हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जन सूचना अधिकार का सम्मान

जनसूचना अधिकारी श्री इंद्रजीत विश्वकर्मा, कोषाध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी,इलाहाबाद व मुख्य कोषाधिकारी, इलाहाबाद। आवास-स्ट्रेची रोड, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद कार्यालय-१२ डी,कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
प्रथम अपीलीय अधिकारी श्री प्रदीप कुमार्, सचिव,हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व अपर जिलाधिकारी(नगर्), इलाहाबाद। आवास-कलेक्ट्रेट, इलाहाबाद कार्यालय-१२डी, कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
दूरभाष कार्यालय - (०५३२)- २४०७६२५
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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

काव्य संग्रह- केदार सम्मान के कवि

हिंदुस्तानी एकेडेमी की अनुपम भेंट

‘केदार शोध पीठ न्यास’ द्वारा प्रतिवर्ष समकालीन हिंदी कवियों में से ऐसे कवि को चयनित कर केदार सम्मान प्रदान किया जाता है जिन्होंने अपनी कविता से केदार नाथ अग्रवाल की जातीय काव्य परंपरा, सौंदर्य, प्रेम और संघर्ष की चेतना को आगे बढ़ाया है। वर्ष 1996 से प्रारम्भ किए गये इस पुरस्कार से अबतक चौदह समकालीन रचनाकारों को सम्मानित किया जा चुका है। हिंदुस्तानी एकेडेमी ने गुणवत्तायुक्त साहित्य के प्रकाशन की अपनी समृद्ध परंपरा का निर्वाह करते हुए इन चौदह पुरस्कृत कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन प्रकाशित किया है। इन कवियों का विवरण निम्नवत है:

वर्ष

कवि

पुरस्कृत कृति

1996

नासिर अहमद सिकंदर

जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में

1997

एकांत श्रीवास्तव

अन्न हैं शब्द मेरे

1998

कुमार अंबुज

क्रूरता और अनंतिम

1999

विनोद दास

वर्णमाला से बाहर

2000

गगन गिल

यह आकांक्षा समय नहीं

2001

हरीश चंद्र पांडे

एक बुरूँश कहीं खिलता है

2002

अनिल कुमार सिंह

पहला उपदेश

2003

हेमंत कुकरेती

चाँद पर नाव

2004

नीलेश रघुवंशी

पानी का स्वाद

2005

आशुतोश दुबे

असंभव सारांश

2006

बद्री नारायण

शब्दपदीयम्‌

2007

अनामिका

खुरदुरी हथेलियाँ

2008

दिनेश कुमार शुक्ल

ललमुनिया की दुनिया

2009

अष्टभुजा शुक्ल

दुःस्वप्न भी आते हैं

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हिंदुस्तानी एकेडेमी के सचिव श्री प्रदीप कुमार ने अपने प्रकाशकीय आलेख में इस पुस्तक की उपादेयता पर प्रकाश डाला है। (बड़ा करके पढ़ने के लिए नीचे के आलेख पर क्लिक करें)

प्रकाशकीय प्रकाशकीय-२

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(पिछला आवरण पृष्ठ- सम्पादक त्रयी के परिचय के साथ)

आशा है यह संकलन काव्य साहित्य के पारखी आलोचकों, अध्येताओं, विद्यार्थियों व सामान्य पाठकों, के लिए अत्यंत उपयोगी होगा।

बुधवार, 26 मई 2010

नलविलास-परिशीलन (Nal Vilas Parishilan : Dr. Arun Kumar Tripathi)

नलविलास-परिशीलन
लेखक : डॉ० अरुण कुमार त्रिपाठी
संस्करण : प्रथम २००९ ई०
मूल्य : २२५/- रुपये दो सौ पच्चीस मात्र
प्रकाशक : सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद।
मुद्रक : एकेडेमी प्रेस, दारागंज, इलाहाबाद।
पृष्ठ : ३६२
आकार एवं आवरण : डिमाई सजिल्द

प्रकाशकीय

लौकिक संस्कृत साहित्य में रामायण और महाभारत दो ऐसे उपजीव्य काव्य हैं जिन पर परवर्ती संस्कृत व हिन्दी साहित्य आश्रित रहा है। कवियों ने अपनी कृति के लिए कथानक का चयन बहुधा रामायण व महाभारत के ही विविध प्रसंगों से किया है। यह जरूर है कि कवि की प्रतिभा व मेधा ने उन कथानकों में अपने हिसाब से रस, छन्द, अलंकार, गुण, वृत्ति व रीति का प्रयोग करके उसे अत्यधिक आकर्षक व रुचिकर बना दिया। जैन महाकवि श्री रामचन्द्र सूरि ने महाभारत की नल दमयन्ती की कथा को उपजीव्य बनाकर नलविलास की रचना बारहवीं शताब्दी ई० में की। यद्यपि नलविलास की रचना पर रायण के नल चरित्र वर्णन का भी प्रभाव परिलक्षित होता है। अनेक जैन विद्वानों की भांति श्री रामचन्द्र सूरि की रचनाओं से मां भारती का भण्डार समृद्ध हुआ है। कवि रामचन्द्र सूरि नाटकों के प्राणभूत रसों को चरमोत्कर्ष तक पहुंचाने वाले नाटककार हैं। उनके नाटक की शैली सरल, सुबोध एवं रसवती हैं। रामचन्द्र सूरि के बारे में कहा जाता है कि वे शताधिक ग्रन्थों के रचयिता थे। वे प्रतिभाशाली कवि व नाटककार के साथ-साथ नाट्‌य शास्त्र के भी उद्‌भट आचार्य थे। ये संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचन्द्र के शिष्यों में अग्रणी थे। श्री सूरि जयसिंह सिद्धराज एवं उनके उत्तराधिकारी कुमारपाल की सभा के विद्वानों में अन्यतम थे।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने विगत वर्षों में ऐसे ग्रन्थों के प्रकाशन व पुनर्प्रकाशन का संकल्प लिया है जिनसे सारस्वत भण्डार की अभिवृद्धि होने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन हो। नल विलास परिशीलन ऐसे ही प्रकाशनों की एक कड़ी है। डॉ० अरुण कुमार त्रिपाठी ने अपनी प्रतिभा एवं खोजी वृत्ति के द्वारा नलविलास के विभिन्न पक्षों एवं प्रसंगों का विद्वत्तापूर्ण विवेचन किया है, जिससे ग्रन्थ अत्यन्त आकर्षक, सुरुचिपूर्ण एवं सरस बन गया है। मेरा विश्वास है कि 'नलविलास-परिशीलन' संस्कृत व हिन्दी साहित्य की कोश वृद्धि करने के साथ-साथ लक्षण ग्रन्थों जैसे काव्यशास्त्र व नाट्‌यशास्त्र के विभिन्न लक्षणों को व्याखयायित करेगा। आशा है कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी के गौरवशाली प्रकाशनों की श्रृंखला में प्रस्तुत पुस्तक 'नलविलास - परिशीलन' भी हिन्दी व संस्कृत के विद्वत्समाज में समान रूप से समादृत होगा।

दिनांक ५ जनवरी २००९
डॉ० एस०के० पाण्डेय
अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व)
इलाहाबाद एवं
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

पुस्तक-चर्चा एवं लोकार्पण समारोह

पुस्तक-चर्चा एवं लोकार्पण समारोह
२८ अप्रैल २०१०
अपराह्‌न ५ बजे

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान में २८ अप्रैल २०१० दिन बुधवार अपराह्‌न 5:00 बजे एकेडेमी के सभागार में पुस्तक-लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया है। जिसमें एकेडेमी की सद्यः प्रकाशित पुस्तकें चिद्‌यात्रा (कविता संकलन) - शीतला प्रसाद श्रीवास्तव, जगदीश गुप्त : व्यक्ति और काव्य- डॉ० प्रकाश त्रिपाठी, रहीम की काव्य-भाषा - डॉ० प्रकाश त्रिपाठी, हिन्दी व्यंग्य और शरद जोशी - डॉ० कमलेश सिंह की पुस्तक का लोकार्पण किया जायेगा।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा होंगे। विशिष्ट अतिथि डॉ० दिनेश कुमार शुक्ल होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध आलोचक दूधनाथ सिंह एवं मण्डलायुक्त, इलाहाबाद डॉ० पी०वी० जगनमोहन करेंगे। पुस्तकों पर चर्चा डॉ० मुश्ताक अली करेंगे।

आप सभी सादर आमंत्रित हैं।

(राम केवल)
सचिव,
हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद एवं
अपर जिलाधिकारी (वि०/रा०)
इलाहाबाद


शनिवार, 24 अप्रैल 2010

मार्कण्डेय पुराण (एक सांस्कृतिक अध्ययन) Markendeya Puran (Ek Sanskritik Adhyayan)

पुस्तक का नाम : मार्कण्डेय पुराण (एक सांस्कृतिक अध्ययन)
लेखक : डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल
संस्करण : प्रथम - १९६१
द्वितीय - २०१०
मूल्य : १८०.०० (एक सौ अस्सी रुपये मात्र)
प्रकाशक : सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
मुद्रक : एकेडेमी प्रेस, दारागंज, इलाहाबाद
आकार : डिमाई सजिल्द
पृष्ठ : २५१

प्रकाशकीय

भारतीय वाङ्‌मय का बहुत बड़ा हिस्सा धर्म और प्राचीन भारतीय विद्याओं से सम्बन्धित है। हमारी संस्कृति और इतिहास के अध्ययन में यह सब कुछ आधार-सामग्री का काम करता है। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने शुरू से ही इस आधार-सामग्री के शोधपरक संरक्षण का उपक्रम किया है। इसी क्रम में दशकों पहले प्रख्यात विद्वान्‌ डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने ७ दिसम्बर १९५७ को "मार्कण्डेय पुराण" के सांस्कृतिक पक्ष पर एक व्याख्यान दिया था। जिसे बाद में और संवर्धित करके पुस्तक का रूप दिया गया। यह पुस्तक १९६१ में प्रकाशित की गयी। एकेडेमी का यह महत्त्वपूर्ण प्रकाशन अब अप्राप्य है। शोधार्थियों और विद्वत्‌ समाज के आग्रह पर हम इस ग्रन्थ का पुनर्मुद्रण कर रहे हैं। पुस्तक के द्वितीय संस्करण के प्रकाशन में डॉ० सुरेन्द्र पाल सिंह के सहयोग के लिए हम आभारी हैं। आशा है शोधार्थियों और जिज्ञासुओं की एक महती आवश्यकता की पूर्ति इससे सम्भव हो सकेगी।

एक मार्च दो हजार दस
(१/३/२०१०)
राम केवल
सचिव,
हिन्दुस्तानी एकेडेमी,
इलाहाबाद।

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

सूर काव्य : दृष्टि एवं विमर्श

पुस्तक का नाम - सूर काव्य : दृष्टि एवं विमर्श
सम्पादक - डॉ० ब्रजेश्वर वर्मा
सहायक सम्पादक - डॉ० रामजी पाण्डेय
संस्करण - प्रथम
प्रकाशन वर्ष - सन्‌ २०१० ई०
मूल्य - २३०.०० रुपये दो सौ तीस मात्र
प्रकाशक - सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
मुद्रक - एकेडेमी प्रेस, दारागंज, इलाहाबाद
आकार - डिमाई सजिल्द

प्रकाशकीय

भारतीय मनीषा और भारतीय संस्कृति का चरमोत्कर्ष जिन कुछेक विभूतियों में चरितार्थ हुआ है "सूरदास"उनमें से एक हैं। कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि के रूप में उनके अवदान से हम सभी परिचित हैं। फिर भी अकादमिक स्तर पर उनके कृतित्व के शोधपरक अनुशीलन के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। उनके पंचशती समारोह के अवसर पर १९७८ में "हिन्दुस्तानी" पत्रिका का "सूर-विशेषांक" प्रकाशित किया गया था। जिसे विद्वत्‌जनों एवं शोधार्थियों के बीच काफी लोकप्रियता हासिल हुई। आज भी उसकी माँग कम नहीं हुई है। अतः एकेडेमी ने उसको पुस्तकाकार प्रकाशित करने का निर्णय किया। पहले भी "सुमित्रानन्दन पन्त" एवं "प्रेमचन्द" पर प्रकाशित विशेषांकों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। जिसका पाठकों के बीच भरपूर स्वागत हुआ है।

उसी क्रम में शोधार्थियों एवं विद्वत्‌ समाज की माँग को देखते हुए डॉ० ब्रजेश्वर वर्मा द्वारा संपादित यह "सूर-विशेषांक" पुस्तक रूप में प्रकाशित करते हुए हमें अपूर्व प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
३ मार्च सन्‌ २०१०
राम केवल
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी
इलाहाबाद



शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

हिन्दी रंगकर्म के अमृतपुत्र : डॉ० सत्यव्रत सिन्हा


हिन्दी रंगकर्म के अमृतपुत्र : डॉ० सत्यव्रत सिन्हा
डॉ० अनुपम आनन्द
मूल्य १८०.०० सजिल्द
पृष्ठ ३०७
प्रकाशन वर्ष २००९
प्रकाशक एवं वितरक : हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

प्रकाशकीय

रंगकर्म अपने आप में बहुआयामी विधा है। विविध कलाओं का खूबसूरत समुच्चय! और उसी अनुपात में व्यावहारिक स्तर पर उनका संयोजन-प्रदर्शन। कोई भी कला मूलत: जिस आस्वादकर्ता को संबोधित होती है, उसकी इतनी प्रत्यक्ष मौजूदगी और स्वीकृति किसी भी अन्य कला-विधा में नहीं होती। इसीलिए एक सच्चे रंगकर्मी से अपेक्षाकृत अधिक प्रतिबद्धता और गतिशीलता की भी आशा की जाती है। डॉ० सत्यव्रत सिन्हा ऐसे ही कुशल, संवेदनशील और सिद्धहस्त कलाकार थे। अभिनय की प्राथमिक सीढ़ी से चलकर वह कैसे क्रमश: नये-नये सोपान चढ़ते गये होंगे, इसका साक्षात्कार करना सचमुच एक सुखद और स्पृहणीय अनुभव हो सकता है। अन्तत: एक बड़े रंग निर्देशक के रूप में उन्होंने एक उचाई हासिल की, जिनके खाते में तरह-तरह के रंग-प्रयोग दर्ज हैं। इलाहाबाद जैसी सांस्कृतिक नगरी उनके निर्माण-विकास की साक्षी रही है और उनका कार्यस्थल भी। ‘प्रयाग रंगमंच’ जैसी संस्था के संस्थापक के रूप में उनका नाम शुमार किया जाता है। बनारस के बाद शायद इलाहाबाद ही वह नगरी है जहां हिन्दी रंगमंच ने कई महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किये। खास करके आधुनिक रंगमंच की पाश्चात्य परम्पराओं का अवगाहन इलाहाबाद में ही सर्वाधिक संभव हो सका। डॉ० सत्यव्रत सिन्हा उन थोड़े-से शख्सियतों में हैं, जिन्हें इसका श्रेय दिया जा सकता है।

ऐसे अनूठे रंगकर्मी के प्राय: समग्र अवदान को एक पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है। यह महत् कार्य उनके सुपुत्र डॉ० अनुपम आनन्द के लम्बे और समर्पित अध्यवसाय से ही सम्भव हो सका है। अनुपम जी स्वयं एक अच्छे रंगकर्मी और अध्येता हैं। डॉ० सिन्हा की जीवन-यात्रा से लेकर उनके लिखित अवदान और उनसे लिये गये साक्षात्कारों का उन्होंने बड़ी खूबसूरती से संयोजन किया है। जिस आत्मीयता के साथ उन्होंने इस महान रंगकर्मी के जीवन व कर्मवृत्तों को प्रस्तुत किया है, उसके लिए हम उनके ऋणी हैं। आशा है, पाठक और शोधार्थी इस महत्वपूर्ण कृति का भरपूर लाभ उठायेंगे।
२८ सितम्बर २००९
विजयादशमी
डॉ० एस०के० पाण्डेय
सचिव,
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

चिट्ठाकारी की राष्ट्रीय संगोष्ठी: कुछ यादगार तस्वीरें

हिन्दुस्तानी एकेडेमी सभागार में आयोजित गोष्ठी का उद्घातन सत्र बहुत ही भव्य, सुरुचिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से सम्पन्न हो गया। महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा और हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में प्रयाग की बुद्धिजीवी जनता की भारी भीड़ तो थी ही, साथ ही बड़ी संख्या में दूर-दूर से आये देश भर के चिट्ठाकारों की  उपस्थिति ने कार्यक्रम को अद्वितीय बना दिया।  प्रख्यात समालोचक प्रो. नामवर सिंह द्वारा औपचारिक उद्‌घाटन किए जाने के समय सभागार खचाखच भर चुका था और कुलपति विभूति नारायण राय जी के अध्यक्षीय उद्‌बोधन पूरा होने तक सभी श्रोता अपनी कुर्सियों पर जमें रहे।

हिन्दी चिट्ठाकारी के इतिहास, स्वरूप और प्रवृत्तियों पर रवि रतलामी जी की प्रस्तुति ने सबका ध्यान आकर्षित किया और इस माध्यम से अपरिचित लोगों को भी इसकी विस्तृत जानकारी मिल गयी।

कार्यक्रम का एक अन्य आकर्षण हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा हाल ही में प्रकाशित ब्लॉग आधारित पुस्तक ‘सत्यार्थमित्र’ का विमोचन भी हुआ। यह सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के इसी नाम के ब्लॉग पर प्रकाशित पोस्टों के संकलन से तैयार की गयी पुस्तक है। अपने प्रकार की हिन्दी में पहली पुस्तक होने के कारण इसका विशेष कौतूहल बना रहा।

आइए देखते हैं उद्‍घाटन सत्र की कुछ तस्वीरें:

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कुलपति जी ने दीप प्रज्ज्वालन किया

 

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प्रो.नामवर सिंह सरस्वती जी के चित्र पर माल्यार्पण करते हुए

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मुख्य अतिथि( ऊपर) तथा अध्यक्ष (नीचे) का स्वागत

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ज्ञानदत्त पाण्डेय जी का माल्यार्पण से स्वागत

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विषय प्रवर्तक - ज्ञान जी

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विषयवस्तु का प्रस्तुतिकरण: रवि रतलामी

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उद्‌घा्टन भाषण: प्रो. नामवर सिंह

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अजित बडनेरकर: “अब पुस्तक विमोचन होगा”

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लो जी, हो गया विमोचन... दुबारा हुआ फोटो-सेसन

बाएं से- राम केवल (सचिव- हिन्दुस्तानी एकेडेमी), ज्ञानदत्त पाण्डेय, विभूति नारायण राय, नामवर सिंह, सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, राकेश जी

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प्रो. अली अहमद फातमी... इस किताब में क्या है?

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राकेश जी (विशेष कर्तव्य अधिकारी- संस्कृति): ब्लॉग क्या है?

DSC00483विभूति नारायण राय: अध्यक्षीय उद्‍बोधन

भीड़ भरे सभागार की कोई तस्वीर इस कैमरे से नहीं ली जा सकी, इसलिए वह कभी और सही। अभी इतना ही...।

दूसरे सत्र की गर्मागरम बहस की चर्चा पढ़िए फुरसतिया और चिट्ठा चर्चा पर। कल दूसरे दिन जो होगा उसकी रपट का इन्तजार कीजिए...।

(प्रस्तुति- हिन्दुस्तानी एकेडेमी)

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

अखिल भारतीय सम्मेलन है किन्तु ब्लॉगर सुस्त लग रहे हैं।

पिछली पोस्ट पर हिन्दी ब्लॉग जगत के सक्रिय चिठ्ठाकारों से उनकी चुनिन्दा ब्लॉग-पोस्टें आमन्त्रित की गयी थी। हिन्दुस्तानी एकेडेमी जैसी प्रतिष्ठित संस्था के प्रांगण में हिन्दी चिठ्ठाकारी के सम्बन्ध में आयोजित आगामी राष्ट्रीय गोष्ठी के उद्‍घाटन अवसर पर प्रख्यात समालोचक प्रो. नामवर सिंह व महात्मा गान्धी अन्तर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय के हाथों इलाहाबाद की प्रबुद्ध जनता के सामने उस पुस्तक के लोकार्पण की योजना है। गत पाँच अक्टूबर तक की निर्धारित समय सीमा बीत जाने पर मैने जब एकेडेमी का मेलबॉक्स देखा तो स्थिति उत्साहजनक नहीं थी। कोई पन्द्रह-बीस प्रविष्टियाँ ही मिलीं थीं

ऐसी स्थिति में किताब कैसे छपेगी? छोटी सी चादर, क्या ओढ़े... क्या बिछाएं...किताब की मोटाई कैसे नपेगी?

इतना बड़ा ब्लॉगिंग परिवार और हजारों पोस्टों की बौछार, लेकिन हाथ आयीं बस दो-चार? क्या बात है यार?

मैने कुछ दोस्तों से पूछा...। क्यों प्यारे, अबतक काहे रह गये छूछा...?

कुछ लोगों ने ली अंगड़ाई, अपनी आलस भगाई, और तड़ से दस प्रविष्टियाँ बक्से में आयीं।

थोड़ी ढाढस बँध गयी, मेरी इच्छा, मेरी तैयारियों की राह, राह में आगे बढने की मेरी मेहनत मानो सध गयी।

लेकिन अभी ठहरिए, अभी पूरी बात नहीं बनी है। अभी भी ब्लॉगमण्डली के विस्तार के हिसाब से प्रविष्टियों की विरलता से उत्पन्न चिन्ता की बदली घनी है।

तेईस का कार्यक्रम तो बड़ा बन पड़ा है। वहाँ आने वाले महानुभावों का कद ऊँचा बहुत घणा है। इसीलिए हम आयोजकों का इम्तहान बहुत कड़ा है।

आप क्या सोचते हैं, आपके होने के बावजूद हम फेल हो जाएं? फुरसतिया जी के शब्दों में ‘पढ़े फारसी और बेंचे तेल’ हो जाएं।

सोचिए, दुनिया क्या सोचेगी... हमें यूँ ऊँघता देख क्यों नहीं हमारा मुँह नोचेगी?

कहकहे लगाएगी, ताने मारेगी...। इसी दम पर ब्लॉगिंग का गुनगान करते थे? यह कहकर दुत्कारेगी।

एक कायदे की किताब भर का मैटर जुटा नहीं सकते... कोई तीन सौ पेज क्वालिटी से भरा माल अटा नहीं सकते?

हे ब्लॉगजगत के महानुभावों, शूरवीरों, कलमकारों, लिख्खाड़ों... अपनी-अपनी मेहनत से ही बन चुके भीमकाय पहाड़ों...

कुछ तो रहम खाइए, मान जाइए, इस शारदा भूमि पर आइए, ब्लॉगजगत में जो कुछ अच्छा-बुरा हो रहा है उसे खुलकर बताइए, दुखी होकर रोइए या खुश होकर गाइए, कुछ भी गुनगुनाइए, ...बस अपनी कलम की ताकत दिखाइए,

पठाइए-पठाइए... अपनी चुनी हुई सबसे अच्छी रचना पठाइए।
पता है: hindustaniacademy@gmail.com

बिल्कुल अन्तिम तिथि: १० अक्टूबर, २००९ मध्यरात्रि।

निवेदक: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
कोषाध्यक्ष-हिन्दुस्तानी एकेडेमी

शनिवार, 26 सितंबर 2009

हिन्दी चिठ्ठों की किताब के लिए अपनी चुनिन्दा पोस्ट भेंजिए...।

हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में अनेक प्रतिष्ठित लेखक और साहित्यकार अपनी रचनाएं अन्तर्जाल पर प्रकाशित कर रहे हैं लेकिन उससे कहीं बड़ी संख्या ऐसे ब्लॉगलेखकों की है जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता के नैसर्गिक प्रवाह को यूँ ही निसृत होने दिया है। अपनी मस्ती में डूबे हुए ये अनूठे चिठेरे इस चक्कर में ही नहीं पड़ते कि उनका लिखा हुआ साहित्य की कोटि में रखा जाता है कि नहीं। बहुत से ब्लॉग लेखक ऐसे भी हैं जो अपनी पोस्टों के माध्यम से समाज, संस्कृति, राजनीति, घर-परिवार, विज्ञान, इतिहास, भूगोल आदि के विषयों पर ज्ञान का असीमित भण्डार उड़ेल रहे हैं। यह सब कुछ हिन्दी ब्लॉग समुच्चय को एक क्लाइडोस्कोप का रुप गुण देता है।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी की स्थापना हिन्दुस्तानी (हिन्दी और उर्दू) भाषा को विकास की सीढ़ियों पर ले जाने वाले सभी सार्थक प्रयासों को एक ऐसा मंच देने के उद्देश्य से हुई थी जहाँ मौलिक प्रतिभाओं को अपनी रचनाधर्मिता को प्रकाशित कराने का अवसर मिले और विद्वानों-मनीषियों के शोधपरक कार्यों को सामान्य विद्यार्थियों, अध्येताओं और साहित्यानुरागियों के उपयोग हेतु सहज ढंग से उपलब्ध कराया जा सके। इन उद्देश्यों की पुर्ति के लिए एकेडेमी द्वारा करीब डेढ़ सौ अमूल्य पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है और साहित्यिक गोष्ठियों, व्याख्यान मालाओं, सेमिनार और प्रतिभा सम्मान समारोहों का आयोजन अनवरत किया जाता रहा है।

अपनी इसी उत्कृष्ट परम्परा के निर्वहन के क्रम में हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के सौजन्य से हिन्दी ब्लॉगिंग के सम्बन्ध में एक राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार का आयोजन आगामी २३-२४ अक्टूबर, २००९ को किया जा रहा है। इस अवसर पर देश भर से अनेक चिठ्ठाकारों को आमन्त्रित कर अभिव्यक्ति के इस नये माध्यम के इतिहास, स्वरूप और प्रमुख प्रवृत्तियों पर दो दिवसीय चर्चा की जाएगी। इस अवसर पर पारम्परिक साहित्य जगत के अनेक प्रतिष्ठित विद्वान भी प्रतिभागी होंगे।
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इस अवसर पर एकेडेमी द्वारा एक पुस्तक का प्रकाशन कर उसके तत्समय लोकार्पण का निर्णय भी लिया गया है जिसमें लगभग पचास चिठ्ठाकारों की चुनी हुई एक-एक ब्लॉग पोस्टों को सम्मिलित कर एक प्रतिनिधि संकलन तैयार किया जाएगा। इसके लिए हिन्दी ब्लॉगर्स से प्रविष्टियाँ आमन्त्रित की जाती हैं। एक ब्लॉगर से केवल एक प्रविष्टि ही स्वीकार की जाएगी। हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा गठित सम्पादक मण्डल प्रविष्टियों के चयन पर विचार करेगा जिसकी संस्तुतियों के आधार पर पुस्तक का अन्तिम रूप निर्धारित किया जाएगा। एकेडेमी के ई-मेल पते (hindustaniacademy@gmail.com) पर अपनी प्रविष्टियाँ दिनांक ५.१०.२००९ की मध्यरात्रि तक अवश्य प्रेषित कर दें।

चिठ्ठाकार मित्रों द्वारा पुस्तक के शीर्षक व आवरण पृष्ठ के सम्बन्ध में यदि कोई सुझाव दिया जाता है तो उसका भी स्वागत है। यह पुस्तक हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से प्रिन्ट माध्यम के लिए एक अनुपम भेंट हो, यही हमारी आकांक्षा है।

सचिव - हिन्दुस्तानी एकेडेमी

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

अभिनन्दन, विमोचन के बहाने गुरु-महिमा पर चर्चा...

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्त्वावधान में गत शनिवार को एकेडेमी सभागार में संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रख्यात विद्वान, शिक्षक एवं राष्ट्रपति सम्मान से सुशोभित प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे का अभिनन्दन समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व कुलपति व प्रतिष्ठित मनीषी प्रो०गोविन्द चन्द्र पान्डेय ने की। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व कुलपति प्रो० के०बी० पाण्डेय समारोह के मुख्य अतिथि रहे।  दीप प्रज्ज्वालन के बाद डॉ. दिवाकर दीक्षित एवं उनके शिष्यों ने वैदिक मंगलाचरण से कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। लौकिक मंगलाचरण सुश्री स्मृति शुक्ला ने प्रस्तुत किया जो बहुत सराहा गया।। सचिव डॉ एस०के० पाण्डेय ने अतिथियों का स्वागत करते हुए अपने गुरू प्रो.सुरेश चन्द्र पाण्डेय जी की महनीय कर्तव्यपरायणता और सच्चे गुरूत्व की चर्चा की तथा लिखित अभिनन्दन पत्र का वाचन कर प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे को सम्मान स्वरूप अंगवस्त्र, नारियल तथा देवी सरस्वती की प्रतिमा के साथ समर्पित किया। इस अवसर पर प्रो०हरिदत्त शर्मा, प्रो०मृदुला त्रिपाठी, डॉ. गिरिजा शंकर शास्त्री, डॉ. राम मुनि पाण्डेय, श्री राजा राम उपाध्याय, डॉ मृदुला जायसवाल आदि ने प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे का वाचिक अभिनन्दन करते हुए अपने उद्‌गार व्यक्त किये।



इस समारोह में एकेडेमी से प्रकाशित निम्न चार पुस्तकों का लोकार्पण किया गया।



1. साहित्य-शेवधि’ (प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे अभिनन्दन ग्रन्थ) प्रधान सम्पादक - डॉ एस०के०पाण्डेय, मूल्य:३००/- पृष्ठ: ४३४

साहित्य-शेवधि 

 

2. राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश’ – डॉ. उमेश कुमार मिश्र मूल्य:११०/- पृष्ठ: १५२ राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश

 

3. चन्द्रालोक परिशीलन - डॉ स्मिता अग्रवाल मूल्य:२५०/- पृष्ठ: ३४०

चन्द्रालोक परिशीलन

 

4. नलविलास परिशीलन - डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी मूल्य:२२५/- पृष्ठ: २४४
नल-विलास परिशीलन

 

साहित्य शेवधि नामक अभिनन्दन ग्रन्थ में वस्तुतः प्रो. पाण्डेय के व्यक्तित्व के बारे में बहुत कम आलेख लिखे गये हैं (स्वयं गुरू जी ने अपने शिष्यों को मना कर दिया था।) इसमें संस्कृत और हिन्दी भाषा व साहित्य से जुड़े अनेक विद्वानों द्वारा विविध वि्षयों पर लिखित उत्कृष्ट कोटि के लगभग अस्सी लेख संकलित किये गये हैं। इन लेखकों में तीस प्रोफ़ेसर हैं और उन्चास शोध-उपाधि से सम्पन्न लेक्चरर और रीडर हैं। अनेक लेखक विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपति व विभागाध्यक्ष जैसे उच्च पदों पर आसीन हैं, या रहे हैं। गुरु-महिमा को रेखांकित करने वाला यह ग्रन्थ निश्चित रूप से पुस्तक प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अमूल्य धरोहर है।



‘राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश’ नामक पुस्तक में डॉ. उमेश कुमार मिश्र ने इस मध्ययुगीन गौरव ग्रन्थ मे उल्लिखित कश्मीर के कतिपय प्रसिद्ध राजाओं तथा मन्त्रियों का चरित्र बहुत रोचक शैली में प्रस्तुत किया है।



चन्द्रालोक परिशीलन में विद्वान लेखिका डॉ.स्मिता अग्रवाल ने अनुष्टुप छन्द में काव्यशास्त्रीय सिद्धान्त पर लिखे गये ग्रन्थ ‘चन्द्रालोक’ का परिशीलन किया है। इसमें कुल दस ‘मयूख’ हैं। इस लक्षण ग्रन्थ का साहित्य शास्त्रीय मूल्यांकन शोधार्थियों और उच्चस्तरीय अध्येताओं के लिए दिग्दर्शक का कार्य करेगा।



नलविलास-परिशीलन में डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी ने नल-दमयन्ती कथा के उद्भव को रेखांकित करते हुए इस कथानक पर आधारित ४१ ग्रन्थों का परिचय देते हुए इसमें से कुछ ग्रन्थों पर नाट्यशास्त्रीय विकास की दृष्टि से प्रकाश डाला है। ग्रन्थकार ने नाट्यदर्पण के प्रणेता जैनाचार्य श्री रामचन्द्र सूरि के विस्तृत परिचय के साथ उनके ग्रन्थ नलविलास नाटक पर विशेष ध्यान आकृष्ट किया है।



उपर्युक्त पुस्तकों के लोकार्पण के बाद गुरुवर्य के सम्मान में उनके अनेक शिष्यों ने अभिनन्दन करते हुए उनके प्रति श्रद्धा और आभार का भाव व्यक्त किया। सभा की अध्यक्षता करते हुए प्रो०गोविन्द चन्द्र पाण्डेय ने कहा कि प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे बहुत स्पष्टवादी तथा सरल बात कहने वाले हैं। मैं समझता हूँ कि सही मनुष्य को पहचानने के लिए सबसे सरल तरीका है उसकी जीवन शैली को जानना। एक उत्कृष्ट व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है कि उसकी बातें  खरी, तथा सीधी-सरल होनी चाहिए तथा आचार विचार सरल होना चाहिए। पाण्डे जी में ये दोनो बातें हैं इसलिए मेरे मन में उनके लिए बहुत आदर है।



मुख्य अतिथि प्रो०के०बी० पाण्डेय जी ने सभा को सम्बोधित करते हुए गुरू की तुलना माता से करते हुए कहा कि "माता को एक सत्पुत्र को जन्म देने और सत्पुरुष बनाने में कितना कष्ट होता है। प्रो०पाण्डे तो सैकड़ों सत्पुत्रों के सारस्वत जन्मदाता हैं और उनको सत्पुरुष बनाने में कितना कष्ट हुआ होगा इसका सहज अनुमान किया जा सकता है। अत: प्रो०पाण्डे तो अभिनन्दनीय हैं ही। मुख्य अतिथि ने बताया कि प्रो०पाण्डे पर गीता का श्लोक ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां’ को अक्षरश: चरितार्थ है।



कार्यक्रम का संचालन डॉ आनन्द कुमार श्रीवास्तव ने किया तथा कार्यक्रम के अन्त में एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने उपस्थित विद्वानों, अतिथियों, दर्शकों, श्रोताओ, और मीडिया के लोगों को एकेडेमी की ओर से धन्यवाद ज्ञापित किया।



(प्रस्तुति: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रविवार, 16 अगस्त 2009

हिन्दी ब्लॉगजगत का एक झरोखा: सत्यार्थमित्र... (पुस्तक चर्चा)



प्रकाशकीय

अंग्रेजी शब्द ‘ब्लॉग’ वेब-लॉग का संक्षिप्त रूप है जो अमेरिका में १९९७ ई. के दौरान अन्तर्जाल (इण्टरनेट) पर प्रचलन में आया। प्रारम्भ में कुछ ऑनलाइन पत्रिकाओं के ‘लॉग’ प्रकाशित किये जाते थे, जिनमें वेबसाइट के विभिन्न हिस्सों में प्रकाशित विविध सामग्रियों के लिंक दिये गये होते थे तथा साथ में इनके लेखकों की संक्षिप्त टिप्पणियाँ होती थीं। कालान्तर में इन्हें ही ‘ब्लॉग’ कहा जाने लगा और इनके लेखक ‘ब्लॉगर’ कहलाए।

ब्लॉग को विश्व के आम लोगों में भारी लोकप्रियता उस समय मिली जब अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के दौरान एक अमेरिकी सैनिक ने अपने युद्ध सम्बन्धी अनुभव को ब्लॉग के माध्यम से दैनिक आधार पर प्रकाशित करना प्रारम्भ किया। उस समय एण्ड्र्यू सुलीवान के ब्लॉग पृष्ठ को आठ लाख से अधिक लोगों ने खोला व पढ़ा। पाठकों की इतनी बड़ी संख्या प्रिन्ट माध्यम के अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशनों से आगे निकल गयी थी। देखते ही देखते १९९७-९८ के महज दर्जन भर ब्लॉगों से प्रारम्भ होने वाला सहज अभिव्यक्ति का यह नया माध्यम केवल चार वर्षों में दस लाख का आँकड़ा पार कर गया।

शीघ्र ही विश्व की प्रत्येक भाषा में सभी कल्पनीय विषयों और अकल्पनीय मुद्दों पर भी ब्लॉग लिखे जाने लगे। हिन्दी भाषा का प्रथम ब्लॉग नौ दो ग्यारह (९-२-११) प्रारम्भ करने का श्रेय बंगलुरू निवासी आलोक कुमार को जाता है, जिन्होंने पहली बार ब्लॉग को ‘चिठ्ठा’ नाम दिया और इस प्रकार वे ‘आदि-चिठ्ठाकार’ कहलाए। इस चिठ्ठे में उन्होंने कम्प्यूटर जगत के तकनीकी और अपने अन्य व्यक्तिगत अनुभवों को नियमित रूप से प्रकाशित किया। इलाहाबाद की छात्रा रह चुकी डॉ. पूर्णिमा बर्मन द्वारा हिन्दी में संचालित साप्ताहिक अन्तर्जाल पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ में रवि प्रकाश श्रीवास्तव (रवि रतलामी) ने एक आलेख प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था- अभिव्यक्ति का नया माध्यम: ब्लॉग। इस प्रकार के प्रयासों से हिन्दी ब्लॉग लेखन के कार्य में शनैः शनैः प्रगति होने लगी। प्रारम्भिक चिठ्ठाकारों में रवि रतलामी, देबाशीष, जीतेन्द्र चौधरी, अतुल अरोरा, अनूप शुक्ल, पंकज नरूला इत्यादि प्रमुख रहे।

अप्रैल २००३ में प्रारम्भ होने के बाद हिन्दी भाषा के चिठ्ठों की संख्या में वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। करीब छः साल बाद भी अभी कुल हिन्दी चिठ्ठों की संख्या दस हजार के आसपास ही है। इनमें भी नियमित रूप से सक्रिय रहने वाले हिन्दी चिठ्ठे ढाई हजार के आसपास ही हैं। वर्तमान में यह माध्यम तेजी से बढ़ रहा है। प्रतिदिन औसतन पच्चीस-तीस नये ब्लॉग हिन्दी ब्लॉग जगत से जुड़ रहे हैं। ब्लॉगर और वर्डप्रेस जैसे जालघर मुफ़्त में ब्लॉग लिखने और प्रकाशित करने की सुविधा देते हैं। ब्लॉग लेखक को कम्प्यूटर तकनीक का भी प्रारम्भिक ज्ञान ही पर्याप्त होता है।

ब्लॉगों की लोकप्रियता और अन्तर्जाल से जुड़े प्रबुद्ध वर्ग के लिए इसकी सहजता और सरलता ने प्रिन्ट माध्यम में भी इनकी चर्चा को अपरिहार्य बना दिया है। प्रायः सभी अखबारों और पत्र पत्रिकाओं द्वारा हिन्दी ब्लॉग जगत में प्रकाशित होने वाली रोचक और ज्ञान बर्द्धक जानकारी को अपने पृष्ठों में प्रमुख स्थान दिया जा रहा है। अनेक कवि, लेखक, पत्रकार, स्तम्भकार, वैज्ञानिक, समाजसेवी और अन्य प्रबुद्ध पेशों से जुड़े लोग अपनी बात रखने के लिए इस माध्यम की ओर झुक रहे हैं। इस माध्यम से ज्ञान-विज्ञान, संगीत, कला, संस्कृति, राजनीति, व्यापार, इतिहास, परिवार व समाज आदि अनेकानेक विषयों पर विचारों का आदान-प्रदान किया जा रहा है। ऐसे में पारम्परिक साहित्य के दृष्टिकोण से कुछ लोग ब्लॉग पर प्रकाशित सामग्री को साहित्य से इतर श्रेणी में रखने का विचार रख रहे हैं।

आचार्य मम्मट ने अपनी कालजयी कृति ‘काव्यप्रकाश’ के प्रथम उल्लास (खण्ड) में साहित्य के प्रयोजन की व्याख्या करते हुए बताया है कि साहित्य सृजन का उद्देश्य यश की प्राप्ति, अर्थोपार्जन, मानव व्यवहार का ज्ञान एवम्‌ अशुभ का शमन करना है। यह कार्य पत्नी के समान हितैषी और सद्‌प्रेरणा देने वाला होता है। इस दृष्टिकोण से देखा जाय तो ब्लॉग पर प्रकाशित अधिकांश सामग्री साहित्य की श्रेणी मॆं रखी जा सकती है। गुणवत्ता की दृष्टि से अच्छा और खराब कोटि का साहित्य इलेक्ट्रॉनिक और प्रिन्ट दोनो माध्यमों में समान रूप से पाया जाता है। ब्लॉग के माध्यम में चूँकि किसी प्रकार की मात्रात्मक सीमा या सम्पादकीय कैंची क्रियाशील नहीं है कदाचित्‌ इसलिए इसमें गुणवत्तायुक्त सामग्री का अनुपात थोड़ा कम हो सकता है। किन्तु इसका दूसरा पहलू यह है कि इस माध्यम में ब्लॉग लेखक को अपने विचार प्रकट करने की जो असीम और अनमोल स्वतन्त्रता मिली हुई है उससे उपजे साहित्य में एक अलग तरह की निर्दोष यायावरी और नैसर्गिक पारदर्शिता भी आ जाती है। मुक्त बाजार के नियम तो अपनी जगह हैं ही। यहाँ आना बेशक आसान है लेकिन ब्लॉग मंच पर सक्रिय बने रहना और निरन्तर आगे बढ़ते रहना उतना ही मुश्किल है। यहाँ वही जम पाएगा जिसमें दम होगा।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के प्रमुख उद्देश्यों में हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास के विविध सोपानों पर कदम मिलाकर चलते हुए इस अनुष्ठान में सक्रिय प्रतिभाग करना है। इसकी सिद्धि के लिए एक ओर जहाँ मूर्धन्य विद्वानों और मनीषियों की शोधपरक और कालजयी कृतियों को प्रकाशित कर प्रबुद्ध विद्यार्थियों और अध्येताओं को उत्कृष्ट विषय सामग्री उपलब्ध करायी जा रही है तो दूसरी ओर प्रतिभाशाली उदीयमान लेखकों और साहित्यकारों की उर्वर विचारभूमि से पैदा होने वाली नवीन रचनाओं को स्थान देकर उन्हें आम पाठक वर्ग में प्रतिष्ठित करने का प्रयास भी किया जाता है, ताकि वे बदलते युग के साथ तादात्म्य बिठाते हुए परम्परा और आधुनिकता का उत्कृष्ट सम्मिश्रण प्रस्तुत कर सकें। श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के ब्लॉग लेखों के संकलन का यह पुस्तकीय प्रकाशन इस उद्देश्य की कसौटी पर पूर्णतः खरा उतरता है।

पुस्तक: सत्यार्थमित्र (ब्लॉगपोस्ट संग्रह)
लेखक: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
प्रकाशक: हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
पृष्ठ सं. : २८८
मूल्य: रु. १९५/- मात्र

सरकारी उत्तरदायित्व के पद पर रहते हुए श्री त्रिपाठी ने व्यक्तिगत रूप में अपने आस-पास की दुनिया से संवेदना का जो रिश्ता कायम कर रखा है वह इनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकता है। “यह सरकारी ‘असरकारी’ क्यों नहीं है?” नामक पोस्ट में इनकी बेचैनी साफ झलकती है। बुजुर्ग पेंशनभोगियों की हालत बयान करती इनकी ग़ज़ल “हम हैं जिन्दा ये बताने का वक्त आया है” मन में सिहरन पैदा कर देती है। सरकारी नियम-कायदों के अनुपालन में कैसी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो सकती है इसका एक रोचक किस्सा “तिल ने जो दर्द दिया” में पढ़ने को मिलेगा। पारिवारिक और सामाजिक मुद्दों पर सिद्धार्थ जी की लेखनी बेजोड़ चलती है। “उफ़ ये मध्यम वर्ग”, “प्रकृति ने औरतों को क्या कम कष्ट दिए हैं?” और “लो, मैं आ गया सिर मुड़ाकर…” जैसे लेख इनकी प्रगतिशील सोच और रुढियों-आडम्बरों के विरुद्ध निर्भीक लेखन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। कम्प्यूटर कीऔर इन्टरनेट की दुनिया में गोते लगा रहे एक ब्लॉगर के व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में क्या परिवर्तन आ जाते हैं और उसे कैसी परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं इसकी झलक भी लेखक ने “समय कम पड़ने लगा है”, “ब्लॉगरी ने जिन्दगी बदल दी” जैसे लेखों में बखूबी दिखायी है। “किताबों की खुसर-फुसर” सुनकर उसे लिपिबद्ध कर देना एक विलक्षण प्रतिभा की ओर इशारा करता है। ‘पुराण चर्चा’ के माध्यम से श्री त्रिपाठी ने हमारे आदि ग्रन्थों में निहित अनेक रोचक और उपयोगी जानकारी खोजकर प्रस्तुत की है। ‘धुन्धकारी’ की कथा व ‘ढपोर शंख’ का आख्यान विशेष रोचक बन पड़ा है। कदाचित्‌ इसीलिए वर्तमान ब्लॉगजगत के शीर्ष पुरुष ज्ञानदत्त पाण्डेय ने शुरू में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि ‘सिद्धार्थ जी में उत्कृष्टतम ब्लॉगर बनने का पूरा रॉ-मटीरियल है।’

इस पुस्तक में जो आलेख सम्मिलित किये गये हैं वे अप्रैल २००८ से मार्च २००९ के बीच इनके नियमित ब्लॉग सत्यार्थमित्र पर प्रकाशित हुए हैं। सभी आलेख अत्यन्त रोचक, और भावपूर्ण शैली में लिखे गये हैं। गम्भीर और संवेदनशील विषय भी कहीं बोझिल नहीं हो पाये हैं। भाषा का प्रवाह और लालित्य पाठक को आद्योपान्त बाँधे रखता है। इन लेखों में जिस दुनिया की बात की गयी है वह हमारे आस-पास की सुपरिचित घरेलू दुनिया है जिसमें हम नित्य-प्रति साँस ले रहे हैं। यह पुस्तक उन साहित्य प्रेमियों के लिए विशेष उपयोगी और लाभप्रद है जो अभी इन्टरनेट की दुनिया से पूरी तरह नहीं जुड़ सके हैं। आशा है कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी के गौरवशाली प्रकाशनों की सृंखला में इस पुस्तक का सुधी पाठकों और साहित्यप्रेमियों द्वारा हृदय से स्वागत किया जाएगा।

हम इस पुस्तक के लेखक श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी को इस अनुपम कृति के प्रकाशन के अवसर पर साधुवाद देते हैं और उनके सफल और उज्ज्वल लेखकीय भविष्य की कामना करते हैं।

डॉ. एस. के. पाण्डेय
सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी
१२ डी, कमला नेहरू मार्ग, इलाहाबाद।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

पुस्तक चर्चा: एक संग्रहणीय ग्रन्थ



राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश
लेखक डॉ० उमेश कुमार मिश्र
मूल्य ११० रुपये पृष्ठ १५२ सजिल्द
प्रकाशन वर्ष २००९


वस्तुत: पूर्वाग्रह रहित होकर घटनाओं का यथातथ्य वर्णन करना ही इतिहास है। इस वैशिष्ट्य से युक्त राजतरंगिणी अपनी काव्यात्मक सरसता के कारण इतिहास ग्रन्थ के अतिरिक्त उत्कृष्ट काव्य भी है। इसके ऐतिहासिक, भौगोलिक, सामाजिक तथा राजनैतिक वर्णनों की प्रामाणिकता असंदिग्ध है, क्योंकि नीलमतपुराण इसका प्रमाण है, जो कल्हण के सामने था।
भारतवर्ष के प्राचीन काव्य रामायण तथा महाभारत के समान ही राजतरंगिणी मध्ययुगीन गौरवग्रन्थ है। यद्यपि इस ग्रन्थ में कश्मीर के कतिपय राजाओं तथा मंत्रियों का चरित्र ही लेखबद्ध किया गया है, तो भी तत्कालीन राजाओं, मंत्रियों के चारित्रिक विशेषताओं की पर्याप्त झलक मिल जाती है। साथ ही सम्यक् समीक्षण-दृष्टि के कारण ग्रन्थ की उपयोगिता कश्मीर की तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति की दृष्टि से अत्यधिक बढ़ जाती है।

प्रस्तुति: हिन्दुस्तानी एकेडेमी

सोमवार, 13 जुलाई 2009

पुस्तक चर्चा: चन्द्रालोक परिशीलन

 

ChandraLokParishilan

   चन्द्रालोक परिशीलन
लेखिका: डॉ० स्मिता अग्रवाल
मूल्य : २५० रुपये , पृष्ठ ३४० सजिल्द


 

प्रकाशन वर्ष २००९ 

 

 

‘चन्द्रालोक’ कोई साधारण ग्रन्थ नहीं है। दस मयूखों में विभक्त यह ग्रन्थ स्वयं में अनेक काव्यशास्त्रीय आचार्यों के सिद्धान्तों के मनन-चिन्तन पूर्वक निकाला गया नवनीत है। चन्द्रालोक की शैली नवीन एवं सूत्रात्मक है, जिसके कारण कहीं-कहीं पर आचार्य अपने सिद्धान्तों को स्पष्ट करने में असमर्थ हैं। अत: उनके ज्ञान हेतु पूर्ववर्ती एवं कतिपय पश्चाद्वर्ती आचार्यों के ग्रन्थों का अवलम्बन आवश्यक है।
आचार्य जयदेव संस्कृत काव्यशास्त्रीय आचार्यों के मध्य तक एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। जयदेव न केवल आलंकारिक हैं, अपितु ध्वनिवादी आचार्य भी हैं। जयदेव की दोनों कृतियॉं चन्द्रालोक तथा प्रसन्नराघव नाटक उनकी अद्भुत कविप्रतिभा एवं विलक्षणता को प्रकट करती है। चन्द्रालोक काव्यशास्त्र का ग्रन्थ है, तो प्रसन्नराघव नाट्यविद्या का ग्रन्थ। जयदेव कवि होने के साथ सहृदय एवं तार्किक भी हैं। उन्होंने न केवल अपने पूर्ववर्ती आचार्यों की परम्परा को आगे बढ़ाया, अपितु संस्कृत-साहित्य को ‘चन्द्रालोक’ के रूप में अनूठी, गूढ़, सैद्धान्तिक कृति प्रदान की।
चन्द्रालोक में काव्यस्वरूप से सम्बद्ध प्रत्येक मयूख नवीन सिद्धान्त को प्रतिपादित करता है। मम्मट के उत्तराधिकारी के रूप में यदि आचार्य जयदेव की कल्पना की जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जयदेव ने अपने ग्रन्थ का आधार मम्मट द्वारा प्रणीत काव्यप्रकाश को ही बनाया है। आचार्य अप्पयदीक्षित जो आचार्य जयदेव के अलंकार प्रसंग से अत्यन्त प्रभावित थे तथा चन्द्रालोक के पंचम मयूख को ही आधार बनाकर उन्होंने सम्पूर्ण ग्रन्थ ‘कुवलयानन्द’ की रचना की - उन्हें ग्रहण करने का यथेष्ट प्रयास ग्रन्थ में किया गया है। (

डॉ.एस.के.पाण्डेय)

बुधवार, 10 जून 2009

पुस्तक चर्चा: भारतीय ज्योतिष में प्रयाग

प्रयाग अनादिकाल से तीर्थराज की पदवी से विभूषित रहा है। यह ऋषियों, मुनियों, सन्तों एवं साधकों की पावन तपस्थली एवं साधनास्थली रही है। इसका ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं पौराणिक महत्व रहा है। न केवल यहॉं भगवती गंगा, यमुना और सरस्वती का दिव्य संगम है, प्रत्युत यहॉं वेदत्रयी का भी संगम है। इसकी अभिपुष्टि दक्ष प्रजापति के दशाश्वमेध यज्ञ से होती है। यहीं पर ब्रह्मा ने भी अनेक यज्ञों को सम्पादित किया था। वेद भगवान् की प्रवृत्ति यज्ञ है। यज्ञ कालाश्रयी हैं तथा कालज्ञ ही ज्योतिर्विद है। अतएव महात्मा लगध ने आर्च एवं याजुष ज्योतिष में कहा है - जो सम्यक रूप से ज्योतिषशास्त्र को जानता है वह यथार्थ में यज्ञ को जानता है।

भारतीय ज्योतिष में प्रयाग

प्रकाशक: हिन्दुस्तानी एकेडेमी
मूल्य: २२५ दो सौ पचीस रूपये मात्र
पृष्ठ: ३६०

   

 

 

 

भारतीय ज्योतिष में प्रयाग का योगदान स्वत: सिद्ध है। उसको अपनी लेखनी द्वारा जनसामान्य के समक्ष उपस्थापित करने का प्रशंसनीय प्रयास प्रस्तुत ग्रन्थ में विद्वान लेखक एवं ज्योतिर्विद डॉ० गिरिजा शंकर शास्त्री द्वारा किया गया है। भारतीय ज्योतिषशास्त्र के जिज्ञासुओं एवं अध्येताओं के लिए यह ग्रन्थ वस्तुत: रत्नप्रदीप है तथा संग्रहणीय भी।
डॉ० एस०के० पाण्डेय
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

रविवार, 7 जून 2009

पुस्तक चर्चा- हरि चरित: एक दुर्लभ धरोहर का प्रकाशन

हरि चरित्र अवधी भाषा का श्रीकृष्ण सम्बन्धी काव्य है। परम वैष्णव लालचदास कृत इस ग्रन्थ का रचनाकाल संवत् १५८७ बताया जाता है। हरि चरित्र में हरि गुनगान है- श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं का मनोहर वर्णन है जो श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध में पाई जाती हैं। हरि चरित्र इसलिए अपर नाम भागवत भाषा है। हरि चरित्र को एक पूरक कृतित्व कहा जाता है। रायबरेली उ०प्र० निवासी लालचदास ने अपने जीवन काल में इसके ४५ अध्यायों को ही लिखा था। उनके स्वर्गवास के पश्चात् उनके शिष्य आसानन्द ने पर्याप्त अन्तराल में इसे ९० अध्यायों में पूरा किया।

हरिचरित का मुखपृष्ठ

मूल्य ३७५ तीन सौ पचहत्तर रुपये मात्र
पृष्ठ ६५८ सजिल्द


हरि चरित्र में दोहा-चौपाई छन्द का प्रयोग हुआ है। यह काव्यग्रन्थ, रस, छन्द, अलंकार आदि काव्य सौष्ठवों से परिपूर्ण है। भाव व भाषा गाम्भीर्य के साथ भाषा में प्रवाह व सरसता है। इस भक्तिकाव्य को संकलित व सम्पादित करने का महान कार्य विज्ञान परिषद के प्रधानमंत्री प्रो० शिवगोपाल मिश्र ने किया है। ऐसे विलक्षण व महत्वपूर्ण अवधी भाषा के काव्य को सम्पादित कर प्रो० शिवगोपाल मिश्र ने मॉं सरस्वती के कोश में अभिवृद्धि की है।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी को ऐसी महनीय कृति प्रकाशित करते हुए न केवल अतिशय प्रसन्नता हो रही है अपितु गर्व की अनुभूति भी हो रही है। मुझे विश्वास है कि हरि चरित्र एकेडेमी के महत्वपूर्ण प्रकाशनों में अपना स्थान बनाएगा। आधुनिक हिन्दी के साथ-साथ अवधी, भोजपुरी व ब्रजभाषा के विद्वानों द्वारा भी यह ग्रन्थ समादृत होगा ऐसा मेरा अन्तर्मन कह रहा है। अस्तु।
रंग पंचमी, चैत्र कृष्ण
संवत् २०६५
डॉ० एस०के० पाण्डेय
सचिव
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

बुधवार, 3 जून 2009

पुस्तक चर्चा: कविता की जातीयता

कविता की जातीयता / डॉ. कविता वाचक्नवी / हिन्दुस्तानी एकेडेमी , १२ डी , कमला नेहरु मार्ग , इलाहाबाद - २११ ००१ / २००९ / २२५ रुपये / पृष्ठ
३६६[सजिल्द].


हिन्दुस्तानी एकेडेमी के ताजा प्रकाशन के रूप में आयी इस पुस्तक का प्राक्कथन डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय जी ने लिखा है। यहाँ उसे अविकल प्रस्तुत किया जा रहा है;

मुखपृष्ठ कविता की जातीयता

 

 

'जातीय' यहाँ 'राष्ट्रीय' का पर्याय है, परंतु यह राष्ट्र ‘नेशन’ नहीं है। जातीय या राष्ट्रीय का गहरा सांस्कृतिक अर्थ है, जो भौगोलिक या राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है। इस ग्रन्थ की लेखिका डॉ. कविता वाचक्नवी ने राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लिखा है- "जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं, उसके तत्त्वों का अन्वेषण भारतीय जातीयता की व्याख्या करने में समर्थ होगा। " डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राष्ट्र के तीन घटक माने हैं- भूमि, जन और संस्कृति। इनमें से किसी एक की भी अनुपस्थिति में राष्ट्र की कल्पना संभव नहीं है। भारतीय राष्ट्र में ‘भूमि’ के अंतर्गत, वर्तमान राजनीतिक और भौगोलिक सीमा से बाहर ऐसे भूखण्डों का समावेश भी किया जाता है जो परंपरा से उसके अंग रहे हैं और उसके सांस्कृतिक परिसर में आते हैं, परंतु बाद के दौर में किन्हीं राजनीतिक-भौगोलिक या अन्य कारणों से अलग जा पडे़ हैं। यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि बृहत्तर भारत की अवधारणा उन भागों का अधिग्रहण करने की आकांक्षा नहीं है। [न दूर दूर तक इसकी कल्पना है] क्योंकि वृहत्तर अर्थ में ‘राष्ट्रीयता’ अधिकार का कोई दावा नहीं, वह सांस्कृतिक जुडा़वों की एक अमूर्त संहिति है।
संस्कृति हमारे लिए दार्शनिक, आध्यात्मिक, नैतिक, कलात्मक और प्रवृत्तिगत संसार की अनुगूँज है। वह मूलतः मनुष्य से, प्रकृति से, धर्म से, मूल्य से, आत्मा से, समाज से, विश्व से हमारे संबंधों की प्रकृति सूचित करती है। [इस सूची को बढा़या जा सकता है] अर्थात हमारे अन्तर्सम्बन्धात्मक -बोध और मूल्य-संकल्पना का स्वभाव या प्रकृति क्या है! इसे पहचान कर हम देशों, संस्कृतियों या राष्ट्रों को समझ सकते हैं।
उदाहरण के लिए पश्चिम प्रकृति से मनुष्य के संबंध द्वन्द्वात्मक मानता है। वह प्रकृति पर विजय पाने का लक्ष्य रखता है, जबकि भारत प्रकृति को चिति का स्वरूप मानते हुए प्रणत होता है। धर्म को वह किसी एक समुदाय या पूजा विधि में केन्द्रित न मानते हुए उसकी बहुलता को मान्यता देता है। वह धर्म का अर्थ अभ्युदय और कल्याण की प्राप्ति मानता है। मनुष्य और समाज के बीच द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों को मान्यता न देते हुए वह समूह या समाज से व्यक्ति की लयात्मकता को मान देता है। विश्व से उसके संबंध में आत्मविजय का भाव न होकर ग्रहण और सामंजस्य का भाव है। उसकी चाहत है-‘आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः -’संसार का जो भी श्रेष्ठ है, भद्र है उसे मैं अपना बना लूँ। यह ग्रहण है अधिग्रहण नहीं; जिसके कारण देव जाति नष्ट हो गई थी। जयशंकर प्रसाद ने लिखा है कि देवताओं को सब कुछ स्वायत्त था- ‘बल, वैभव, आनंद अपार’, परंतु परिणाम क्या हुआ? समूल विनाश। सब कुछ को स्वायत्त करने में नहीं, सब कुछ के श्रेष्ठ ग्रहण में ही कल्याण निहित है। आत्मा से भी भारतीय मनुष्य का संबंध अहम् भाव का अनुभव नहीं है, सर्वात्मवाद को वह अपनी शिराओं में पाता है - सबका विकास, सबका उन्नयन, सबका आनन्द भारतीय स्वभाव की मूल संस्कृति है।
भारत के भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक चरित्र में सामासिकता है, जिसके केन्द्र में है सहिष्णुता, जिसे नरेश मेहता, ‘वैष्णवता’ कहते हैं | वैष्णवता का मूल करुणा है। गाँधी की प्रार्थना में था ‘वैष्णवजन तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाणे रे’। वैष्णवी भारत एक सहिष्णु, संवेदनशील, सामासिक भारत है, संगम जिसका स्वभाव है। विश्वभर में क्या कहीं ‘संगम’ को पावन मान कर पूजा जाता है? संगम भारत की सामासिकता की बोध-भूमि है। संस्कृति प्रकारांतर से हमारी सर्जनात्मक चेतना है जिसमें सौन्दर्य, गतिशीलता, उर्वरता, संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता है। वह भारत के लिए जड़ प्रत्यय नहीं है और जिनके लिए है वे शायद भारत और भारतीय संस्कृति की आत्मा से परिचित नहीं हैं। भारत की संस्कृति का निर्माण, नीति के उपदेशों या धर्म ग्रंथों से नहीं, काव्य ग्रन्थों से हुआ है। रामायण महाभारत तो सांस्कृतिक अवबोधन के काव्य हैं ही, वेद भी एक अर्थ में महान काव्य है। इसलिए भारतीयता का संधान भारतीय काव्य में करना एक सार्थक कार्य है।
डॉ. कविता वाचक्नवी ने अपने पर्यालोचन के लिए जातीयता की संकल्पना की दृष्टि से आधुनिक हिन्दी कविता को चुना है। बीसवीं शती के प्रारम्भ से लगभग ९वें दशक तक के कवियों को इसमें सम्मिलित किया गया है। यह समयावधि निरंतर लंबी हुई है क्योंकि समय की गति निरंतर तीव्र होती गई है और इसी गति से कविता भी बढ़ी है। भारतेंदु से लेकर उदय प्रकाश तक के काव्य-समय ने कितने परिवर्तन देखे हैं। इसलिए कदाचित भारतीयता की अभिव्यक्ति को किसी एक ढांचे में ढालना संभव नहीं हुआ है। भारतेंदु के समय में भारतीयता किस सामयिकता और सांस्कृतिक अवधारणा में व्यक्त हुई है, फिर मैथिलीशरण गुप्त और अन्य राष्ट्रीय भावधारा के कवियों में भारतीयता का क्या स्वरूप रहा है? छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, नई कविता और उत्तरकाव्य में भारतीयता किस रूप में उपस्थित है? यह सब देखना सरल काम नहीं है। इसके विवेचन में सर्वसमावेशिता का आग्रह प्रायः रहा है। आशय यह कि ऐसी समस्त बातें यदि हम भारतीयता के भीतर समाहित करते चले जाएँ जो युगानुरूप रचनाओं की विषय-वस्तु रही हैं तो स्वयं राष्ट्रीयता या भारतीयता के अपरिभाषेय होने का संकट बना रहता है। तब यह जानना दूभर हो जाता है कि हमारा आशय राष्ट्रीयता या जातीयता से क्या है और वह कौन-सा काव्य है जिसे हम इसके बाहर रखते हैं? कविता जी को इस समस्या का सामना करना पडा़ है। संभवतः इसीलिए उन्होंने भारतीयता का केनवास काफी विशाल रखा है।
आधुनिक युग की एक दूसरी समस्या यह है कि हम जैसे-जैसे आधुनिकता से उत्तर आधुनिकता और पराआधुनिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं, हमारे संबंध अपनी जातीय विरासत से खिसकते चले जा रहे हैं। ऐसे में यह अपरिहार्य लगता है कि हम नए सिरे से एक ओर तो विरासत की व्याख्या करें और दूसरी ओर अपने व्यवहार की समीक्षा भी करें। क्या कारण है कि नई पीढी़ अपनी विरासत से तो परायापन अनुभव करे जबकि पश्चिम से आती विचारधाराओं या विचारों को अपनाते हुए उसे ही आधुनिकता का पर्याय मानने लगे। यानी दूसरों की विरासत तो नई और अपनी विरासत पुरानी। इस अंतर्विरोध की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए। शायद इनके बीच से ही आधुनिकता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है और साहित्य और जातीयता के गतिशील संबंधों की सर्जनात्मकता पहचानी जा सकती है तथा समय की आँधियों में बह जाने वाले समूह से अलग साहित्य का एक नया रचनात्मक पाठ बनाने की पहल की जा सकती है।
डॉ. वाचक्नवी के इस ग्रन्थ की विशेषता यह भी है कि उन्होंने साहित्य और जातीयता के पारंपरिक संबंधों को पहचानते हुए भी इस संबंध को गतिशीलता दी, उनका यह काम किसी हद तक नवीनतम जीन्स प्रौद्योगिकी के अनुरूप ही है जो जीन्स और डीएनए में वंश, जाति, देश आदि के तत्वों की उपस्थिति सिद्ध कर चुकी है। इसी प्रक्रिया में वह विकास की पुष्टि करती है। यह ध्यातव्य है कि संसार में सब कुछ चलित है, यदि आधुनिकता की अवधारणा गतिशील है तो जातीयता की अवधारणा भी गतिशील है। इसी पारस्परिक गतिशीलता में जातीयता और आधुनिकता की प्रीतिकर सन्निधि पहचानने की कोशिश ही इस ग्रंथ का प्रयोजन भी है और चुनौती भी।
जैसे भाव की चिरंतन उपस्थिति होने पर भी भावात्मक संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं, वैसे ही राष्ट्रीयता की चेतना बनी रहने के बाद भी समयानुसार राष्ट्र से रचनाकार के संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं। इसका मोटा उदाहरण यह है कि स्वाधीनता-संग्राम के दौर में कवियों के लिए राष्ट्रीयता या भारतीयता से संबंध का अर्थ अलग था। उस समय व्यक्त राष्ट्रीयता मूर्त और सोद्देश्य थी, जबकि आज़ादी के बाद राष्ट्र से जनता की तरह कवि के संबंध भी बदल गए। इसलिए इस दौर में काव्य में राष्ट्रीयता की पहचान अलग ढंग से हो सकती है। यहाँ आकर राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों को वह अपने केंद्र में रखती है। इस युग में राष्ट्रीयता की साहित्य में पहचान कठिन हुई है जो बाद के काल में निरंतर कठिनतर और कठिनतम होती चली गई है, इस हद तक कि लगने लगता है कि इन कवियों में राष्ट्रीयता या जातीयता की खोज एक दकियानूसी सोच है। परन्तु कविता के विन्यास के ऐसे अनेक पक्ष होते हैं, जैसे भाषा, प्रतीक, बिम्ब, रूपक आदि, जिनमें राष्ट्र झाँके बिना नहीं रहता। इसके अलावा राष्ट्रीय सोच बहुत कुछ समकालीन राष्ट्रीय प्रश्नों से जुड़ जाता है। यहीं राष्ट्रीयता और इसके इतर काव्य को पहचानना चुनौती बन जाता है। कभी-कभी यह सरलीकरण का शिकार हो जाता है जो मूल आशय तक पहुँचने की दिक्कतें हैं।
डॉ. वाचक्नवी ने यह बेहतर आँका है कि भारतेंदु युग, राष्ट्रीय काव्यधारा युग और छायावादी युग के स्वाधीनता पूर्व के प्रत्यय अलग प्रणाली और संज्ञा में ढले थे जबकि छायावादोत्तर और उसके भी उत्तर युग में अलग प्रत्यय अलग प्रणाली में ढले हैं। अतीत के आदर्श का स्मरण एक युग की जातीयता थी जिसमें प्रकृति और जीवन की अंतश्चेतना का उद्‌घाटन किया गया था। इसके बाद देश में पसरे शोषित पीड़ितों के अधिकार और स्थिति का संज्ञान लिया गया है। इसके बाद वरण कि स्वाधीनता और भिन्न-भिन्न सूक्ष्म मार्गों की तलाश में निहित अभिव्यक्ति में राष्ट्रीयता थी और वर्तमान में अपने समय, परिवेश, मनुष्यता के बाह्यान्तर में घटित परिवर्तनों को व्यक्त करना भारतीयता माना गया। नितांत आज में जो एक तरफ से भूमण्डलीकरण का दौर कहा जाता है, राष्ट्रीयता की खोज शायद राष्ट्र की ओर से खडे़ होकर प्रतिवाद के स्वर हैं या अन्य प्रकार की निष्पत्तियाँ हैं। समयानुसार बदलते साहित्यिक प्रत्ययों और मुहावरों में जातीयता को परिभाषित करने की इस कोशिश पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
मैं डॉ. कविता वाचक्नवी को एक अनिवार्य विषय ['' कविता की जातीयता''] पर हिन्दी पाठक का ध्यान आकर्षित करने और दूर तक राष्ट्रीयता की गतिशीलता को कविता-धाराओं में पहचानने के दुस्तर कार्य को सम्पन्न करने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ। प्रवाहों के बीच एक निष्पक्ष धारणा से मूल्याँकन करने का एक कठिन काम उन्होंने किया है।

( लेखक प्रख्यात आलोचक व पूर्वग्रह के सम्पादक हैं तथा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक व नया ज्ञानोदय के संपादक रहे हैं । )

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