हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जन सूचना अधिकार का सम्मान

जनसूचना अधिकारी श्री इंद्रजीत विश्वकर्मा, कोषाध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी,इलाहाबाद व मुख्य कोषाधिकारी, इलाहाबाद। आवास-स्ट्रेची रोड, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद कार्यालय-१२ डी,कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
प्रथम अपीलीय अधिकारी श्री प्रदीप कुमार्, सचिव,हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व अपर जिलाधिकारी(नगर्), इलाहाबाद। आवास-कलेक्ट्रेट, इलाहाबाद कार्यालय-१२डी, कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
दूरभाष कार्यालय - (०५३२)- २४०७६२५
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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

काव्य संग्रह- केदार सम्मान के कवि

हिंदुस्तानी एकेडेमी की अनुपम भेंट

‘केदार शोध पीठ न्यास’ द्वारा प्रतिवर्ष समकालीन हिंदी कवियों में से ऐसे कवि को चयनित कर केदार सम्मान प्रदान किया जाता है जिन्होंने अपनी कविता से केदार नाथ अग्रवाल की जातीय काव्य परंपरा, सौंदर्य, प्रेम और संघर्ष की चेतना को आगे बढ़ाया है। वर्ष 1996 से प्रारम्भ किए गये इस पुरस्कार से अबतक चौदह समकालीन रचनाकारों को सम्मानित किया जा चुका है। हिंदुस्तानी एकेडेमी ने गुणवत्तायुक्त साहित्य के प्रकाशन की अपनी समृद्ध परंपरा का निर्वाह करते हुए इन चौदह पुरस्कृत कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन प्रकाशित किया है। इन कवियों का विवरण निम्नवत है:

वर्ष

कवि

पुरस्कृत कृति

1996

नासिर अहमद सिकंदर

जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में

1997

एकांत श्रीवास्तव

अन्न हैं शब्द मेरे

1998

कुमार अंबुज

क्रूरता और अनंतिम

1999

विनोद दास

वर्णमाला से बाहर

2000

गगन गिल

यह आकांक्षा समय नहीं

2001

हरीश चंद्र पांडे

एक बुरूँश कहीं खिलता है

2002

अनिल कुमार सिंह

पहला उपदेश

2003

हेमंत कुकरेती

चाँद पर नाव

2004

नीलेश रघुवंशी

पानी का स्वाद

2005

आशुतोश दुबे

असंभव सारांश

2006

बद्री नारायण

शब्दपदीयम्‌

2007

अनामिका

खुरदुरी हथेलियाँ

2008

दिनेश कुमार शुक्ल

ललमुनिया की दुनिया

2009

अष्टभुजा शुक्ल

दुःस्वप्न भी आते हैं

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हिंदुस्तानी एकेडेमी के सचिव श्री प्रदीप कुमार ने अपने प्रकाशकीय आलेख में इस पुस्तक की उपादेयता पर प्रकाश डाला है। (बड़ा करके पढ़ने के लिए नीचे के आलेख पर क्लिक करें)

प्रकाशकीय प्रकाशकीय-२

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(पिछला आवरण पृष्ठ- सम्पादक त्रयी के परिचय के साथ)

आशा है यह संकलन काव्य साहित्य के पारखी आलोचकों, अध्येताओं, विद्यार्थियों व सामान्य पाठकों, के लिए अत्यंत उपयोगी होगा।

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

कुमार विश्वास की लुटायी मस्ती में झूमते रहे श्रोता...

स्वर्गीय कैलाश गौतम स्मृति समारोह ...

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !!
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है !
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !!


इन पंक्तियों से काव्यजगत और कविसम्मेलनी मंचों पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाकर लोकप्रियता के नये रिकार्ड कायम करने वाले युवा कवि और गीतकार डॉ. कुमार विश्वास ने जब खचाखच भरे एकेडेमी सभागार में माइक सम्हाला तो वातावरण मिश्रित भावों से भर उठा था। एक तरफ़ स्व.कैलाश गौतम की पुण्य तिथि के अवसर पर सहज ही उतर आयी उदासी का भाव सबके मन में बैठा हुआ था तो दूसरी ओर कैलाश जी की लिखी कविताओं के अनेक उद्धरण पूर्व वक्ताओं से सुनकर सभी श्रोता उनके विलक्षण कवित्व से आह्लादित भी थे।

कुमार विश्वास ने गौतम जी को याद करते हुए कहा कि कैलाश गौतम एक सच्चे और साहसी कवि थे। समाज की विडम्बनाओं को जिस हिम्मत और ताकत से व्यक्त करते थे वैसा बिरले लोगों में ही मिलता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कैलाश जी काव्यजगत में हमेशा अण्डरएस्टिमेटेड रहे।



कैलाश गौतम स्मृति समारोह




अपनी कविताओं में उन्होंने आदमी की आम संवेदनाओं के विविध रूपों को प्रस्तुत किया। उनकी रूमानी कविताओं ने विशेषकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने अपने अनेक प्रसिद्ध मुक्तक सुनाकार खूब तालियाँ बटोरी।

1.
बहुत टूटा बहुत बिखरा थपेडे सह नही पाया
हवाऒं के इशारों पर मगर मै बह नही पाया
रहा है अनसुना और अनकहा ही प्यार का किस्सा
कभी तुम सुन नही पायी कभी मै कह नही पाया

2.
बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तन चंदन
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की है
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन

3.
तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ


4.
पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार करना क्या
जो दिल हारा हुआ हो उस पर फिर अधिकार करना क्या
मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश मे है
हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार करना क्या


5.
समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन रो नही सकता
ये आँसू प्यार का मोती है इसको खो नही सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नही पाया वो तेरा हो नही सकता


उन्होंने अपनी चुटीली व्यंग्योक्तियों से मीडिया और चैनलों पर प्रहार किया और कैलाश गौतम को याद करते हुए कहा कि कैलाश गौतम एक बड़े कवि हैं क्योंकि वे जिम्मेदारियों के बोध के कवि हैं। उन्होंने ग्लोबल विलेज की बात करते हुए कहा कि भारत में उपनिषदों में ग्लोबल विलेज की बात ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के रूप में बहुत पहले ही कही गयी है। उन्होंने अपने वक्तव्यों के माध्यम से समाज में फैली विसंगतियों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने देशभक्ति के जज्बे को प्रदर्शित करते हुए गीत पढ़ा-

शौहरत न अता करना मौला, दौलत न अता करना मौला।
बस इतना अता कना चाहें, जन्नत न अता करना मौला।।
शम्ए वतन की लौ पर, जब कुर्बान पतंगा हो।
होठो पर गंगा हो हाथों पर तिरंगा हो।


उन्होंने अपनी लम्बी कविता ‘पगली लड़की’ के कुछ अंश भी सुनाए जो बहुत सराहे गये।

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग होते हैं,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।



मन्त्रमुग्ध श्रोता





इससे पहले कार्यक्रम का शुभारम्भ माता सरस्वती एवं स्व० श्री कैलाश गौतम जी के चित्रों पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ श्री रामकेवल जी, श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, डॉ० शिव गोपाल मिश्र, डॉ० कुमार विश्वास ने किया। इस अवसर पर सुधांशु उपाध्याय, प्रदीप कुमार, यश मालवीय एवं कैलाश गौतम जी के मित्र एवं सहयोगियों ने कैलाश गौतम जी के चित्र पर पुष्प अर्पित करके भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

एकेडेमी के सचिव राम केवल जी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि स्व० कैलाश गौतम जी की स्मृति में आयोजित यह कार्यक्रम एक बहुत ही छोटा सा प्रयास है जिसके माध्यम से गौतम जी को स्मरण किया जा रहा है। एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने शाल भेंट कर आमंत्रित कवि डा० कुमार विश्वास का स्वागत किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिलाधिकारी श्री संजय प्रसाद (आई०ए०एस०) ने कहा कि स्व० श्री कैलाश गौतम जी को मंच के माध्यम से मैं श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। हमारे समाज में जो साम्प्रदायिक जहर है उनके प्रति कवि की संवेदना मात्र रचना नहीं है। कवि की वाणी में लेखनी में हर वर्ग के लिए कोई सन्देश होता है। रचनाएं शक्ति प्रदान करती है। आदमी दुविधा में हो तो वह सही मार्ग प्रदर्शित करती है। इस शहर ने बड़े नामचीन कवियों, साहित्यकारों को जन्म दिया है। यहां के चप्पे-चप्पे में इतिहास है। सही मायने में गौतम जी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब उनके बताये मार्ग पर चलने का प्रयास करें। हर नागरिक की एक जिम्मेदारी होती है, उसे निभाये तो सपनों के भारत को साकार कर सकता है।


इस अवसर पर शहर के प्रतिष्ठत और लोकप्रिय गीतकार यश मालवीय ने स्व० कैलाश गौतम को याद करते हुए कहा कि मैं कैलाश गौतम जी के जाने के पश्चात उनको लिखी हुई एक चिट्ठी सुनाता हूं। इस चिट्ठी में मालवीय जी ने कैलाश गौतम की स्मृतियों को मार्मिक ढंग से याद करते हुए कहा कि "तुम गंगा के देवव्रत थे, तुम यमुना के बंधु जैसे थे, तुममें संस्कृतियों का संगम लहराता था। तुम झूंसी से अरैल, अरैल से किले तक शरद की धूप और चांदनी आत्मा में उतरने देते थे, कहते थे- "याद तुम्हारी मेरे संग वैसे ही रहती है, जैसे कोई नदी किले से सटके बहती है।" साथ ही यश मालवीय जी ने गौतम जी की स्मृति में एक कविता भी प्रस्तुत की।


माध्यमिक शिक्षा परिषद के अपर सचिव श्री प्रदीप कुमार जी ने कहा कि मैं गाजीपुर में था जब समाचार पत्रों में पढ़ा कि कैलाश गौतम जी नहीं रहे। सुनते ही उनकी कविता अमौसा का मेला आंखों के सामने आ गयी ऐसा लगा मानो अमौसा के मेले में सब खो गया। कैलाश गौतम देह से शहर में रहे पर मन गांव में था। कैलाश गौतम के काव्य में ग्रामीण जीवन की विसंगतियां आंखों के समक्ष आ जाती थीं वह निश्चित रूप से अतुलनीय थे।


श्लेष गौतम ने अपने पिता श्री कैलाश गौतम को गीतात्मक शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित की।

उनके गीत के बोल थे -
सूरज डूबा चांद छिपा, तारे भी टूट गये।
नेह का बन्धन बना रहा पर देह के छूट गये

उनके दूसरे गीत के बोल थे
हुआ न कोई न होई होगा पिता तुम्हारे बाद,
पल पल तुमको याद कर रहा आज इलाहाबाद।।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ० शिवगोपाल मिश्र ने कहा कि मैं कैलाश गौतम को बहुत पहले से जानता हूं। मैं उनकी ग्रामीण पृष्ठभूमि की कविताओं को पसन्द करता हूं। जो कवि जनता के बीच से आयेगा उसे शासन-प्रशासन से डर नहीं लगेगा। हमारे नये कवि कई विधाओं में काम कर रहे हैं। आज सभागार की भीड़ को देखकर प्रसन्नता हो रही कि लोग कवि गोष्ठियों में शामिल हो रहे हैं और नये लोगों को सम्मानित कर रहे हैं।


कार्यक्रम का संचालन इमरान प्रतापगढ़ी ने कैलाश गौतम से जुड़ी भावविभोर कर देने वाली यादों को स्मरण करते हुए किया। वह बीच-बीच में कैलाश गौतम से जुड़े संस्मरणों से गौतम जी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए एक कविता प्रस्तुत की-

सूनी सूनी दीवारे सूना सूना ये घर है,
है उदास तारीखें और चुप कलेण्डर है।
मैंने खुद से जब पूंछा क्यों उदास मंजर है
तो दिल ये चीख कर बोला, आज नौ दिसम्बर है।

कार्यक्रम के अन्त में एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

कवि गोष्ठी सम्पन्न

इलाहाबाद ३ अगस्त, २००९। हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद के तत्वावधान में आज राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की जयन्ती को कवि-दिवस के रूप में मनाया गया। इस उपलक्ष्य में हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सभागार में एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया। Image000 गोष्ठी का शुभारम्भ एकेडेमी के सचिव डा० एस०के० पाण्डेय जी ने अपने स्वागत भाषण से किया। इस काव्य-गोष्ठी की अध्यक्षता श्री बुद्धिसेन शर्मा जी ने एवं संचालन श्री सुधांशु उपाध्याय जी ने किया। काव्य-गोष्ठी में श्री श्लेष गौतम, श्रीमती लक्ष्मी मिश्रा, श्री राजेश वर्मा, श्री गिरिजेश श्रीवास्तव ‘बन्धु’, श्री अमिताभ त्रिपाठी, श्री शैलेन्द्र श्रीवास्तव ‘मधुर’, श्री विवेक सत्यांशु, श्री जयप्रकाश शर्मा ‘प्रकाश’, डा० विजयानन्द, श्री अमरनाथ श्रीवास्तव, श्री यश मालवीय, ख्वाजा जावेद अख्तर, श्री हरिशंकर द्विवेदी एवं कु० मीनूरानी दुबे ने अपने काव्यपाठ से श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध किया। कार्यक्रम के अन्त में एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ने धन्यवाद ज्ञापित करके कार्यक्रम का समापन किया।

 

(डॉ०एस०के०पाण्डेय)
सचिव,
हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

शनिवार, 1 अगस्त 2009

राष्ट्रकवि की जयन्ती पर कवि सम्मेलन: हिन्दुस्तानी एकेडेमी में

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयन्ती पर सोमवार दिनांक ३ अगस्त, २००९ को अपराह्न ४:३० बजे एकेडेमी सभागार में कवि-गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। काव्य-गोष्ठी में सभी सादर आमंत्रित हैं।

 

 

(डॉ० एस०के० पाण्डेय) सचिव,

हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

बुधवार, 3 जून 2009

पुस्तक चर्चा: कविता की जातीयता

कविता की जातीयता / डॉ. कविता वाचक्नवी / हिन्दुस्तानी एकेडेमी , १२ डी , कमला नेहरु मार्ग , इलाहाबाद - २११ ००१ / २००९ / २२५ रुपये / पृष्ठ
३६६[सजिल्द].


हिन्दुस्तानी एकेडेमी के ताजा प्रकाशन के रूप में आयी इस पुस्तक का प्राक्कथन डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय जी ने लिखा है। यहाँ उसे अविकल प्रस्तुत किया जा रहा है;

मुखपृष्ठ कविता की जातीयता

 

 

'जातीय' यहाँ 'राष्ट्रीय' का पर्याय है, परंतु यह राष्ट्र ‘नेशन’ नहीं है। जातीय या राष्ट्रीय का गहरा सांस्कृतिक अर्थ है, जो भौगोलिक या राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है। इस ग्रन्थ की लेखिका डॉ. कविता वाचक्नवी ने राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लिखा है- "जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं, उसके तत्त्वों का अन्वेषण भारतीय जातीयता की व्याख्या करने में समर्थ होगा। " डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राष्ट्र के तीन घटक माने हैं- भूमि, जन और संस्कृति। इनमें से किसी एक की भी अनुपस्थिति में राष्ट्र की कल्पना संभव नहीं है। भारतीय राष्ट्र में ‘भूमि’ के अंतर्गत, वर्तमान राजनीतिक और भौगोलिक सीमा से बाहर ऐसे भूखण्डों का समावेश भी किया जाता है जो परंपरा से उसके अंग रहे हैं और उसके सांस्कृतिक परिसर में आते हैं, परंतु बाद के दौर में किन्हीं राजनीतिक-भौगोलिक या अन्य कारणों से अलग जा पडे़ हैं। यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि बृहत्तर भारत की अवधारणा उन भागों का अधिग्रहण करने की आकांक्षा नहीं है। [न दूर दूर तक इसकी कल्पना है] क्योंकि वृहत्तर अर्थ में ‘राष्ट्रीयता’ अधिकार का कोई दावा नहीं, वह सांस्कृतिक जुडा़वों की एक अमूर्त संहिति है।
संस्कृति हमारे लिए दार्शनिक, आध्यात्मिक, नैतिक, कलात्मक और प्रवृत्तिगत संसार की अनुगूँज है। वह मूलतः मनुष्य से, प्रकृति से, धर्म से, मूल्य से, आत्मा से, समाज से, विश्व से हमारे संबंधों की प्रकृति सूचित करती है। [इस सूची को बढा़या जा सकता है] अर्थात हमारे अन्तर्सम्बन्धात्मक -बोध और मूल्य-संकल्पना का स्वभाव या प्रकृति क्या है! इसे पहचान कर हम देशों, संस्कृतियों या राष्ट्रों को समझ सकते हैं।
उदाहरण के लिए पश्चिम प्रकृति से मनुष्य के संबंध द्वन्द्वात्मक मानता है। वह प्रकृति पर विजय पाने का लक्ष्य रखता है, जबकि भारत प्रकृति को चिति का स्वरूप मानते हुए प्रणत होता है। धर्म को वह किसी एक समुदाय या पूजा विधि में केन्द्रित न मानते हुए उसकी बहुलता को मान्यता देता है। वह धर्म का अर्थ अभ्युदय और कल्याण की प्राप्ति मानता है। मनुष्य और समाज के बीच द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों को मान्यता न देते हुए वह समूह या समाज से व्यक्ति की लयात्मकता को मान देता है। विश्व से उसके संबंध में आत्मविजय का भाव न होकर ग्रहण और सामंजस्य का भाव है। उसकी चाहत है-‘आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः -’संसार का जो भी श्रेष्ठ है, भद्र है उसे मैं अपना बना लूँ। यह ग्रहण है अधिग्रहण नहीं; जिसके कारण देव जाति नष्ट हो गई थी। जयशंकर प्रसाद ने लिखा है कि देवताओं को सब कुछ स्वायत्त था- ‘बल, वैभव, आनंद अपार’, परंतु परिणाम क्या हुआ? समूल विनाश। सब कुछ को स्वायत्त करने में नहीं, सब कुछ के श्रेष्ठ ग्रहण में ही कल्याण निहित है। आत्मा से भी भारतीय मनुष्य का संबंध अहम् भाव का अनुभव नहीं है, सर्वात्मवाद को वह अपनी शिराओं में पाता है - सबका विकास, सबका उन्नयन, सबका आनन्द भारतीय स्वभाव की मूल संस्कृति है।
भारत के भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक चरित्र में सामासिकता है, जिसके केन्द्र में है सहिष्णुता, जिसे नरेश मेहता, ‘वैष्णवता’ कहते हैं | वैष्णवता का मूल करुणा है। गाँधी की प्रार्थना में था ‘वैष्णवजन तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाणे रे’। वैष्णवी भारत एक सहिष्णु, संवेदनशील, सामासिक भारत है, संगम जिसका स्वभाव है। विश्वभर में क्या कहीं ‘संगम’ को पावन मान कर पूजा जाता है? संगम भारत की सामासिकता की बोध-भूमि है। संस्कृति प्रकारांतर से हमारी सर्जनात्मक चेतना है जिसमें सौन्दर्य, गतिशीलता, उर्वरता, संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता है। वह भारत के लिए जड़ प्रत्यय नहीं है और जिनके लिए है वे शायद भारत और भारतीय संस्कृति की आत्मा से परिचित नहीं हैं। भारत की संस्कृति का निर्माण, नीति के उपदेशों या धर्म ग्रंथों से नहीं, काव्य ग्रन्थों से हुआ है। रामायण महाभारत तो सांस्कृतिक अवबोधन के काव्य हैं ही, वेद भी एक अर्थ में महान काव्य है। इसलिए भारतीयता का संधान भारतीय काव्य में करना एक सार्थक कार्य है।
डॉ. कविता वाचक्नवी ने अपने पर्यालोचन के लिए जातीयता की संकल्पना की दृष्टि से आधुनिक हिन्दी कविता को चुना है। बीसवीं शती के प्रारम्भ से लगभग ९वें दशक तक के कवियों को इसमें सम्मिलित किया गया है। यह समयावधि निरंतर लंबी हुई है क्योंकि समय की गति निरंतर तीव्र होती गई है और इसी गति से कविता भी बढ़ी है। भारतेंदु से लेकर उदय प्रकाश तक के काव्य-समय ने कितने परिवर्तन देखे हैं। इसलिए कदाचित भारतीयता की अभिव्यक्ति को किसी एक ढांचे में ढालना संभव नहीं हुआ है। भारतेंदु के समय में भारतीयता किस सामयिकता और सांस्कृतिक अवधारणा में व्यक्त हुई है, फिर मैथिलीशरण गुप्त और अन्य राष्ट्रीय भावधारा के कवियों में भारतीयता का क्या स्वरूप रहा है? छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, नई कविता और उत्तरकाव्य में भारतीयता किस रूप में उपस्थित है? यह सब देखना सरल काम नहीं है। इसके विवेचन में सर्वसमावेशिता का आग्रह प्रायः रहा है। आशय यह कि ऐसी समस्त बातें यदि हम भारतीयता के भीतर समाहित करते चले जाएँ जो युगानुरूप रचनाओं की विषय-वस्तु रही हैं तो स्वयं राष्ट्रीयता या भारतीयता के अपरिभाषेय होने का संकट बना रहता है। तब यह जानना दूभर हो जाता है कि हमारा आशय राष्ट्रीयता या जातीयता से क्या है और वह कौन-सा काव्य है जिसे हम इसके बाहर रखते हैं? कविता जी को इस समस्या का सामना करना पडा़ है। संभवतः इसीलिए उन्होंने भारतीयता का केनवास काफी विशाल रखा है।
आधुनिक युग की एक दूसरी समस्या यह है कि हम जैसे-जैसे आधुनिकता से उत्तर आधुनिकता और पराआधुनिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं, हमारे संबंध अपनी जातीय विरासत से खिसकते चले जा रहे हैं। ऐसे में यह अपरिहार्य लगता है कि हम नए सिरे से एक ओर तो विरासत की व्याख्या करें और दूसरी ओर अपने व्यवहार की समीक्षा भी करें। क्या कारण है कि नई पीढी़ अपनी विरासत से तो परायापन अनुभव करे जबकि पश्चिम से आती विचारधाराओं या विचारों को अपनाते हुए उसे ही आधुनिकता का पर्याय मानने लगे। यानी दूसरों की विरासत तो नई और अपनी विरासत पुरानी। इस अंतर्विरोध की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए। शायद इनके बीच से ही आधुनिकता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है और साहित्य और जातीयता के गतिशील संबंधों की सर्जनात्मकता पहचानी जा सकती है तथा समय की आँधियों में बह जाने वाले समूह से अलग साहित्य का एक नया रचनात्मक पाठ बनाने की पहल की जा सकती है।
डॉ. वाचक्नवी के इस ग्रन्थ की विशेषता यह भी है कि उन्होंने साहित्य और जातीयता के पारंपरिक संबंधों को पहचानते हुए भी इस संबंध को गतिशीलता दी, उनका यह काम किसी हद तक नवीनतम जीन्स प्रौद्योगिकी के अनुरूप ही है जो जीन्स और डीएनए में वंश, जाति, देश आदि के तत्वों की उपस्थिति सिद्ध कर चुकी है। इसी प्रक्रिया में वह विकास की पुष्टि करती है। यह ध्यातव्य है कि संसार में सब कुछ चलित है, यदि आधुनिकता की अवधारणा गतिशील है तो जातीयता की अवधारणा भी गतिशील है। इसी पारस्परिक गतिशीलता में जातीयता और आधुनिकता की प्रीतिकर सन्निधि पहचानने की कोशिश ही इस ग्रंथ का प्रयोजन भी है और चुनौती भी।
जैसे भाव की चिरंतन उपस्थिति होने पर भी भावात्मक संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं, वैसे ही राष्ट्रीयता की चेतना बनी रहने के बाद भी समयानुसार राष्ट्र से रचनाकार के संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं। इसका मोटा उदाहरण यह है कि स्वाधीनता-संग्राम के दौर में कवियों के लिए राष्ट्रीयता या भारतीयता से संबंध का अर्थ अलग था। उस समय व्यक्त राष्ट्रीयता मूर्त और सोद्देश्य थी, जबकि आज़ादी के बाद राष्ट्र से जनता की तरह कवि के संबंध भी बदल गए। इसलिए इस दौर में काव्य में राष्ट्रीयता की पहचान अलग ढंग से हो सकती है। यहाँ आकर राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों को वह अपने केंद्र में रखती है। इस युग में राष्ट्रीयता की साहित्य में पहचान कठिन हुई है जो बाद के काल में निरंतर कठिनतर और कठिनतम होती चली गई है, इस हद तक कि लगने लगता है कि इन कवियों में राष्ट्रीयता या जातीयता की खोज एक दकियानूसी सोच है। परन्तु कविता के विन्यास के ऐसे अनेक पक्ष होते हैं, जैसे भाषा, प्रतीक, बिम्ब, रूपक आदि, जिनमें राष्ट्र झाँके बिना नहीं रहता। इसके अलावा राष्ट्रीय सोच बहुत कुछ समकालीन राष्ट्रीय प्रश्नों से जुड़ जाता है। यहीं राष्ट्रीयता और इसके इतर काव्य को पहचानना चुनौती बन जाता है। कभी-कभी यह सरलीकरण का शिकार हो जाता है जो मूल आशय तक पहुँचने की दिक्कतें हैं।
डॉ. वाचक्नवी ने यह बेहतर आँका है कि भारतेंदु युग, राष्ट्रीय काव्यधारा युग और छायावादी युग के स्वाधीनता पूर्व के प्रत्यय अलग प्रणाली और संज्ञा में ढले थे जबकि छायावादोत्तर और उसके भी उत्तर युग में अलग प्रत्यय अलग प्रणाली में ढले हैं। अतीत के आदर्श का स्मरण एक युग की जातीयता थी जिसमें प्रकृति और जीवन की अंतश्चेतना का उद्‌घाटन किया गया था। इसके बाद देश में पसरे शोषित पीड़ितों के अधिकार और स्थिति का संज्ञान लिया गया है। इसके बाद वरण कि स्वाधीनता और भिन्न-भिन्न सूक्ष्म मार्गों की तलाश में निहित अभिव्यक्ति में राष्ट्रीयता थी और वर्तमान में अपने समय, परिवेश, मनुष्यता के बाह्यान्तर में घटित परिवर्तनों को व्यक्त करना भारतीयता माना गया। नितांत आज में जो एक तरफ से भूमण्डलीकरण का दौर कहा जाता है, राष्ट्रीयता की खोज शायद राष्ट्र की ओर से खडे़ होकर प्रतिवाद के स्वर हैं या अन्य प्रकार की निष्पत्तियाँ हैं। समयानुसार बदलते साहित्यिक प्रत्ययों और मुहावरों में जातीयता को परिभाषित करने की इस कोशिश पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
मैं डॉ. कविता वाचक्नवी को एक अनिवार्य विषय ['' कविता की जातीयता''] पर हिन्दी पाठक का ध्यान आकर्षित करने और दूर तक राष्ट्रीयता की गतिशीलता को कविता-धाराओं में पहचानने के दुस्तर कार्य को सम्पन्न करने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ। प्रवाहों के बीच एक निष्पक्ष धारणा से मूल्याँकन करने का एक कठिन काम उन्होंने किया है।

( लेखक प्रख्यात आलोचक व पूर्वग्रह के सम्पादक हैं तथा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक व नया ज्ञानोदय के संपादक रहे हैं । )

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