हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जन सूचना अधिकार का सम्मान

जनसूचना अधिकारी श्री इंद्रजीत विश्वकर्मा, कोषाध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी,इलाहाबाद व मुख्य कोषाधिकारी, इलाहाबाद। आवास-स्ट्रेची रोड, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद कार्यालय-१२ डी,कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
प्रथम अपीलीय अधिकारी श्री प्रदीप कुमार्, सचिव,हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व अपर जिलाधिकारी(नगर्), इलाहाबाद। आवास-कलेक्ट्रेट, इलाहाबाद कार्यालय-१२डी, कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
दूरभाष कार्यालय - (०५३२)- २४०७६२५
लोकार्पण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लोकार्पण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

पुस्तक-चर्चा एवं लोकार्पण समारोह

पुस्तक-चर्चा एवं लोकार्पण समारोह
२८ अप्रैल २०१०
अपराह्‌न ५ बजे

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान में २८ अप्रैल २०१० दिन बुधवार अपराह्‌न 5:00 बजे एकेडेमी के सभागार में पुस्तक-लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया है। जिसमें एकेडेमी की सद्यः प्रकाशित पुस्तकें चिद्‌यात्रा (कविता संकलन) - शीतला प्रसाद श्रीवास्तव, जगदीश गुप्त : व्यक्ति और काव्य- डॉ० प्रकाश त्रिपाठी, रहीम की काव्य-भाषा - डॉ० प्रकाश त्रिपाठी, हिन्दी व्यंग्य और शरद जोशी - डॉ० कमलेश सिंह की पुस्तक का लोकार्पण किया जायेगा।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा होंगे। विशिष्ट अतिथि डॉ० दिनेश कुमार शुक्ल होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध आलोचक दूधनाथ सिंह एवं मण्डलायुक्त, इलाहाबाद डॉ० पी०वी० जगनमोहन करेंगे। पुस्तकों पर चर्चा डॉ० मुश्ताक अली करेंगे।

आप सभी सादर आमंत्रित हैं।

(राम केवल)
सचिव,
हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद एवं
अपर जिलाधिकारी (वि०/रा०)
इलाहाबाद


शनिवार, 26 सितंबर 2009

हिन्दी चिठ्ठों की किताब के लिए अपनी चुनिन्दा पोस्ट भेंजिए...।

हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में अनेक प्रतिष्ठित लेखक और साहित्यकार अपनी रचनाएं अन्तर्जाल पर प्रकाशित कर रहे हैं लेकिन उससे कहीं बड़ी संख्या ऐसे ब्लॉगलेखकों की है जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता के नैसर्गिक प्रवाह को यूँ ही निसृत होने दिया है। अपनी मस्ती में डूबे हुए ये अनूठे चिठेरे इस चक्कर में ही नहीं पड़ते कि उनका लिखा हुआ साहित्य की कोटि में रखा जाता है कि नहीं। बहुत से ब्लॉग लेखक ऐसे भी हैं जो अपनी पोस्टों के माध्यम से समाज, संस्कृति, राजनीति, घर-परिवार, विज्ञान, इतिहास, भूगोल आदि के विषयों पर ज्ञान का असीमित भण्डार उड़ेल रहे हैं। यह सब कुछ हिन्दी ब्लॉग समुच्चय को एक क्लाइडोस्कोप का रुप गुण देता है।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी की स्थापना हिन्दुस्तानी (हिन्दी और उर्दू) भाषा को विकास की सीढ़ियों पर ले जाने वाले सभी सार्थक प्रयासों को एक ऐसा मंच देने के उद्देश्य से हुई थी जहाँ मौलिक प्रतिभाओं को अपनी रचनाधर्मिता को प्रकाशित कराने का अवसर मिले और विद्वानों-मनीषियों के शोधपरक कार्यों को सामान्य विद्यार्थियों, अध्येताओं और साहित्यानुरागियों के उपयोग हेतु सहज ढंग से उपलब्ध कराया जा सके। इन उद्देश्यों की पुर्ति के लिए एकेडेमी द्वारा करीब डेढ़ सौ अमूल्य पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है और साहित्यिक गोष्ठियों, व्याख्यान मालाओं, सेमिनार और प्रतिभा सम्मान समारोहों का आयोजन अनवरत किया जाता रहा है।

अपनी इसी उत्कृष्ट परम्परा के निर्वहन के क्रम में हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के सौजन्य से हिन्दी ब्लॉगिंग के सम्बन्ध में एक राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार का आयोजन आगामी २३-२४ अक्टूबर, २००९ को किया जा रहा है। इस अवसर पर देश भर से अनेक चिठ्ठाकारों को आमन्त्रित कर अभिव्यक्ति के इस नये माध्यम के इतिहास, स्वरूप और प्रमुख प्रवृत्तियों पर दो दिवसीय चर्चा की जाएगी। इस अवसर पर पारम्परिक साहित्य जगत के अनेक प्रतिष्ठित विद्वान भी प्रतिभागी होंगे।
image

इस अवसर पर एकेडेमी द्वारा एक पुस्तक का प्रकाशन कर उसके तत्समय लोकार्पण का निर्णय भी लिया गया है जिसमें लगभग पचास चिठ्ठाकारों की चुनी हुई एक-एक ब्लॉग पोस्टों को सम्मिलित कर एक प्रतिनिधि संकलन तैयार किया जाएगा। इसके लिए हिन्दी ब्लॉगर्स से प्रविष्टियाँ आमन्त्रित की जाती हैं। एक ब्लॉगर से केवल एक प्रविष्टि ही स्वीकार की जाएगी। हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा गठित सम्पादक मण्डल प्रविष्टियों के चयन पर विचार करेगा जिसकी संस्तुतियों के आधार पर पुस्तक का अन्तिम रूप निर्धारित किया जाएगा। एकेडेमी के ई-मेल पते (hindustaniacademy@gmail.com) पर अपनी प्रविष्टियाँ दिनांक ५.१०.२००९ की मध्यरात्रि तक अवश्य प्रेषित कर दें।

चिठ्ठाकार मित्रों द्वारा पुस्तक के शीर्षक व आवरण पृष्ठ के सम्बन्ध में यदि कोई सुझाव दिया जाता है तो उसका भी स्वागत है। यह पुस्तक हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से प्रिन्ट माध्यम के लिए एक अनुपम भेंट हो, यही हमारी आकांक्षा है।

सचिव - हिन्दुस्तानी एकेडेमी

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

अभिनन्दन, विमोचन के बहाने गुरु-महिमा पर चर्चा...

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्त्वावधान में गत शनिवार को एकेडेमी सभागार में संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रख्यात विद्वान, शिक्षक एवं राष्ट्रपति सम्मान से सुशोभित प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे का अभिनन्दन समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व कुलपति व प्रतिष्ठित मनीषी प्रो०गोविन्द चन्द्र पान्डेय ने की। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व कुलपति प्रो० के०बी० पाण्डेय समारोह के मुख्य अतिथि रहे।  दीप प्रज्ज्वालन के बाद डॉ. दिवाकर दीक्षित एवं उनके शिष्यों ने वैदिक मंगलाचरण से कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। लौकिक मंगलाचरण सुश्री स्मृति शुक्ला ने प्रस्तुत किया जो बहुत सराहा गया।। सचिव डॉ एस०के० पाण्डेय ने अतिथियों का स्वागत करते हुए अपने गुरू प्रो.सुरेश चन्द्र पाण्डेय जी की महनीय कर्तव्यपरायणता और सच्चे गुरूत्व की चर्चा की तथा लिखित अभिनन्दन पत्र का वाचन कर प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे को सम्मान स्वरूप अंगवस्त्र, नारियल तथा देवी सरस्वती की प्रतिमा के साथ समर्पित किया। इस अवसर पर प्रो०हरिदत्त शर्मा, प्रो०मृदुला त्रिपाठी, डॉ. गिरिजा शंकर शास्त्री, डॉ. राम मुनि पाण्डेय, श्री राजा राम उपाध्याय, डॉ मृदुला जायसवाल आदि ने प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे का वाचिक अभिनन्दन करते हुए अपने उद्‌गार व्यक्त किये।



इस समारोह में एकेडेमी से प्रकाशित निम्न चार पुस्तकों का लोकार्पण किया गया।



1. साहित्य-शेवधि’ (प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे अभिनन्दन ग्रन्थ) प्रधान सम्पादक - डॉ एस०के०पाण्डेय, मूल्य:३००/- पृष्ठ: ४३४

साहित्य-शेवधि 

 

2. राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश’ – डॉ. उमेश कुमार मिश्र मूल्य:११०/- पृष्ठ: १५२ राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश

 

3. चन्द्रालोक परिशीलन - डॉ स्मिता अग्रवाल मूल्य:२५०/- पृष्ठ: ३४०

चन्द्रालोक परिशीलन

 

4. नलविलास परिशीलन - डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी मूल्य:२२५/- पृष्ठ: २४४
नल-विलास परिशीलन

 

साहित्य शेवधि नामक अभिनन्दन ग्रन्थ में वस्तुतः प्रो. पाण्डेय के व्यक्तित्व के बारे में बहुत कम आलेख लिखे गये हैं (स्वयं गुरू जी ने अपने शिष्यों को मना कर दिया था।) इसमें संस्कृत और हिन्दी भाषा व साहित्य से जुड़े अनेक विद्वानों द्वारा विविध वि्षयों पर लिखित उत्कृष्ट कोटि के लगभग अस्सी लेख संकलित किये गये हैं। इन लेखकों में तीस प्रोफ़ेसर हैं और उन्चास शोध-उपाधि से सम्पन्न लेक्चरर और रीडर हैं। अनेक लेखक विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपति व विभागाध्यक्ष जैसे उच्च पदों पर आसीन हैं, या रहे हैं। गुरु-महिमा को रेखांकित करने वाला यह ग्रन्थ निश्चित रूप से पुस्तक प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अमूल्य धरोहर है।



‘राजतरंगिणी और कश्मीर नरेश’ नामक पुस्तक में डॉ. उमेश कुमार मिश्र ने इस मध्ययुगीन गौरव ग्रन्थ मे उल्लिखित कश्मीर के कतिपय प्रसिद्ध राजाओं तथा मन्त्रियों का चरित्र बहुत रोचक शैली में प्रस्तुत किया है।



चन्द्रालोक परिशीलन में विद्वान लेखिका डॉ.स्मिता अग्रवाल ने अनुष्टुप छन्द में काव्यशास्त्रीय सिद्धान्त पर लिखे गये ग्रन्थ ‘चन्द्रालोक’ का परिशीलन किया है। इसमें कुल दस ‘मयूख’ हैं। इस लक्षण ग्रन्थ का साहित्य शास्त्रीय मूल्यांकन शोधार्थियों और उच्चस्तरीय अध्येताओं के लिए दिग्दर्शक का कार्य करेगा।



नलविलास-परिशीलन में डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी ने नल-दमयन्ती कथा के उद्भव को रेखांकित करते हुए इस कथानक पर आधारित ४१ ग्रन्थों का परिचय देते हुए इसमें से कुछ ग्रन्थों पर नाट्यशास्त्रीय विकास की दृष्टि से प्रकाश डाला है। ग्रन्थकार ने नाट्यदर्पण के प्रणेता जैनाचार्य श्री रामचन्द्र सूरि के विस्तृत परिचय के साथ उनके ग्रन्थ नलविलास नाटक पर विशेष ध्यान आकृष्ट किया है।



उपर्युक्त पुस्तकों के लोकार्पण के बाद गुरुवर्य के सम्मान में उनके अनेक शिष्यों ने अभिनन्दन करते हुए उनके प्रति श्रद्धा और आभार का भाव व्यक्त किया। सभा की अध्यक्षता करते हुए प्रो०गोविन्द चन्द्र पाण्डेय ने कहा कि प्रो०सुरेश चन्द्र पाण्डे बहुत स्पष्टवादी तथा सरल बात कहने वाले हैं। मैं समझता हूँ कि सही मनुष्य को पहचानने के लिए सबसे सरल तरीका है उसकी जीवन शैली को जानना। एक उत्कृष्ट व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है कि उसकी बातें  खरी, तथा सीधी-सरल होनी चाहिए तथा आचार विचार सरल होना चाहिए। पाण्डे जी में ये दोनो बातें हैं इसलिए मेरे मन में उनके लिए बहुत आदर है।



मुख्य अतिथि प्रो०के०बी० पाण्डेय जी ने सभा को सम्बोधित करते हुए गुरू की तुलना माता से करते हुए कहा कि "माता को एक सत्पुत्र को जन्म देने और सत्पुरुष बनाने में कितना कष्ट होता है। प्रो०पाण्डे तो सैकड़ों सत्पुत्रों के सारस्वत जन्मदाता हैं और उनको सत्पुरुष बनाने में कितना कष्ट हुआ होगा इसका सहज अनुमान किया जा सकता है। अत: प्रो०पाण्डे तो अभिनन्दनीय हैं ही। मुख्य अतिथि ने बताया कि प्रो०पाण्डे पर गीता का श्लोक ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां’ को अक्षरश: चरितार्थ है।



कार्यक्रम का संचालन डॉ आनन्द कुमार श्रीवास्तव ने किया तथा कार्यक्रम के अन्त में एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने उपस्थित विद्वानों, अतिथियों, दर्शकों, श्रोताओ, और मीडिया के लोगों को एकेडेमी की ओर से धन्यवाद ज्ञापित किया।



(प्रस्तुति: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रविवार, 16 अगस्त 2009

हिन्दी ब्लॉगजगत का एक झरोखा: सत्यार्थमित्र... (पुस्तक चर्चा)



प्रकाशकीय

अंग्रेजी शब्द ‘ब्लॉग’ वेब-लॉग का संक्षिप्त रूप है जो अमेरिका में १९९७ ई. के दौरान अन्तर्जाल (इण्टरनेट) पर प्रचलन में आया। प्रारम्भ में कुछ ऑनलाइन पत्रिकाओं के ‘लॉग’ प्रकाशित किये जाते थे, जिनमें वेबसाइट के विभिन्न हिस्सों में प्रकाशित विविध सामग्रियों के लिंक दिये गये होते थे तथा साथ में इनके लेखकों की संक्षिप्त टिप्पणियाँ होती थीं। कालान्तर में इन्हें ही ‘ब्लॉग’ कहा जाने लगा और इनके लेखक ‘ब्लॉगर’ कहलाए।

ब्लॉग को विश्व के आम लोगों में भारी लोकप्रियता उस समय मिली जब अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के दौरान एक अमेरिकी सैनिक ने अपने युद्ध सम्बन्धी अनुभव को ब्लॉग के माध्यम से दैनिक आधार पर प्रकाशित करना प्रारम्भ किया। उस समय एण्ड्र्यू सुलीवान के ब्लॉग पृष्ठ को आठ लाख से अधिक लोगों ने खोला व पढ़ा। पाठकों की इतनी बड़ी संख्या प्रिन्ट माध्यम के अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशनों से आगे निकल गयी थी। देखते ही देखते १९९७-९८ के महज दर्जन भर ब्लॉगों से प्रारम्भ होने वाला सहज अभिव्यक्ति का यह नया माध्यम केवल चार वर्षों में दस लाख का आँकड़ा पार कर गया।

शीघ्र ही विश्व की प्रत्येक भाषा में सभी कल्पनीय विषयों और अकल्पनीय मुद्दों पर भी ब्लॉग लिखे जाने लगे। हिन्दी भाषा का प्रथम ब्लॉग नौ दो ग्यारह (९-२-११) प्रारम्भ करने का श्रेय बंगलुरू निवासी आलोक कुमार को जाता है, जिन्होंने पहली बार ब्लॉग को ‘चिठ्ठा’ नाम दिया और इस प्रकार वे ‘आदि-चिठ्ठाकार’ कहलाए। इस चिठ्ठे में उन्होंने कम्प्यूटर जगत के तकनीकी और अपने अन्य व्यक्तिगत अनुभवों को नियमित रूप से प्रकाशित किया। इलाहाबाद की छात्रा रह चुकी डॉ. पूर्णिमा बर्मन द्वारा हिन्दी में संचालित साप्ताहिक अन्तर्जाल पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ में रवि प्रकाश श्रीवास्तव (रवि रतलामी) ने एक आलेख प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था- अभिव्यक्ति का नया माध्यम: ब्लॉग। इस प्रकार के प्रयासों से हिन्दी ब्लॉग लेखन के कार्य में शनैः शनैः प्रगति होने लगी। प्रारम्भिक चिठ्ठाकारों में रवि रतलामी, देबाशीष, जीतेन्द्र चौधरी, अतुल अरोरा, अनूप शुक्ल, पंकज नरूला इत्यादि प्रमुख रहे।

अप्रैल २००३ में प्रारम्भ होने के बाद हिन्दी भाषा के चिठ्ठों की संख्या में वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। करीब छः साल बाद भी अभी कुल हिन्दी चिठ्ठों की संख्या दस हजार के आसपास ही है। इनमें भी नियमित रूप से सक्रिय रहने वाले हिन्दी चिठ्ठे ढाई हजार के आसपास ही हैं। वर्तमान में यह माध्यम तेजी से बढ़ रहा है। प्रतिदिन औसतन पच्चीस-तीस नये ब्लॉग हिन्दी ब्लॉग जगत से जुड़ रहे हैं। ब्लॉगर और वर्डप्रेस जैसे जालघर मुफ़्त में ब्लॉग लिखने और प्रकाशित करने की सुविधा देते हैं। ब्लॉग लेखक को कम्प्यूटर तकनीक का भी प्रारम्भिक ज्ञान ही पर्याप्त होता है।

ब्लॉगों की लोकप्रियता और अन्तर्जाल से जुड़े प्रबुद्ध वर्ग के लिए इसकी सहजता और सरलता ने प्रिन्ट माध्यम में भी इनकी चर्चा को अपरिहार्य बना दिया है। प्रायः सभी अखबारों और पत्र पत्रिकाओं द्वारा हिन्दी ब्लॉग जगत में प्रकाशित होने वाली रोचक और ज्ञान बर्द्धक जानकारी को अपने पृष्ठों में प्रमुख स्थान दिया जा रहा है। अनेक कवि, लेखक, पत्रकार, स्तम्भकार, वैज्ञानिक, समाजसेवी और अन्य प्रबुद्ध पेशों से जुड़े लोग अपनी बात रखने के लिए इस माध्यम की ओर झुक रहे हैं। इस माध्यम से ज्ञान-विज्ञान, संगीत, कला, संस्कृति, राजनीति, व्यापार, इतिहास, परिवार व समाज आदि अनेकानेक विषयों पर विचारों का आदान-प्रदान किया जा रहा है। ऐसे में पारम्परिक साहित्य के दृष्टिकोण से कुछ लोग ब्लॉग पर प्रकाशित सामग्री को साहित्य से इतर श्रेणी में रखने का विचार रख रहे हैं।

आचार्य मम्मट ने अपनी कालजयी कृति ‘काव्यप्रकाश’ के प्रथम उल्लास (खण्ड) में साहित्य के प्रयोजन की व्याख्या करते हुए बताया है कि साहित्य सृजन का उद्देश्य यश की प्राप्ति, अर्थोपार्जन, मानव व्यवहार का ज्ञान एवम्‌ अशुभ का शमन करना है। यह कार्य पत्नी के समान हितैषी और सद्‌प्रेरणा देने वाला होता है। इस दृष्टिकोण से देखा जाय तो ब्लॉग पर प्रकाशित अधिकांश सामग्री साहित्य की श्रेणी मॆं रखी जा सकती है। गुणवत्ता की दृष्टि से अच्छा और खराब कोटि का साहित्य इलेक्ट्रॉनिक और प्रिन्ट दोनो माध्यमों में समान रूप से पाया जाता है। ब्लॉग के माध्यम में चूँकि किसी प्रकार की मात्रात्मक सीमा या सम्पादकीय कैंची क्रियाशील नहीं है कदाचित्‌ इसलिए इसमें गुणवत्तायुक्त सामग्री का अनुपात थोड़ा कम हो सकता है। किन्तु इसका दूसरा पहलू यह है कि इस माध्यम में ब्लॉग लेखक को अपने विचार प्रकट करने की जो असीम और अनमोल स्वतन्त्रता मिली हुई है उससे उपजे साहित्य में एक अलग तरह की निर्दोष यायावरी और नैसर्गिक पारदर्शिता भी आ जाती है। मुक्त बाजार के नियम तो अपनी जगह हैं ही। यहाँ आना बेशक आसान है लेकिन ब्लॉग मंच पर सक्रिय बने रहना और निरन्तर आगे बढ़ते रहना उतना ही मुश्किल है। यहाँ वही जम पाएगा जिसमें दम होगा।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के प्रमुख उद्देश्यों में हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास के विविध सोपानों पर कदम मिलाकर चलते हुए इस अनुष्ठान में सक्रिय प्रतिभाग करना है। इसकी सिद्धि के लिए एक ओर जहाँ मूर्धन्य विद्वानों और मनीषियों की शोधपरक और कालजयी कृतियों को प्रकाशित कर प्रबुद्ध विद्यार्थियों और अध्येताओं को उत्कृष्ट विषय सामग्री उपलब्ध करायी जा रही है तो दूसरी ओर प्रतिभाशाली उदीयमान लेखकों और साहित्यकारों की उर्वर विचारभूमि से पैदा होने वाली नवीन रचनाओं को स्थान देकर उन्हें आम पाठक वर्ग में प्रतिष्ठित करने का प्रयास भी किया जाता है, ताकि वे बदलते युग के साथ तादात्म्य बिठाते हुए परम्परा और आधुनिकता का उत्कृष्ट सम्मिश्रण प्रस्तुत कर सकें। श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के ब्लॉग लेखों के संकलन का यह पुस्तकीय प्रकाशन इस उद्देश्य की कसौटी पर पूर्णतः खरा उतरता है।

पुस्तक: सत्यार्थमित्र (ब्लॉगपोस्ट संग्रह)
लेखक: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
प्रकाशक: हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
पृष्ठ सं. : २८८
मूल्य: रु. १९५/- मात्र

सरकारी उत्तरदायित्व के पद पर रहते हुए श्री त्रिपाठी ने व्यक्तिगत रूप में अपने आस-पास की दुनिया से संवेदना का जो रिश्ता कायम कर रखा है वह इनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकता है। “यह सरकारी ‘असरकारी’ क्यों नहीं है?” नामक पोस्ट में इनकी बेचैनी साफ झलकती है। बुजुर्ग पेंशनभोगियों की हालत बयान करती इनकी ग़ज़ल “हम हैं जिन्दा ये बताने का वक्त आया है” मन में सिहरन पैदा कर देती है। सरकारी नियम-कायदों के अनुपालन में कैसी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो सकती है इसका एक रोचक किस्सा “तिल ने जो दर्द दिया” में पढ़ने को मिलेगा। पारिवारिक और सामाजिक मुद्दों पर सिद्धार्थ जी की लेखनी बेजोड़ चलती है। “उफ़ ये मध्यम वर्ग”, “प्रकृति ने औरतों को क्या कम कष्ट दिए हैं?” और “लो, मैं आ गया सिर मुड़ाकर…” जैसे लेख इनकी प्रगतिशील सोच और रुढियों-आडम्बरों के विरुद्ध निर्भीक लेखन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। कम्प्यूटर कीऔर इन्टरनेट की दुनिया में गोते लगा रहे एक ब्लॉगर के व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में क्या परिवर्तन आ जाते हैं और उसे कैसी परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं इसकी झलक भी लेखक ने “समय कम पड़ने लगा है”, “ब्लॉगरी ने जिन्दगी बदल दी” जैसे लेखों में बखूबी दिखायी है। “किताबों की खुसर-फुसर” सुनकर उसे लिपिबद्ध कर देना एक विलक्षण प्रतिभा की ओर इशारा करता है। ‘पुराण चर्चा’ के माध्यम से श्री त्रिपाठी ने हमारे आदि ग्रन्थों में निहित अनेक रोचक और उपयोगी जानकारी खोजकर प्रस्तुत की है। ‘धुन्धकारी’ की कथा व ‘ढपोर शंख’ का आख्यान विशेष रोचक बन पड़ा है। कदाचित्‌ इसीलिए वर्तमान ब्लॉगजगत के शीर्ष पुरुष ज्ञानदत्त पाण्डेय ने शुरू में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि ‘सिद्धार्थ जी में उत्कृष्टतम ब्लॉगर बनने का पूरा रॉ-मटीरियल है।’

इस पुस्तक में जो आलेख सम्मिलित किये गये हैं वे अप्रैल २००८ से मार्च २००९ के बीच इनके नियमित ब्लॉग सत्यार्थमित्र पर प्रकाशित हुए हैं। सभी आलेख अत्यन्त रोचक, और भावपूर्ण शैली में लिखे गये हैं। गम्भीर और संवेदनशील विषय भी कहीं बोझिल नहीं हो पाये हैं। भाषा का प्रवाह और लालित्य पाठक को आद्योपान्त बाँधे रखता है। इन लेखों में जिस दुनिया की बात की गयी है वह हमारे आस-पास की सुपरिचित घरेलू दुनिया है जिसमें हम नित्य-प्रति साँस ले रहे हैं। यह पुस्तक उन साहित्य प्रेमियों के लिए विशेष उपयोगी और लाभप्रद है जो अभी इन्टरनेट की दुनिया से पूरी तरह नहीं जुड़ सके हैं। आशा है कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी के गौरवशाली प्रकाशनों की सृंखला में इस पुस्तक का सुधी पाठकों और साहित्यप्रेमियों द्वारा हृदय से स्वागत किया जाएगा।

हम इस पुस्तक के लेखक श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी को इस अनुपम कृति के प्रकाशन के अवसर पर साधुवाद देते हैं और उनके सफल और उज्ज्वल लेखकीय भविष्य की कामना करते हैं।

डॉ. एस. के. पाण्डेय
सचिव, हिन्दुस्तानी एकेडेमी
१२ डी, कमला नेहरू मार्ग, इलाहाबाद।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी

सोमवार, 13 जुलाई 2009

पुस्तक चर्चा: चन्द्रालोक परिशीलन

 

ChandraLokParishilan

   चन्द्रालोक परिशीलन
लेखिका: डॉ० स्मिता अग्रवाल
मूल्य : २५० रुपये , पृष्ठ ३४० सजिल्द


 

प्रकाशन वर्ष २००९ 

 

 

‘चन्द्रालोक’ कोई साधारण ग्रन्थ नहीं है। दस मयूखों में विभक्त यह ग्रन्थ स्वयं में अनेक काव्यशास्त्रीय आचार्यों के सिद्धान्तों के मनन-चिन्तन पूर्वक निकाला गया नवनीत है। चन्द्रालोक की शैली नवीन एवं सूत्रात्मक है, जिसके कारण कहीं-कहीं पर आचार्य अपने सिद्धान्तों को स्पष्ट करने में असमर्थ हैं। अत: उनके ज्ञान हेतु पूर्ववर्ती एवं कतिपय पश्चाद्वर्ती आचार्यों के ग्रन्थों का अवलम्बन आवश्यक है।
आचार्य जयदेव संस्कृत काव्यशास्त्रीय आचार्यों के मध्य तक एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। जयदेव न केवल आलंकारिक हैं, अपितु ध्वनिवादी आचार्य भी हैं। जयदेव की दोनों कृतियॉं चन्द्रालोक तथा प्रसन्नराघव नाटक उनकी अद्भुत कविप्रतिभा एवं विलक्षणता को प्रकट करती है। चन्द्रालोक काव्यशास्त्र का ग्रन्थ है, तो प्रसन्नराघव नाट्यविद्या का ग्रन्थ। जयदेव कवि होने के साथ सहृदय एवं तार्किक भी हैं। उन्होंने न केवल अपने पूर्ववर्ती आचार्यों की परम्परा को आगे बढ़ाया, अपितु संस्कृत-साहित्य को ‘चन्द्रालोक’ के रूप में अनूठी, गूढ़, सैद्धान्तिक कृति प्रदान की।
चन्द्रालोक में काव्यस्वरूप से सम्बद्ध प्रत्येक मयूख नवीन सिद्धान्त को प्रतिपादित करता है। मम्मट के उत्तराधिकारी के रूप में यदि आचार्य जयदेव की कल्पना की जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जयदेव ने अपने ग्रन्थ का आधार मम्मट द्वारा प्रणीत काव्यप्रकाश को ही बनाया है। आचार्य अप्पयदीक्षित जो आचार्य जयदेव के अलंकार प्रसंग से अत्यन्त प्रभावित थे तथा चन्द्रालोक के पंचम मयूख को ही आधार बनाकर उन्होंने सम्पूर्ण ग्रन्थ ‘कुवलयानन्द’ की रचना की - उन्हें ग्रहण करने का यथेष्ट प्रयास ग्रन्थ में किया गया है। (

डॉ.एस.के.पाण्डेय)

गुरुवार, 29 जनवरी 2009

एकेडेमी में पुस्तक-लोकार्पण और सम्मान समारोह सम्पन्न:

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार एकेडेमी सभागार में गत २७ जनवरी को प्रदेश के उच्च शिक्षा मन्त्री डॉ. राकेश धर त्रिपाठी ने एकेडेमी द्वारा हाल ही में प्रकाशित तीन पुस्तकों का लोकार्पण किया। इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री प्रेमशंकर गुप्त ने की।

जिन पुस्तकों का लोकार्पण किया गया उनमें एकेडेमी के सचिव डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय द्वारा सम्पादित ‘सूर्य विमर्श’ नामक ग्रन्थ भी था जिसकी चर्चा यहाँ पूर्व में की जा चुकी है। सूर्य से सम्बन्धित प्रायः सभी आयामों को छूने वाली यह हिन्दी में लिखी गयी सम्भवतः सबसे अच्छी पुस्तक है जिसे निश्चित ही भविष्य में एक सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इसके अतिरिक्त एकेडेमी द्वारा वर्ष १९३३ ई. में प्रकाशित की गयी पुस्तक ‘भारतीय चित्रकला’ का द्वितीय संस्करण (पुनर्मुद्रण) भी लोकार्पित किया गया। इस पुस्तक को तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (यू.पी.) के एक प्रशासनिक अधिकारी श्री नानालाल चमनलाल मेहता, आई.सी.एस. द्वारा लिखा गया था। लेखक ने इस पुस्तक की रचना में मैथिली शरण गुप्त, ठाकुर दलजीत सिंह राठौर और डॉ. ताराचन्द के योगदान का विशेष उल्लेख किया है। इस विषय पर हिन्दी में लिखी गयी कदाचित्‌ यह पहली पुस्तक है जो भारतीय चित्रकला के सम्बन्ध में मौलिक जानकारी प्रदान करती है।



किन्तु जिस पुस्तक ने एकेडेमी के प्रकाशन इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर सबको अचम्भित कर दिया है वह है डॉ. कविता वाचक्नवी द्वारा एक शोध-प्रबन्ध के रूप में अत्यन्त परीश्रम से तैयार की गयी कृति “समाज-भाषाविज्ञान; रंग-शब्दावली: निराला-काव्य”। इस सामग्री को पुस्तक का आकार देने के सम्बन्ध में एक माह पूर्व तक किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। स्वयं लेखिका के मन में भी ऐसा विचार नहीं आया था। लेकिन एकेडेमी के सचिव ने संयोगवश इस प्रकार की दुर्लभ और अद्‌भुत सामग्री देखते ही इसके पुस्तक के रूप में प्रकाशन का प्रस्ताव रखा जिसे सकुचाते हुए ही सही इस विदुषी लेखिका द्वारा स्वीकार करना पड़ा। कदाचित्‌ संकोच इसलिए था कि दोनो का एक-दूसरे से परिचय मुश्किल से दस-पन्द्रह मिनट पहले ही हुआ था। यह नितान्त औपचारिक मुलाकात अचानक एक मिशन में बदल गयी और देखते ही देखते मात्र पन्द्रह दिनों के भीतर न सिर्फ़ बेहद आकर्षक रूप-रंग में पुस्तक का मुद्रण करा लिया गया अपितु एक गरिमापूर्ण समारोह में इसका लोकार्पण भी कर दिया गया। रंग शब्दों को लेकर हिन्दी में अपनी तरह का यह पहला शोधकार्य है। इसके साथ ही साथ महाप्राण निराला के कालजयी काव्य का रंगशब्दों के आलोक में किया गया समाज-भाषावैज्ञानिक अध्ययन भावी शोधार्थियों के लिए एक नया क्षितिज खोलता है। निश्चय ही यह पुस्तक हिदी साहित्य के अध्येताओं के लिए नयी विचारभूमि उपलब्ध कराएगी।



इस समारोह में एकेडेमी की ओर से हिन्दी, संस्कृत एवम उर्दू के दस लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों को सम्मानित भी किया गया। यद्यपि इनमें से डॉ. दूधनाथ सिंह, डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा, डॉ. अली अहमद फ़ातमी और श्री एम.ए.कदीर अलग-अलग व्यक्तिगत, पारिवारिक या स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से उपस्थित नहीं हो सके, तथापि सभागार में उपस्थित विशाल विद्वत्‌ समाज के बीच छः विद्वानों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए शाल, नारियल, व सरस्वती की अष्टधातु की प्रतिमा भेंट कर सम्मानित किया गया। प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किए गए। एकेडेमी द्वारा अन्य अनुपस्थित विद्वानों के निवास स्थान पर जाकर उन्हें सम्मान-भेंट व प्रमाण-पत्र प्रदान कर दिया जाएगा।
इस अवसर के कुछ यादगार क्षण हमने कैमरे में कैद किए सिर्फ़ आपके लिए-

IMG_4843सचिव द्वारा अतिथियों का स्वागत


IMG_4847लोकार्पण: समाज-भाषाविज्ञान रंग-शब्दावली: निराला काव्य


IMG_4849लोकार्पण: भारतीय चित्रकला


IMG_4862सम्मानित: प्रो. चण्डिका प्रसाद शुक्ल


IMG_4866सम्मानित: डॉ. मोहन अवस्थी


IMG_4870सम्मानित: प्रो. मृदुला त्रिपाठी


IMG_4872 सम्मानित: डॉ. विभुराम मिश्र


IMG_4881सम्मानित: डॉ. किशोरी लाल


IMG_4875सम्मानित: डॉ. कविता वाचक्नवी


IMG_4889गुरुजनों के गुरु: प्रो. चण्डिका प्रसाद शुक्ल का सम्बोधन


IMG_4904डॉ. कविता वाचक्नवी के भावुक क्षण


IMG_4917मन्त्र-मुग्ध श्रोता


IMG_4919चमत्कृत दर्शक


IMG_4926ताकि सनद रहे...!


IMG_4935एकेडेमी के कोषाध्यक्ष द्वारा आभार-ज्ञापन


पुस्तक परिचय:
समाज-भाषाविज्ञान रंग-शब्दावली : निराला-काव्य
लेखिका- डॉ. कविता वाचक्नवी
पृष्ठ-२३१ मूल्य- रु.१५०/-

भारतीय चित्रकला
लेखक- नानालाल चमनलाल मेहता, आई.सी.एस.
पृष्ठ- १४४ मूल्य- रु.१५०/-

सूर्य विमर्श
सम्पादक- डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय
पृष्ठ-३२४ मूल्य- रु.१७५/-

प्रकाशक:
हिन्दुस्तानी एकेडेमी
१२, कमला नेहरू मार्ग
इलाहाबाद, .प्र.
२११००१
दूरभाष- ०५३२-२६००६२५


प्रस्तुति-
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
कोषाध्यक्ष- हिन्दुस्तानी एकेडेमी

Related Posts with Thumbnails