हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जन सूचना अधिकार का सम्मान

जनसूचना अधिकारी श्री इंद्रजीत विश्वकर्मा, कोषाध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी,इलाहाबाद व मुख्य कोषाधिकारी, इलाहाबाद। आवास-स्ट्रेची रोड, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद कार्यालय-१२ डी,कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
प्रथम अपीलीय अधिकारी श्री प्रदीप कुमार्, सचिव,हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व अपर जिलाधिकारी(नगर्), इलाहाबाद। आवास-कलेक्ट्रेट, इलाहाबाद कार्यालय-१२डी, कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
दूरभाष कार्यालय - (०५३२)- २४०७६२५
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शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

बीसवीं शताब्दी हाशिए की शताब्दी थी: विभूति नारायन राय

जन्मशती उत्सव कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए कुलपति का उद्‌बोधन

इस वर्ष हिंदी के चार महान कवियों के जन्म के सौ साल पूरे हुए हैं। शमशेर, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन अब से सौ साल पहले पैदा हुए। उनका जीवन बीसवीं सदी का साक्षी रहा। उन्होंने जो कुछ लिखा उसमें उनके देश और काल की छाया स्वाभाविक रूप से परिलक्षित होती है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा इन चार कवियों की जन्मशती मनाने के बहाने बीसवी सदी का सिंहावलोकन करने के उद्देश्य से साहित्यिक गोष्ठियों की एक शृंखला प्रारम्भ किया जा रहा है। ये कार्यक्रम देश के विभिन्न शहरों में आयोजित होंगे। समापन कार्यक्रम दिल्ली में होगा।  इसी शृंखला का उद्घाटन कार्यक्रम आज गांधी-जयंती के अवसर पर वर्धा स्थित विश्वविद्यालय प्रांगण में आयोजित हुआ।

उद्‌घाटन सत्र की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध समालोचक निर्मला जैन ने किया और उद्घाटन वक्तव्य विश्वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह ने दिया। वक्ताओं द्वारा चारो कवियों की तुलनात्मक चर्चा की गयी। इस ब्लॉग की पिछली दो पोस्टें उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान ‘लाइव’ (यहाँ और यहाँ) प्रकाशित की गयीं।

DSC03350विषय प्रवर्तन- विभूति नारायण राय 

DSC03352 नामवर सिंह व निर्मला जैन

सबसे पहले विषय प्रवर्तन करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने इस कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए बताया कि कोई भी रचना न सिर्फ़ इसके रचनाकार के व्यक्तित्व का आइना होती है बल्कि उसके देश-काल के बारे में भी बहुत कुछ बताती है। साहित्यकार अपने समाज और देश-काल के बारे में बहुत संवेदनशील होता है, इसलिए उसकी कृतियाँ उसके समय का ऐतिहासिक दस्तावेज होती हैं। इन चार कवियों के रचना संसार में विचरण करते हुए हम बीसवीं सदी  में भी विचरण कर रहे होते हैं। इस प्रकार इस पूरे कार्यक्रम का एक उद्देश्य तो हिंदी साहित्य के इन चार महान विभूतियों व उनके रचनाकर्म के प्रति सम्मान की भावना को रेखांकित करने का है तो दूसरा उद्देश्य बीसवीं शताब्दी की प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास भी है।

बीसवीं शताब्दी को यदि एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं उसे हाशिए की शताब्दी कहना चाहूंगा। इस सदी में उपनिवेशवाद का अंत हुआ, लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ स्थापित हुईं और सदियों से समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग- जैसे दलित, आदिवासी और स्त्रियाँ- पहली बार मनुष्य का जीवन जीने का अवसर पा सके। इससे पहले हाशिए पर अटके लोगों के मानवाधिकार समाज के प्रभु वर्ग द्वारा अपहृत कर लिए गये थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई और विश्व मानवाधिकारों के चार्टर की घोषणा हुई तो मानव सभ्यता को जो उपहार मिला वह किसी भी धार्मिक पुस्तक से नहीं मिल पाया था।

इस कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण में नामवर जी ने बीसवी सदी को सर्वाधिक क्रांतिकारी घटनाओं की शताब्दी बताया। ऐसी शताब्दी जिसमें दो-दो विश्वयुद्ध हुए, विश्व की शक्तियों के दो ध्रुव बने, फिर तीसरी दुनिया अस्तित्व में आयी। समाजवाद का जन्म हुआ। सदी का अंत आते-आते इन ध्रुवो के बीच की दूरी मिटती गयी। तीसरी दुनिया भी बाकी दुनिया में मिलती गयी और समाजवाद प्रायः समाप्त हो गया। नामवर जी ने नागार्जुन की प्रशंसा करते हुए कहा कि बाबा ने काव्य के भीतर बहुत से साहसिक विषयों का समावेश कर दिया जो इसके पहले कविता के संभ्रांत समाज में वर्जित सा था। दलितों, म्लेच्छों, वंचितों और शोषितों को उन्होंने अपनी कविता में पिरोकर प्रभु वर्ग के सामने खड़ा कर दिया। चमरौंधा जूता पहनाकर ए.सी. ड्राइंग रूम में घुसा दिया। ऐसे पात्र इससे पहले प्रेमचंद की कहानियों में ही पाये जाते थे। नागार्जुन के दोहे सुनाकर उन्होंने दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

खड़ी हो गयी चाँपकर कंकालों की हूक।

नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक॥

जली ठूठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक

बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक

कार्यक्रम में निर्मला जैन ने अध्यक्षीय भाषण दिया जिसका संक्षिप्त व्यौरा पिछली ‘लाइव’ पोस्ट में दे चुका हूँ।

अभी प्रथम दिवस का दूसरा सत्र चल रहा है जो अज्ञेय पर केंद्रित है। इस सत्र के प्रमुख वक्ता हैं- प्रो. गंगा प्रसाद विमल, राजकिशोर, प्रो. बलराम प्रसाद त्रिपाठी, सुरेन्द्र वर्मा, डॉ. विजय शर्मा, डॉ. कृपाशंकर चौबे, मनोज कुमार पांडेय, शशिभूषण। कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के रीडर शंभू गुप्त जी कर रहे हैं।

 

DSC03364द्वितीय सत्र में मंचासीन- (दाएँ से) राजकिशोर, कृपाशंकर चौबे, सुरेंद्र वर्मा, गंगा प्रसाद विमल, बलराम प्रसाद त्रिपाठी, शम्भू गुप्त 

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विपुल दर्शक दीर्घा- कुलपति विभूति नारायण राय (कुर्ते में) राजकिशोर जी को सुनते हुए।

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

नामवर सिंह ने अज्ञेय को साहित्य क्षेत्र का नेहरू बताया था- निर्मला जैन

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प्रसिद्ध समालोचक निर्मला जैन ने अपनी टिप्पणी से सभागार में ठहाके लगवा दिए जब उन्होंने नामवर जी के सामने ही यह कहा कि एक बार नामवर जी यह लिखा था कि राजनीति के क्षेत्र में जो नेहरू युग है वही साहित्य के क्षेत्र में अज्ञेय युग है। जब उन्होंने नामवर जी से इसकी पुष्टि चाही तो वे चुप्पी लगा गये। निर्मला जी ने कहा कि यह तो कूटनीति से प्रेरित चुप्पी है जिसे आप स्वीकृति के रूप में ही लें।

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निर्मला जी के उद्गार;

चारो कवियों में केदार सबसे अधिक स्थानीय कवि थे। बाकी तीनो कवि विकट यायावर थे। केदार गार्हस्थ्य प्रेम के कवि थे। अपनी पत्नी को प्रेयसी के रूप में निरूपित किया। वस्तुतः वे उनकी प्रथम श्रोता/पाठक थीं। उनमें गहन इंद्रीय बोध है।

स्त्री विमर्श की दृष्टि से इन कवियों को फिर से देखा जाना चाहिए।

समय की चमक के नीचे की धातु की पहचान करना अधिक महत्वपूर्ण है।

विचारधारा से युक्त होने और मुक्त होने का समय है। इसकी समीक्षा भी होनी चाहिए। विचारधारा के संतुलन के बिना अच्छी रचना संभव नहीं है।

चारो में सबसे गंभीर चिंतन अज्ञेय का है। आलोचना की भाषा अज्ञेय ने दी। करीने से, नफ़ासत से, तरतीब से रचने की कला अज्ञेय के पास थी।  

हिंदी संग्रहालय एवं अभिलेखागार की वेबसाइट का उद्घाटन: (१:१० pm)

प्रसिद्ध उपन्यासकार सुरेंद्र वर्मा ने विश्वविद्यालय की ओर से स्थापित गये हिंदी संग्रहालय की वेबसाइट (www.archive.hindivishwa.org) का बटन दबाकर उद्घाटन किया। इस संग्रहालय में हिंदी साहित्यकारों के हस्तलिखित पत्र, रचनाएँ, निजी चित्र इत्यादि का संग्रह किया गया है। अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रवेशांक भी विशेष आकर्षण हैं।

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यह पोस्ट इस कार्यक्रम के दौरान ही तैयार करते हुए प्रकाशित की गयी है। इसमें सजीव प्रसारण के तत्व तो हो सकते हैम लेकिन एक सातत्य की कमी भी दिखायी दे सकती है। कृपया इसे इसी रूप में देखें।(सिद्धार्थ)

बुधवार, 3 जून 2009

पुस्तक चर्चा: कविता की जातीयता

कविता की जातीयता / डॉ. कविता वाचक्नवी / हिन्दुस्तानी एकेडेमी , १२ डी , कमला नेहरु मार्ग , इलाहाबाद - २११ ००१ / २००९ / २२५ रुपये / पृष्ठ
३६६[सजिल्द].


हिन्दुस्तानी एकेडेमी के ताजा प्रकाशन के रूप में आयी इस पुस्तक का प्राक्कथन डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय जी ने लिखा है। यहाँ उसे अविकल प्रस्तुत किया जा रहा है;

मुखपृष्ठ कविता की जातीयता

 

 

'जातीय' यहाँ 'राष्ट्रीय' का पर्याय है, परंतु यह राष्ट्र ‘नेशन’ नहीं है। जातीय या राष्ट्रीय का गहरा सांस्कृतिक अर्थ है, जो भौगोलिक या राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है। इस ग्रन्थ की लेखिका डॉ. कविता वाचक्नवी ने राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लिखा है- "जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं, उसके तत्त्वों का अन्वेषण भारतीय जातीयता की व्याख्या करने में समर्थ होगा। " डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राष्ट्र के तीन घटक माने हैं- भूमि, जन और संस्कृति। इनमें से किसी एक की भी अनुपस्थिति में राष्ट्र की कल्पना संभव नहीं है। भारतीय राष्ट्र में ‘भूमि’ के अंतर्गत, वर्तमान राजनीतिक और भौगोलिक सीमा से बाहर ऐसे भूखण्डों का समावेश भी किया जाता है जो परंपरा से उसके अंग रहे हैं और उसके सांस्कृतिक परिसर में आते हैं, परंतु बाद के दौर में किन्हीं राजनीतिक-भौगोलिक या अन्य कारणों से अलग जा पडे़ हैं। यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि बृहत्तर भारत की अवधारणा उन भागों का अधिग्रहण करने की आकांक्षा नहीं है। [न दूर दूर तक इसकी कल्पना है] क्योंकि वृहत्तर अर्थ में ‘राष्ट्रीयता’ अधिकार का कोई दावा नहीं, वह सांस्कृतिक जुडा़वों की एक अमूर्त संहिति है।
संस्कृति हमारे लिए दार्शनिक, आध्यात्मिक, नैतिक, कलात्मक और प्रवृत्तिगत संसार की अनुगूँज है। वह मूलतः मनुष्य से, प्रकृति से, धर्म से, मूल्य से, आत्मा से, समाज से, विश्व से हमारे संबंधों की प्रकृति सूचित करती है। [इस सूची को बढा़या जा सकता है] अर्थात हमारे अन्तर्सम्बन्धात्मक -बोध और मूल्य-संकल्पना का स्वभाव या प्रकृति क्या है! इसे पहचान कर हम देशों, संस्कृतियों या राष्ट्रों को समझ सकते हैं।
उदाहरण के लिए पश्चिम प्रकृति से मनुष्य के संबंध द्वन्द्वात्मक मानता है। वह प्रकृति पर विजय पाने का लक्ष्य रखता है, जबकि भारत प्रकृति को चिति का स्वरूप मानते हुए प्रणत होता है। धर्म को वह किसी एक समुदाय या पूजा विधि में केन्द्रित न मानते हुए उसकी बहुलता को मान्यता देता है। वह धर्म का अर्थ अभ्युदय और कल्याण की प्राप्ति मानता है। मनुष्य और समाज के बीच द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों को मान्यता न देते हुए वह समूह या समाज से व्यक्ति की लयात्मकता को मान देता है। विश्व से उसके संबंध में आत्मविजय का भाव न होकर ग्रहण और सामंजस्य का भाव है। उसकी चाहत है-‘आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः -’संसार का जो भी श्रेष्ठ है, भद्र है उसे मैं अपना बना लूँ। यह ग्रहण है अधिग्रहण नहीं; जिसके कारण देव जाति नष्ट हो गई थी। जयशंकर प्रसाद ने लिखा है कि देवताओं को सब कुछ स्वायत्त था- ‘बल, वैभव, आनंद अपार’, परंतु परिणाम क्या हुआ? समूल विनाश। सब कुछ को स्वायत्त करने में नहीं, सब कुछ के श्रेष्ठ ग्रहण में ही कल्याण निहित है। आत्मा से भी भारतीय मनुष्य का संबंध अहम् भाव का अनुभव नहीं है, सर्वात्मवाद को वह अपनी शिराओं में पाता है - सबका विकास, सबका उन्नयन, सबका आनन्द भारतीय स्वभाव की मूल संस्कृति है।
भारत के भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक चरित्र में सामासिकता है, जिसके केन्द्र में है सहिष्णुता, जिसे नरेश मेहता, ‘वैष्णवता’ कहते हैं | वैष्णवता का मूल करुणा है। गाँधी की प्रार्थना में था ‘वैष्णवजन तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाणे रे’। वैष्णवी भारत एक सहिष्णु, संवेदनशील, सामासिक भारत है, संगम जिसका स्वभाव है। विश्वभर में क्या कहीं ‘संगम’ को पावन मान कर पूजा जाता है? संगम भारत की सामासिकता की बोध-भूमि है। संस्कृति प्रकारांतर से हमारी सर्जनात्मक चेतना है जिसमें सौन्दर्य, गतिशीलता, उर्वरता, संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता है। वह भारत के लिए जड़ प्रत्यय नहीं है और जिनके लिए है वे शायद भारत और भारतीय संस्कृति की आत्मा से परिचित नहीं हैं। भारत की संस्कृति का निर्माण, नीति के उपदेशों या धर्म ग्रंथों से नहीं, काव्य ग्रन्थों से हुआ है। रामायण महाभारत तो सांस्कृतिक अवबोधन के काव्य हैं ही, वेद भी एक अर्थ में महान काव्य है। इसलिए भारतीयता का संधान भारतीय काव्य में करना एक सार्थक कार्य है।
डॉ. कविता वाचक्नवी ने अपने पर्यालोचन के लिए जातीयता की संकल्पना की दृष्टि से आधुनिक हिन्दी कविता को चुना है। बीसवीं शती के प्रारम्भ से लगभग ९वें दशक तक के कवियों को इसमें सम्मिलित किया गया है। यह समयावधि निरंतर लंबी हुई है क्योंकि समय की गति निरंतर तीव्र होती गई है और इसी गति से कविता भी बढ़ी है। भारतेंदु से लेकर उदय प्रकाश तक के काव्य-समय ने कितने परिवर्तन देखे हैं। इसलिए कदाचित भारतीयता की अभिव्यक्ति को किसी एक ढांचे में ढालना संभव नहीं हुआ है। भारतेंदु के समय में भारतीयता किस सामयिकता और सांस्कृतिक अवधारणा में व्यक्त हुई है, फिर मैथिलीशरण गुप्त और अन्य राष्ट्रीय भावधारा के कवियों में भारतीयता का क्या स्वरूप रहा है? छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, नई कविता और उत्तरकाव्य में भारतीयता किस रूप में उपस्थित है? यह सब देखना सरल काम नहीं है। इसके विवेचन में सर्वसमावेशिता का आग्रह प्रायः रहा है। आशय यह कि ऐसी समस्त बातें यदि हम भारतीयता के भीतर समाहित करते चले जाएँ जो युगानुरूप रचनाओं की विषय-वस्तु रही हैं तो स्वयं राष्ट्रीयता या भारतीयता के अपरिभाषेय होने का संकट बना रहता है। तब यह जानना दूभर हो जाता है कि हमारा आशय राष्ट्रीयता या जातीयता से क्या है और वह कौन-सा काव्य है जिसे हम इसके बाहर रखते हैं? कविता जी को इस समस्या का सामना करना पडा़ है। संभवतः इसीलिए उन्होंने भारतीयता का केनवास काफी विशाल रखा है।
आधुनिक युग की एक दूसरी समस्या यह है कि हम जैसे-जैसे आधुनिकता से उत्तर आधुनिकता और पराआधुनिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं, हमारे संबंध अपनी जातीय विरासत से खिसकते चले जा रहे हैं। ऐसे में यह अपरिहार्य लगता है कि हम नए सिरे से एक ओर तो विरासत की व्याख्या करें और दूसरी ओर अपने व्यवहार की समीक्षा भी करें। क्या कारण है कि नई पीढी़ अपनी विरासत से तो परायापन अनुभव करे जबकि पश्चिम से आती विचारधाराओं या विचारों को अपनाते हुए उसे ही आधुनिकता का पर्याय मानने लगे। यानी दूसरों की विरासत तो नई और अपनी विरासत पुरानी। इस अंतर्विरोध की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए। शायद इनके बीच से ही आधुनिकता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है और साहित्य और जातीयता के गतिशील संबंधों की सर्जनात्मकता पहचानी जा सकती है तथा समय की आँधियों में बह जाने वाले समूह से अलग साहित्य का एक नया रचनात्मक पाठ बनाने की पहल की जा सकती है।
डॉ. वाचक्नवी के इस ग्रन्थ की विशेषता यह भी है कि उन्होंने साहित्य और जातीयता के पारंपरिक संबंधों को पहचानते हुए भी इस संबंध को गतिशीलता दी, उनका यह काम किसी हद तक नवीनतम जीन्स प्रौद्योगिकी के अनुरूप ही है जो जीन्स और डीएनए में वंश, जाति, देश आदि के तत्वों की उपस्थिति सिद्ध कर चुकी है। इसी प्रक्रिया में वह विकास की पुष्टि करती है। यह ध्यातव्य है कि संसार में सब कुछ चलित है, यदि आधुनिकता की अवधारणा गतिशील है तो जातीयता की अवधारणा भी गतिशील है। इसी पारस्परिक गतिशीलता में जातीयता और आधुनिकता की प्रीतिकर सन्निधि पहचानने की कोशिश ही इस ग्रंथ का प्रयोजन भी है और चुनौती भी।
जैसे भाव की चिरंतन उपस्थिति होने पर भी भावात्मक संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं, वैसे ही राष्ट्रीयता की चेतना बनी रहने के बाद भी समयानुसार राष्ट्र से रचनाकार के संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं। इसका मोटा उदाहरण यह है कि स्वाधीनता-संग्राम के दौर में कवियों के लिए राष्ट्रीयता या भारतीयता से संबंध का अर्थ अलग था। उस समय व्यक्त राष्ट्रीयता मूर्त और सोद्देश्य थी, जबकि आज़ादी के बाद राष्ट्र से जनता की तरह कवि के संबंध भी बदल गए। इसलिए इस दौर में काव्य में राष्ट्रीयता की पहचान अलग ढंग से हो सकती है। यहाँ आकर राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों को वह अपने केंद्र में रखती है। इस युग में राष्ट्रीयता की साहित्य में पहचान कठिन हुई है जो बाद के काल में निरंतर कठिनतर और कठिनतम होती चली गई है, इस हद तक कि लगने लगता है कि इन कवियों में राष्ट्रीयता या जातीयता की खोज एक दकियानूसी सोच है। परन्तु कविता के विन्यास के ऐसे अनेक पक्ष होते हैं, जैसे भाषा, प्रतीक, बिम्ब, रूपक आदि, जिनमें राष्ट्र झाँके बिना नहीं रहता। इसके अलावा राष्ट्रीय सोच बहुत कुछ समकालीन राष्ट्रीय प्रश्नों से जुड़ जाता है। यहीं राष्ट्रीयता और इसके इतर काव्य को पहचानना चुनौती बन जाता है। कभी-कभी यह सरलीकरण का शिकार हो जाता है जो मूल आशय तक पहुँचने की दिक्कतें हैं।
डॉ. वाचक्नवी ने यह बेहतर आँका है कि भारतेंदु युग, राष्ट्रीय काव्यधारा युग और छायावादी युग के स्वाधीनता पूर्व के प्रत्यय अलग प्रणाली और संज्ञा में ढले थे जबकि छायावादोत्तर और उसके भी उत्तर युग में अलग प्रत्यय अलग प्रणाली में ढले हैं। अतीत के आदर्श का स्मरण एक युग की जातीयता थी जिसमें प्रकृति और जीवन की अंतश्चेतना का उद्‌घाटन किया गया था। इसके बाद देश में पसरे शोषित पीड़ितों के अधिकार और स्थिति का संज्ञान लिया गया है। इसके बाद वरण कि स्वाधीनता और भिन्न-भिन्न सूक्ष्म मार्गों की तलाश में निहित अभिव्यक्ति में राष्ट्रीयता थी और वर्तमान में अपने समय, परिवेश, मनुष्यता के बाह्यान्तर में घटित परिवर्तनों को व्यक्त करना भारतीयता माना गया। नितांत आज में जो एक तरफ से भूमण्डलीकरण का दौर कहा जाता है, राष्ट्रीयता की खोज शायद राष्ट्र की ओर से खडे़ होकर प्रतिवाद के स्वर हैं या अन्य प्रकार की निष्पत्तियाँ हैं। समयानुसार बदलते साहित्यिक प्रत्ययों और मुहावरों में जातीयता को परिभाषित करने की इस कोशिश पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
मैं डॉ. कविता वाचक्नवी को एक अनिवार्य विषय ['' कविता की जातीयता''] पर हिन्दी पाठक का ध्यान आकर्षित करने और दूर तक राष्ट्रीयता की गतिशीलता को कविता-धाराओं में पहचानने के दुस्तर कार्य को सम्पन्न करने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ। प्रवाहों के बीच एक निष्पक्ष धारणा से मूल्याँकन करने का एक कठिन काम उन्होंने किया है।

( लेखक प्रख्यात आलोचक व पूर्वग्रह के सम्पादक हैं तथा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक व नया ज्ञानोदय के संपादक रहे हैं । )

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