. चन्द दक्खिनी पहेलियाँ (रायल) पृष्ठ : 164
मो0 नैय्यूम रहमान मूल्य: 80.00

16. दीवाने बेदार (रायल) पृष्ठ : 135
संपादक : जलील अहमद किदवई मूल्य: 70.00

17. दुनिया की मौजूदा कसाद बाजारी के असबाब (रायल) पृष्ठ : 55
मो0 हबीबुल रहमान मूल्य: 20.00

18. फलस्ये नफस (रायल) पृष्ठ : 107
जामिन हुसेन नकवी मूल्य: 40.00

19. जरक्की जरायत (रायल) पृष्ठ : 446
खान साहब अब्दुल कयूम मूल्य: 200.00

20. नफसियात फायदा (रायल) पृष्ठ :446
मैक्डूगल
अनुवादक : मो0 बलीउल रहमान मूल्य: 100.00

21. जवाहरे सुखन - भाग(3) (रायल) पृष्ठ : 721
संपादक : मो0 मुबीन कैफ़ी चिरियाकोटी मूल्य: 300.00

22. गुलजारे नजीर (रायल) पृष्ठ : 454
संपादक : सलीम जाफर मूल्य: 250.00

23. कलामे इंशा : (रायल) पृष्ठ : 448
संपादक मिर्जा मोहम्मद असकरी मोहम्मद रफीक मूल्य: 250.00

24. दक्खिनी आर्ट (रायल) पृष्ठ : 62
डॉ. गुलाम जयदानी मूल्य: 40.00

25. दी नायाब जमाना बयाजे और उनका इन्तखाब (रायल) पृष्ठ : 130
अब्दुल बारी आसी मूल्य: 60.00

26. इफलास : (0क्रा0) पृष्ठ : 28
डा0 अनवर इकबाल कुरेशी मूल्य: 10.00

27. निजाम शम्मी : डॉ. गोरखप्रसाद (रायल) पृष्ठ : 580
अनुवादक : शेख जग्गू मूल्य: 200.00

निवेदक: डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय, सचिव
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, कोषाध्यक्ष
हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
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