प्रयाग अनादिकाल से तीर्थराज की पदवी से विभूषित रहा है। यह ऋषियों, मुनियों, सन्तों एवं साधकों की पावन तपस्थली एवं साधनास्थली रही है। इसका ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं पौराणिक महत्व रहा है। न केवल यहॉं भगवती गंगा, यमुना और सरस्वती का दिव्य संगम है, प्रत्युत यहॉं वेदत्रयी का भी संगम है। इसकी अभिपुष्टि दक्ष प्रजापति के दशाश्वमेध यज्ञ से होती है। यहीं पर ब्रह्मा ने भी अनेक यज्ञों को सम्पादित किया था। वेद भगवान् की प्रवृत्ति यज्ञ है। यज्ञ कालाश्रयी हैं तथा कालज्ञ ही ज्योतिर्विद है। अतएव महात्मा लगध ने आर्च एवं याजुष ज्योतिष में कहा है - जो सम्यक रूप से ज्योतिषशास्त्र को जानता है वह यथार्थ में यज्ञ को जानता है।
प्रकाशक: हिन्दुस्तानी एकेडेमी मूल्य: २२५ दो सौ पचीस रूपये मात्र पृष्ठ: ३६० |
भारतीय ज्योतिष में प्रयाग का योगदान स्वत: सिद्ध है। उसको अपनी लेखनी द्वारा जनसामान्य के समक्ष उपस्थापित करने का प्रशंसनीय प्रयास प्रस्तुत ग्रन्थ में विद्वान लेखक एवं ज्योतिर्विद डॉ० गिरिजा शंकर शास्त्री द्वारा किया गया है। भारतीय ज्योतिषशास्त्र के जिज्ञासुओं एवं अध्येताओं के लिए यह ग्रन्थ वस्तुत: रत्नप्रदीप है तथा संग्रहणीय भी।
डॉ० एस०के० पाण्डेय
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी
इस संग्रहणीय/संदर्भनीय पुस्तक के परिचय के लिए आभार वैसे तो को कहि सकहि प्रयाग प्रभाऊ ,कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ !
जवाब देंहटाएंपुस्तक के परिचय का आभार ।
जवाब देंहटाएंआभार।
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