हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जन सूचना अधिकार का सम्मान

जनसूचना अधिकारी श्री इंद्रजीत विश्वकर्मा, कोषाध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी,इलाहाबाद व मुख्य कोषाधिकारी, इलाहाबाद। आवास-स्ट्रेची रोड, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद कार्यालय-१२ डी,कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
प्रथम अपीलीय अधिकारी श्री प्रदीप कुमार्, सचिव,हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व अपर जिलाधिकारी(नगर्), इलाहाबाद। आवास-कलेक्ट्रेट, इलाहाबाद कार्यालय-१२डी, कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
दूरभाष कार्यालय - (०५३२)- २४०७६२५

Tuesday, November 9, 2010

काव्य संग्रह- केदार सम्मान के कवि

हिंदुस्तानी एकेडेमी की अनुपम भेंट

‘केदार शोध पीठ न्यास’ द्वारा प्रतिवर्ष समकालीन हिंदी कवियों में से ऐसे कवि को चयनित कर केदार सम्मान प्रदान किया जाता है जिन्होंने अपनी कविता से केदार नाथ अग्रवाल की जातीय काव्य परंपरा, सौंदर्य, प्रेम और संघर्ष की चेतना को आगे बढ़ाया है। वर्ष 1996 से प्रारम्भ किए गये इस पुरस्कार से अबतक चौदह समकालीन रचनाकारों को सम्मानित किया जा चुका है। हिंदुस्तानी एकेडेमी ने गुणवत्तायुक्त साहित्य के प्रकाशन की अपनी समृद्ध परंपरा का निर्वाह करते हुए इन चौदह पुरस्कृत कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन प्रकाशित किया है। इन कवियों का विवरण निम्नवत है:

वर्ष

कवि

पुरस्कृत कृति

1996

नासिर अहमद सिकंदर

जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में

1997

एकांत श्रीवास्तव

अन्न हैं शब्द मेरे

1998

कुमार अंबुज

क्रूरता और अनंतिम

1999

विनोद दास

वर्णमाला से बाहर

2000

गगन गिल

यह आकांक्षा समय नहीं

2001

हरीश चंद्र पांडे

एक बुरूँश कहीं खिलता है

2002

अनिल कुमार सिंह

पहला उपदेश

2003

हेमंत कुकरेती

चाँद पर नाव

2004

नीलेश रघुवंशी

पानी का स्वाद

2005

आशुतोश दुबे

असंभव सारांश

2006

बद्री नारायण

शब्दपदीयम्‌

2007

अनामिका

खुरदुरी हथेलियाँ

2008

दिनेश कुमार शुक्ल

ललमुनिया की दुनिया

2009

अष्टभुजा शुक्ल

दुःस्वप्न भी आते हैं

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हिंदुस्तानी एकेडेमी के सचिव श्री प्रदीप कुमार ने अपने प्रकाशकीय आलेख में इस पुस्तक की उपादेयता पर प्रकाश डाला है। (बड़ा करके पढ़ने के लिए नीचे के आलेख पर क्लिक करें)

प्रकाशकीय प्रकाशकीय-२

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(पिछला आवरण पृष्ठ- सम्पादक त्रयी के परिचय के साथ)

आशा है यह संकलन काव्य साहित्य के पारखी आलोचकों, अध्येताओं, विद्यार्थियों व सामान्य पाठकों, के लिए अत्यंत उपयोगी होगा।

Wednesday, October 6, 2010

अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर और फ़ैज़ की जन्मशताब्दी पर आयोजित कार्यक्रमों की शृंखला - २

अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर और फ़ैज़ की  जन्मशताब्दी पर आयोजित कार्यक्रमों की शृंखला  - २

@"हिन्दी भारत" 

महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि., वर्धा द्वारा आयोजित अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर और फ़ैज़ की जन्मशताब्दी पर आयोजित कार्यक्रमों की शृंखला में दिनांक ३ अक्तूबर २०१० को प्रात:काल १० बजे से ‘नागार्जुन पर एकाग्र’  प्रथम सत्र  प्रारम्भ हुआ. जिसमें विषय-प्रवर्तन करते हुए प्रसिद्ध आलोचक विजेन्द्र नारायण सिंह ने कहा कि नागार्जुन संघर्ष व विद्रोह के कवि हैं.  उनका यायावरी जीवन उनके संघर्षशील जीवट का प्रमाण है. कई बार वे अतिरेक के कवि लगते हैं. वे नक्सलवाद और सम्पूर्ण क्रान्ति जैसी अराजक अवधारणा के कवि लगते हैं.

अवधेश मिश्र ने नागार्जुन के आमजन से जुड़ाव व संघर्षशीलता की प्रवृत्ति को रेखांकित किया.

दिल्ली वि.वि. के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. गोपेश्वर सिंह ने कहा कि -

 - वे अपना पक्ष स्पष्ट रूप से रखने वाले पारदर्शी कवि हैं, वे दुविधा के कवि नहीं हैं. 

शीत युद्ध की १९५०-६० की आलोचना, जब दुनिया दो खेमों में है, उस समय आलोचना भी दो खेमों में हैं, साहित्य में यह वही दौर है जिस काल के कवियों की हम यहाँ बात कर रहे हैं. आलोचना की दृष्टि से उस दौर का संघर्ष द्वन्द्व का संघर्ष है. तमाम अन्तर्विरोधों के बावजूद कोई एक राय बनाई नहीं जा सकती.  

 - उन्होंने सम्भवत: व्यक्तियों पर केन्द्रित सर्वाधिक कविताएँ लिखीं.

यदि हिन्दी कविता की पूरी परम्परा महामानवों की परम्परा है तब तो मुझे लगता है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास को दुबारा पढ़ा जाना चाहिए.

हिन्दी आलोचना की दिक्कतों पर प्रो. गोपेश्वर ने खुल कर विमर्श किया.

क्या कविता के कोई सार्वभौमिक प्रतिमान हो सकते हैं? हर जगह की अपनी मौलिक व भिन्न कविता है. उसके प्रतिमान भी उतने ही भिन्न हैं. कविता की अपनी स्थानीयता है और कविता की अपनी जातीयता है. मुझे लगता है कविता के प्रतिमानों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है. १९४० के बाद की अर्थत् प्रयोगवाद के बाद की कविता पर पुनर्विचार की अत्यन्त महती आवश्यकता है.  असल विवाद अज्ञेय के एक सुचिन्तत लेख के बाद प्रारम्भ हुआ, जिसमें उन्होंने ‘पाठक के एकान्त’ की बात कही.  और मेरे विचार से "  पाठक के एकान्त की कविता"     होना ही  वस्तुत: कविता का निकष है.

आगामी वक्ता के रूप में प्रो. शम्भुनाथ ने अपने सम्बोधन में कहा कि -

-  भले ही ऐसे आयोजन साहित्यिक कर्मकांड कहे जाते हों किन्तु ये ही हमें ऐसे अवसर देते हैं कि हम उन रचनाकरों के पाठ को पुन: देखें पढ़ें, नई तरह से अपनी धारणाओं का पुनर्गठन कर सकें.

-  एक समय था जब आलोचना इन चारों कवियों को आर-पार करके देखती रही या बाँट कर देखती रही, सामाजिकता की बात को लेकर अलगाते रहे. किन्तु आज भी क्या इन चारों कवियों के मूल्यांकन का कोई सामान्य तत्व नहीं हो सकता है?  अनुभव की स्वाधीनता चारों कवियों में सामान्य तत्व है. इन चारों कवियों ने अनुभव की सामुदायिक किलेबन्दी स्वीकार नहीं की. 

- नागार्जुन के काव्य में जेठ का ताप और पूर्णिमा का सौन्दर्य है.

 लेखक के स्वाभिमान के सन्दर्भ में उन्होंने नागार्जुन द्वारा इन्दिरा गाँधी द्वारा प्रदत्त सम्मान को ग्रहण करने के प्रसंग को नागार्जुन के शब्दों में सुनाया, जिस पर सभागार तालियों व ठहाकों से भर उठा.

नागार्जुन किसानचित्त के कवि हैं, नागार्जुन का साहित्य हमारे लिए अन्न है अत: नागार्जुन अन्न के कवि हैं.

प्रो. नीरज सिंह ने मंच पर बैठे ‘समूचे बिहार’ को सम्बोधित करने के अपने वाक्य द्वारा वातावरण को सहज व हास्यपूर्ण बनाते हुए अपने वक्तव्य का प्रारम्भ किया. उन्होंने कहा कि -

सर्वप्रथम मुझे गर्व है  कि नागार्जुन के सान्निध्य का सौभाग्य मिला. 

- भारतीय जनता की सम्पूर्ण मुक्ति के कवि हैं नागार्जुन. उनका स्वप्न था कि एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जहाँ मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण की कोई सम्भावना नहीं.

 डॉ. राम आह्लाद चौधरी व  उषाकिरण खान ने भी बाबा के रचनाकर्म के विविध पक्षों पर अपने विचार प्रस्तुत किए.  कार्यक्रम की अध्यक्षता  करते हुए खगेन्द्र ठाकुर ने  नागार्जुन के जीवन प्रसंगों को किन्हीं नए अर्थों में खोलते हुए उनकी सहज किन्तु विशिष्ट जीवनशैली का मर्म सुनाया, साथ ही कलकत्ता के कुछ प्रसंगों को नई अर्थवत्ता दी.  सत्र का संचालन कॄष्ण कुमार सिंह ने किया.


शमशेर पर एकाग्

जन्मशताब्दी वर्ष के इस कार्यक्रम के दूसरे दिन का दूसरा सत्र शमशेर के काव्यकर्म पर केन्द्रित था. कार्यक्रम की अध्यक्षता  कवि अरुण कमल ने और संचालन राकेश मिश्र ने किया.

डॉ. विनोद तिवारी  ने शमशेर की कविताओं के सन्दर्भ में विविध पक्षों पर  कुछ प्रश्न उठाते हुए अपनी बात रखी. कुछ बिन्दु हैं कि -

 - शमशेर का जनाधार या विभाव है या नहीं यह हम अज्ञेय व शमशेर के सन्दर्भ में देख सकते हैं. 

- क्या रचनाकार पार्टीबद्ध होकर रचना करता है?  नहीं, ऐसा नहीं. वह कर भी नहीं सकता है.

- इन कवियों के पास ऐसी भी बहुत सी कविताएँ हैं, कि उसी टोन या उसी तरह से आज का कोई कवि लिखे तो हमीं कहेंगे कि रद्दी हैं.

- क्या बोध गम्यता भी कविता की कोई शर्त है?

कविता को समझने के क्या कोई प्रतिमान हैं, क्या शमशेर को समझने के लिए कोई प्रतिमान गढ़े जाएँगे? प्रतिमान के बतौर एक सूत्रीकरण कर के शमशेर का मूल्यांकन किया जाता रहा है. कविता के तनाव, उसकी आंतरिक संरचना आदि की दॄष्टि से शमशेर की कविताओं का पाठ आवश्यक है.

प्रो. रंजना अरगड़े ने एक वक्ता की प्रेम पर टिप्पणी के सन्दर्भ में चुटकी लेते हुए अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया और "अपने समय के एल्बम को देखते हुए" शीर्षक आलेख का वाचन करते हुए कहा कि -

 - शमशेर की कविताएँ अपनी समकालीनता का एक एल्बम हैं। हमारे पहले की तस्वीर हमारे आज से कई बार इतनी भिन्न होती है कि हम स्वयं नहीं पहचान पाते. कई बार समूचा भोलापन खो चुका होता है.

उनके आलेख का प्रस्थानबिन्दु समकालीन मुद्दों के प्रति शमशेर की सम्वेदनशीलता की पड़ताल करना था. विशेषत: शमशेर की रचनाशीलता में भाषा के सन्दर्भों की अच्छी पड़ताल (रचनाभाषा सहित) उन्होंने अपने आलेख में की.

-  सूक्ष्म अभिव्यक्तियों के लिए जो भाषा शमशेर गढ़ते हैं वह आज की रचनाधर्मिता को उनकी देन है.

वि. वि. के शोधार्थी उमाकान्त चौबे  ने प्रश्न उठाया कि शमशेर की कविता में वाक्य की अपेक्षा शब्द का ईकाई होना पाठक और विद्यार्थी को नहीं खटकता. किन्तु जो कुछ दिक्कत आलोचना को उसके अर्थ के लिए आती है,  क्या वह दिक्कत आलोचना की है?


सत्र का अध्यक्षीय वक्तव्य  देते हुए अरुण कमल ने इस बात को रेखांकित किया कि -

-  आज जिस प्रकार शमशेर वाले इस सत्र में सबसे कम वक्ता, सब से कम श्रोता हैं, यही शमशेर के साथ आजीवन होता रहा कि बहुत कम लोग उनके साथ रहे, चले.

- जिन कवियों को आप प्यार करते हैं उनकी कोई शताब्दी नहीं होती.

- कवियों को पढ़ते समय आम पाठक यह नहीं सोचता कि इन कवियों की क्या ‘विचारधारा’ थी. सवाल यह नहीं कि कौन बड़ा कवि है, कौन छोटा. कभी किसी अवसर पर कोई कविता आपके दिल के साथ होती है, कभी कोई. मानो आप विभिन्न देशों की यात्रा पर हैं और आपकी जेब में विभिन्न देशों के सिक्के रखे हैं. जब आप जिस देश में होंगे, वहाँ उस देश के सिक्के को ही प्राथमिकता देंगे.

 पाठक के लिए कविता पढते समय कवि की जीवनदृष्टि महत्वपूर्ण होती है, न कि उसका व्यक्तिगत जीवन.

- बिना मलयज की डायरी पढ़े आप शमशेर को नहीं समझ सकते.

- शब्दों को अत्यन्त सम्वेदनशीलता के साथ बरतने वाला कवि हिन्दी में निराला के बाद शमशेर ही हुए, दूसरा कोई नहीं.

 - हिन्दी साहित्य के इतिहास के झगडों को पाठक के लिए नहीं गिना माना जाना चाहिए.

अरुण कमल ने बाबा से उनकी पसन्द के रचनाकार पूछे जाने के अपने प्रश्न के उत्तर में बाबा द्वारा सुझाई दो पुस्तकों का नामोल्लेख करते हुए बताया कि वे हैं ‘सदुक्तिकरणामृत’, तथा ‘सुभाषितरत्नसंग्रह’.

 फ़ैज़ पर एकाग्र


दोपहर के भोजनोपरान्त तीसरा व अन्तिम सत्र फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की रचनाधर्मिता पर केन्द्रित था, जिसकी अध्यक्षता अली ज़ावेदने  संचालन  राकेश ने किया.

 फ़ैज़ पर केन्द्रित अपने आलेख में डॉ. प्रीति सागर ने जानकारियाँ बाँटीं कि -

 - फ़ैज़ पर गालिब, मार्क्स और अपने दो उस्तादों शम्सुल अल्माह सैयद मीर हसन तथा प्रो. युसुफ़ सलीम चिश्ती का खासा असर था.

-उन्होंने गज़लों में उर्दू शायरी रवायत को पूरी तरह बरता, रवायती प्रतीकों को अपनी रचनाशीलता से जोड़ कर  प्रतीकों को नए अर्थ दिए.

- फ़ैज़ को अपनी भाषा से बहुत प्रेम था. वे अपनी भाषा के लिए अत्यन्त चिन्तित होने के साथ साथ गर्वित भी थे.

- ज़िन्दगी भर आम  आदमी के लिए सोचने वाले इस शायर ने जबरन शेर कहने की कोशिश कभी नहीं की

- गुलज़ार का कथन है - "फ़ैज़ की शायरी के रुक जाने का अर्थ है वक्त की नब्ज़ का रुक जाना"


 अगले वक्ता के रूप में  दिनेश कुशवाह के वक्तृत्व में जिन बिन्दुओं को रेखांकित किया गया, वे थे - 

मानसिक व आर्थिक रूप से पिस रहा यन्त्रणाग्रस्त व्यक्ति उनकी कविता के केन्द्र में है.

- फ़ैज़ की प्रसिद्धि को उनके जेल जाने से जोड़ कर देखने वालों से उन्होंने पूछा कि अन्य जो कवि प्रसिद्ध हुए हैं वे भी क्या जेल गए हैं!

- प्राचीनता के साथ नवीनता का समन्वय व उसे कहने का अन्दाज़ कवि को विशिष्ट बनाता है. यह फ़ैज़  की कविता की विशिष्टता थी.

- आम आदमी को बहकाने वाले खयाली छद्मों का पर्दाफ़ाश फ़ैज़ ने किया.

- फ़ैज़ का आशिकाना मिज़ाज़ हमें ही नहीं बुजुर्गों को भी प्रभावित करता है, उन्होंने कहा मेरी दो ही प्रेमिकाएँ हैं, एक है मेरी महबूबा और दूसरा है मेरा देश.
-एक जगह उन्होंने लिखा मैंने तीन इश्क किए जिन्हें दर्ज़ किया जाना चाहिए;

- फ़ैज़ ने सिखाया कि जो रोमान है शायरी में, वही हमें फ़ाँसी के तख्ते से फन्दे चूमने तक को भी प्रेरित करता है. 


उपस्थितों के आग्रह के उपरान्त कवि आलोक धन्वा मंच पर आए व अपनी धाराप्रवाह शैली में संगोष्ठी के दो दिन के विमर्श पर अपनी टिप्पणी देते हुए अत्यन्त रोचक व सटीक ढंग से स्थापित किया कि - 

-  कवियों के पक्ष विपक्ष में बात करते समय यह जान लेना अनिवार्य है कि ये चारों कवि महान् जीवनेच्छाओं के कवि हैं.

- इन के पाठ से एकान्त व जीवन दोनों में ताकत मिलती है.

- प्रत्येक कवि किसी न किसी व्यक्ति की  इच्छा को पूरा करता है.

- आधुनिक लोकतन्त्र की चर्चा करेंगे तो अज्ञेय के पास जाना होगा. महत्वपूर्ण यह नहीं कि वे मार्क्सवादी थे या नहीं, महत्वपूर्ण यह है कि राष्ट्र की अवधारणा को जिन्होंने संगठित किया उनमें अग्रणी थे अज्ञेय.

- अज्ञेय को लेकर कोई कंजूसी नहीं होनी चाहिए, कोई एन्काऊंटर की स्थिति नहीं होनी चाहिए.

- फ़ैज़ आधुनिक लोकतन्त्र के कवि थे और आधुनिक लोकतन्त्र समाजवाद के बिना सम्भव नहीं.

- फ़ैज़ जहाँ जाते हैं वहाँ जाना भी हमारे लिए कठिन है.

- कवियों की तुलनात्मक चर्चा यहाँ यों हुई है जैसे आप उन्हें नम्बर दे रहे हों.

- नागार्जुन उतने ही बड़े व्यंग्यकार थे जितने बड़े ब्रेख्त.

- जो ऊँचाई हमें कबीर में मिलती है कि कबीर सत्य को जानने के लिए किसी भी स्टेबिलेटी, ताकत... जो एकाधिकार का रूप लेती है, को तोड़ते हैं. नागार्जुन भी वैसे ही कवि थे. उन्होंने सत्ता को तोड़ने और उसके विरुद्ध काम किया.


 अध्यक्षीय वक्तव्य के रूप में सत्र की अध्यक्षता कर रहे अली ज़ावेद ने संगोष्ठी को महत्वपूर्ण बताते हुए महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा को इस पहल के लिए साधुवाद दिया और कहा कि  -

- साझा संस्कृति की दिशा में व उसकी परम्परा में यह गोष्ठी विशेष महत्व रखती है.

- ऐसे आयोजनों का उद्देश्य हवा में बातें करना नहीं होता अपितु इन कवियों की भविष्य की प्रासंगिकता व मार्गदर्शक की भूमिका तय करना होता है.

- जब हम अमीर खुसरो को हिन्दी व उर्दू की रवायत का कवि मानते हैं तो तुलसी, नागर्जुन या फ़ैज़ क्यों नहीं उस साँझी सांस्कृतिक विरासत के कवि? लिपि को हटा दीजिए तो शेष बाधा क्या है? पहले भी प्रेमचन्द पर केन्द्रित आयोजन हुए और मुझे कभी नहीं लगा कि कोई हिन्दी का और कोई उर्दू का अलग अलग रचनाकार हैं.

- लोग कहते हैं कि आयडियॉलॉजी की बात मत कीजिए, बस शायरी की बात कीजिए, परन्तु क्या आयडियॉलॉजी के बिना शायरी सम्भव है? वाल्मीकी का रामायण-काव्य भी उत्पीड़न के विरुद्ध उठी कवि की कलम है. यही सच्ची कविता है, शायरी है.

- क्या नारेबाजी की भी कोई स्टैटिक्स होती है या नहीं. यदि नहीं तो भगत सिंह का इन्कलाब ज़िन्दाबाद कैसे विश्वभर में छा गया?

- मुझे दुनिया में "वसुधैव कुटुम्बकं "   से बड़ा कोई और नारा नहीं लगता. क्योंकि जो सारी दुनिया की बात करता है, वह किसी एक कौम या वर्ग की बात नहीं करता. 

 - सच के प्रति अपनी पक्षधरता दिखाने की दिशा में ऐसे आयोजन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.


ध्यातव्य है कि महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि., वर्धा द्वारा आयोजित जन्मशताब्दी कार्यक्रमों के प्रथम दिन उद्‍घाटन सत्र में एकत्र देश के विभिन्न भागों से आए साहित्यिकों, कलाकर्मियों, शब्दकर्मियों, अध्यापकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों ने  एक शोक सन्देश प्रस्तुत कर प्रख्यात रंगकर्मी,संगठनकर्ता, कवि एवं ‘अभिव्यक्ति’ पत्रिका के सम्पादक  शिवराम के असामयिक निधन पर सभागार में दो मिनट का मौन रख उन्हें श्रद्धांजलि दी व उनके शोक सन्तप्त परिजनों के प्रति हार्दिक सम्वेदना प्रकट की.

संगोष्ठी में माननीय संचार मन्त्री, भारत सरकार, नई दिल्ली के नाम एक पत्र भेजा गया, जिसमें हिन्दी के चार कवियों की स्मृति में डाक टिकट जारी करने की माँग करते हुए लेखकों साहित्यकारों ने हस्ताक्षर किए। पत्र में लिखा गया है कि -


वर्ष २०१० हिंदी के लोकप्रिय एवं महान् कवियों - नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह तथा सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्मशताब्दी वर्ष है. ये चारों कवि भारतीय स्वातन्त्र्योत्तर साहित्यिक -सांस्कृतिक इतिहास के पुरोधा रहे हैं. न केवल हिन्दी अपितु अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं का बुद्धिजीवी एवं सामान्य जनसमुदाय इन चारों कवियों के कृतित्व से भली भाँति परिचित है तथा इनके बीच इनकी सम्माननीय स्मॄति प्रवहमान है. 

हम हिंदी के समस्त लेखक साहित्यकार महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के माध्यम से जिसके तत्वावधान में इन कवियों के शताब्दी कार्यक्रमों की शृंखला की उद्‍घाटन संगोष्ठी २-३ अक्‍तूबर २०१० को आयोजित की जा रही है, माँग करते हैं कि भारतीय रचनाशीलता एवम् मनीषा के प्रतिनिधि इन चारों कवियों पर भारतसरकार का संचार मन्त्रालय डाकटिकट जारी करे. यह न केवल राज्य का दायित्व है अपितु इन कवियों के अवदान के प्रति उसकी सच्ची श्रद्धाशीलता होगी."


इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में प्रमुख नाम  -  प्रो. नामवर सिंह (कुलाधिपति), विभूति नारायण राय ( कुलपति), प्रो. अरविन्दाक्षन (प्रतिकुलपति), विजेन्द्र नारायण सिंह, प्रो. नित्यानन्द तिवारी, प्रो. खगेन्द्र ठाकुर, प्रो. निर्मला जैन, आलोक धन्वा, प्रो. गंगाप्रसाद विमल, प्रो. शम्भु्नाथ, प्रो. बलराम तिवारी, अरुण कमल, दिनेशकुमार शुक्ल, रंजना अरगड़े, प्रो. गोपेश्वर सिंह, प्रो. नीरज सिंह, रामआह्लाद चौधरी, उषाकिरण खान, अखिलेश,  धीरेन्द्र अस्थाना, बोधिसत्व, विमल कुमार,  डॉ. कविता वाचक्नवी, विजय शर्मा, अवधेश मिश्र, नरेन्द्र पुण्डरीक, दिनेश कुशवाह, प्रो. सूरज पालीवल, डॉ. शम्भु गुप्त, डॉ. कृपाशंकर चौबे, प्रो. के.के सिंह, मनोज कुमार पाण्डेय, शशिभूषण, डॉ. सुशीला टाकभौरे, सुरेन्द्र वर्मा, डॉ. उमेश कुमार सिंह, प्रो. अजय तिवारी, अली जावेद आदि के हैं.


केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित सत्र के वक्ताओं नरेन्द्र पुण्डरीक  डॉ. कविता वाचक्नवी ने केदार जी की काव्यकला पर अपने अभिमत दिए. नरेन्द्र पुण्डरीक ने सोदाहरण स्थापित किया कि केदार जी की काव्यभाषा के खिलने व खुलने की विशिष्टता उनकी रचनाशीलता की अद्भुत शक्ति है. केदार जैसे कवि की काव्यभाषा के प्रति बरती गई अतिरिक्त आत्मीयता तक की पहुँच अर्थ-विस्तार में नवीन उद्‍घाटन करती है. डॉ. कविता वाचक्नवी ने "केदारनाथ अग्रवाल का काव्यशास्त्र" विषयक अपने आलेख में मुख्यतया ‘मित्र-संवाद’ व अन्य चार पुस्तकों की भूमिका के रूप में लिखे गए गद्य-मात्र के विश्लेषण द्वारा उनके काव्य-विमर्श की दृष्टि को प्रतिपादित किया. कविता व पाठक का सम्बन्ध, पठनीयता, साधारणीकरण, मुक्त छंद, शिल्प के स्तर पर रचनाकार की निजता, काव्यशिल्प, लोक, काव्यप्रेरणा, निरन्तरता, तुक अन्तर्विरोध, सामासिकता, अर्थगाम्भीर्य, आलोचना की उपादेयता, कविता की आन्तरिक शक्ति, साहित्य में सत्य की प्रतिष्ठा, स्वाभावोक्ति, जनवादी प्रतिबद्धता, काव्यऊर्जा, सौन्दर्यबोध, समकालीनता का छद्म आदि जैसे शताधिक प्रश्नों पर गद्य में केदार के विमर्श को सामने रखा.

दो दिन चले इस साहित्यिक आयोजन के सभी वैचारिक सत्रों के समापन के उपरान्त कुलपति विभूति नारायण राय ने सभी आगतों का उनके वैचारिक अवदान के लिए धन्यवाद व्यक्त किया व समाहार करते हुए  कहा कि  संगोष्ठी में बहस का स्तर आशातीत रूप से सृजनात्मक रहा, ऐसी जीवन्त गोष्ठियों व बौद्धिक विमर्श का माहौल बना रहे, यह यत्न रहेगा.


दो दिन की उक्त संगोष्ठी में भाषा व साहित्य से जुड़े जिन अनेक गण्यमान्य व्यक्तियों ने अपनी भागीदारी से कार्यक्रम की शोभा  बढ़ाई, उनमें से प्रमुख व्यक्तित्व हैं -

डॉ. नामवर सिंह, डॉ. निर्मला जैन, डॉ. नित्यानन्द तिवारी, बलराम तिवारी, विनोद शुक्ला, अखिलेश, सुरेन्द्र वर्मा, मनोज कुमार पाण्डेय, मीता शर्मा (कोटा), धीरेन्द्र अस्थाना,  नरेन्द्र पुण्डरीक, अली जावेद, आलोक धन्वा, डॉ. कविता वाचक्नवी, अरुण कमल, अवधेश मिश्र, विभूतिनारायण राय, राकेश, सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, प्रो. सूरज पालीवाल, डॉ. शम्भु गुप्त, गंगाप्रसाद विमल, राजकिशोर, प्रो. सन्तोष भदौरिया, प्रो. गंगा प्रसाद विमल, प्रो. शम्भुनाथ, दिनेशकुमार शुक्ल, रंजना अरगडे, प्रो. गोपेश्वर सिंह, प्रो. नीरज सिंह, रामआह्लाद चौधरी, उषा किरण खान, बसन्त त्रिपाठी, धीरेन्द्र अस्थाना, बोधिसत्व, विमल कुमार, विजय शर्मा, दिनेश कुशवाह, डॉ. कॄपाशंकर चौबे, प्रो. के. के. सिंह, शशिभूषण, डॉ. सुशीला टाकभोरे डॉ. उमेशकुमार सिंह, प्रो. अजय तिवारी, अली जावेद आदि ।


विश्वविद्यालय के शोध छात्रों चित्रलेखा अंशु, ओमप्रकाश प्रजापति, रेणु, बच्चाबाबू, अमित बिस्वास तथा सन्तोष राय सहित विविध समितियों के संचालन में विवेक त्रिपाठी, संजय तिवारी, वैभव जी. सुशील, संदीप राय, आलोक श्रीवास्तव व  राजीव पाठक आदि ने सक्रिय सहयोग दे कर कार्यक्रम को अभूतपूर्व सफलता प्रदान की.  


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