हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जन सूचना अधिकार का सम्मान

जनसूचना अधिकारी श्री इंद्रजीत विश्वकर्मा, कोषाध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी,इलाहाबाद व मुख्य कोषाधिकारी, इलाहाबाद। आवास-स्ट्रेची रोड, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद कार्यालय-१२ डी,कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
प्रथम अपीलीय अधिकारी श्री प्रदीप कुमार्, सचिव,हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व अपर जिलाधिकारी(नगर्), इलाहाबाद। आवास-कलेक्ट्रेट, इलाहाबाद कार्यालय-१२डी, कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
दूरभाष कार्यालय - (०५३२)- २४०७६२५
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शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

बीसवीं शताब्दी हाशिए की शताब्दी थी: विभूति नारायन राय

जन्मशती उत्सव कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए कुलपति का उद्‌बोधन

इस वर्ष हिंदी के चार महान कवियों के जन्म के सौ साल पूरे हुए हैं। शमशेर, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन अब से सौ साल पहले पैदा हुए। उनका जीवन बीसवीं सदी का साक्षी रहा। उन्होंने जो कुछ लिखा उसमें उनके देश और काल की छाया स्वाभाविक रूप से परिलक्षित होती है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा इन चार कवियों की जन्मशती मनाने के बहाने बीसवी सदी का सिंहावलोकन करने के उद्देश्य से साहित्यिक गोष्ठियों की एक शृंखला प्रारम्भ किया जा रहा है। ये कार्यक्रम देश के विभिन्न शहरों में आयोजित होंगे। समापन कार्यक्रम दिल्ली में होगा।  इसी शृंखला का उद्घाटन कार्यक्रम आज गांधी-जयंती के अवसर पर वर्धा स्थित विश्वविद्यालय प्रांगण में आयोजित हुआ।

उद्‌घाटन सत्र की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध समालोचक निर्मला जैन ने किया और उद्घाटन वक्तव्य विश्वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह ने दिया। वक्ताओं द्वारा चारो कवियों की तुलनात्मक चर्चा की गयी। इस ब्लॉग की पिछली दो पोस्टें उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान ‘लाइव’ (यहाँ और यहाँ) प्रकाशित की गयीं।

DSC03350विषय प्रवर्तन- विभूति नारायण राय 

DSC03352 नामवर सिंह व निर्मला जैन

सबसे पहले विषय प्रवर्तन करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने इस कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए बताया कि कोई भी रचना न सिर्फ़ इसके रचनाकार के व्यक्तित्व का आइना होती है बल्कि उसके देश-काल के बारे में भी बहुत कुछ बताती है। साहित्यकार अपने समाज और देश-काल के बारे में बहुत संवेदनशील होता है, इसलिए उसकी कृतियाँ उसके समय का ऐतिहासिक दस्तावेज होती हैं। इन चार कवियों के रचना संसार में विचरण करते हुए हम बीसवीं सदी  में भी विचरण कर रहे होते हैं। इस प्रकार इस पूरे कार्यक्रम का एक उद्देश्य तो हिंदी साहित्य के इन चार महान विभूतियों व उनके रचनाकर्म के प्रति सम्मान की भावना को रेखांकित करने का है तो दूसरा उद्देश्य बीसवीं शताब्दी की प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास भी है।

बीसवीं शताब्दी को यदि एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं उसे हाशिए की शताब्दी कहना चाहूंगा। इस सदी में उपनिवेशवाद का अंत हुआ, लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ स्थापित हुईं और सदियों से समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग- जैसे दलित, आदिवासी और स्त्रियाँ- पहली बार मनुष्य का जीवन जीने का अवसर पा सके। इससे पहले हाशिए पर अटके लोगों के मानवाधिकार समाज के प्रभु वर्ग द्वारा अपहृत कर लिए गये थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई और विश्व मानवाधिकारों के चार्टर की घोषणा हुई तो मानव सभ्यता को जो उपहार मिला वह किसी भी धार्मिक पुस्तक से नहीं मिल पाया था।

इस कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण में नामवर जी ने बीसवी सदी को सर्वाधिक क्रांतिकारी घटनाओं की शताब्दी बताया। ऐसी शताब्दी जिसमें दो-दो विश्वयुद्ध हुए, विश्व की शक्तियों के दो ध्रुव बने, फिर तीसरी दुनिया अस्तित्व में आयी। समाजवाद का जन्म हुआ। सदी का अंत आते-आते इन ध्रुवो के बीच की दूरी मिटती गयी। तीसरी दुनिया भी बाकी दुनिया में मिलती गयी और समाजवाद प्रायः समाप्त हो गया। नामवर जी ने नागार्जुन की प्रशंसा करते हुए कहा कि बाबा ने काव्य के भीतर बहुत से साहसिक विषयों का समावेश कर दिया जो इसके पहले कविता के संभ्रांत समाज में वर्जित सा था। दलितों, म्लेच्छों, वंचितों और शोषितों को उन्होंने अपनी कविता में पिरोकर प्रभु वर्ग के सामने खड़ा कर दिया। चमरौंधा जूता पहनाकर ए.सी. ड्राइंग रूम में घुसा दिया। ऐसे पात्र इससे पहले प्रेमचंद की कहानियों में ही पाये जाते थे। नागार्जुन के दोहे सुनाकर उन्होंने दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

खड़ी हो गयी चाँपकर कंकालों की हूक।

नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक॥

जली ठूठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक

बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक

कार्यक्रम में निर्मला जैन ने अध्यक्षीय भाषण दिया जिसका संक्षिप्त व्यौरा पिछली ‘लाइव’ पोस्ट में दे चुका हूँ।

अभी प्रथम दिवस का दूसरा सत्र चल रहा है जो अज्ञेय पर केंद्रित है। इस सत्र के प्रमुख वक्ता हैं- प्रो. गंगा प्रसाद विमल, राजकिशोर, प्रो. बलराम प्रसाद त्रिपाठी, सुरेन्द्र वर्मा, डॉ. विजय शर्मा, डॉ. कृपाशंकर चौबे, मनोज कुमार पांडेय, शशिभूषण। कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के रीडर शंभू गुप्त जी कर रहे हैं।

 

DSC03364द्वितीय सत्र में मंचासीन- (दाएँ से) राजकिशोर, कृपाशंकर चौबे, सुरेंद्र वर्मा, गंगा प्रसाद विमल, बलराम प्रसाद त्रिपाठी, शम्भू गुप्त 

DSC03365

विपुल दर्शक दीर्घा- कुलपति विभूति नारायण राय (कुर्ते में) राजकिशोर जी को सुनते हुए।

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

चिट्ठाकारी संगोष्ठी में घूमता कैमरा

उद्‌घाटन सत्र की झलकियाँ

 

एकेडेमी में आपका स्वागत हैएकेडेमी में आपका स्वागत है...
लाइव टेस्टिंग-माइक टेस्टिंगलाइव टेस्टिंग- माइक टेस्टिंग
संचालक-सह-संयोजकसंचालक/सह-संयोजक:  सिद्धार्थ
आओ दीप जलाएंआओ दीप जलाएं ...
माल्यार्पण शारदे सारस्वत माल्यार्पण
संतोष भदौरिया-संयोजकमुख्य अतिथि का माल्यार्पण-संतोष भदौरिया (संयोजक)
माला की ले-देवी.एन.राय (अध्यक्ष)
माला की हलचलज्ञानदत्त पाण्डेय- विशिष्ट अतिथि
रवि उवाचरवि रतलामी की प्रस्तुति
नामवर सा कोई नहींनामवर सिंह- उद्‌घाटन भाषण
इन्हें पहचानिएब्लॉगर ही ब्लॉगर
विमोचन ‘सत्यार्थमित्र’विमोचन ‘सत्यार्थमित्र’
पीछे तक ब्लॉगरपीछे भी ब्लॉगर
वी.एन.राय, नामवर सिंह, सिद्धार्थ, राकेश जीवी.एन.राय, नामवर सिंह, सिद्धार्थ, राकेश जी
 कुलपति जी कुलपति जी का अध्यक्षीय उद्‌बोधन
आगे भी ब्लॉगरगे भी ब्लॉगर
मस्त सभागारएक महिला ब्लॉगर पीछे
मीडिया से मुखा़तिब लेखकमीडिया से मुख़ातिब ब्लॉगर/लेखक
ब्लॉग पाँचवाँ स्तम्भ ब्लॉग: पाँचवाँ स्तम्भ
धन्यवाद ज्ञापन धन्यवाद ज्ञापन: संतोष भदौरिया
लन्च ब्रेकभोजनावकाश

 

कुछ अनौपचारिक छवियाँ- इधर-उधर से:

   यूँ तो कैमरे ने बहुत सी तस्वीरें खींच लीं, लेकिन उनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं ताकि हम इन्हें जब जी चाहें देखकर ताजा हो लें। (चित्र परिचय कर्सर को चित्र पर लेजाकर रोकने से मिल सकता है।)

अच्छी कम्पनी 
अजित जी याद रखिएगा
अनूप,प्रियम्कर,सिद्धार्थ
अफ़लातून जी के साथ
अफ़लातून, मनीषा, अनूप, प्रियंकर
अभी रिपोर्ट भेंजनी है
अरविन्द, गिरिजेश, सिद्धार्थ
अरुण प्रकाश, डॉ.अरविन्द, गिरिजेश राव
अविनाश का आउटसोर्स
अविनाश-समरेन्द्र
आज नाश्ता क्या है...
इरफ़ान, मनीषा और भूपेन
कुछ चर्चा हो ले
कृपया ध्यान दें
गम्भीर चर्चा
गिरिजेश भ‌इया, आपभी
प्रियंकर जी मसिजीवी के साथ
चौचक-चर्चा
जाकिर और मीनू खरे
जाकिर जी याद रखना
तल्लीन हैं हम
फीता काटें, विमोचन हो ले
पत्रकार क्या करें..
पूड़ी-कचौड़ी
प्राइमरी का मास्टर और अमिताभ त्रिपाठी
मनीषा, अनूप, प्रियंकर
ये स्मृति हर्ष जी की
लाइव रिपोर्टिंग
लन्च ब्रेक
वह मच्छरों वाला कमरा
संजय तिवारी‘विस्फोट’
स्टूडेन्ट गैलरी

संकलन और प्रस्तुति: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

 

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