हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जन सूचना अधिकार का सम्मान
जनसूचना अधिकारीश्री इंद्रजीत विश्वकर्मा,कोषाध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी,इलाहाबाद व मुख्य कोषाधिकारी, इलाहाबाद।
आवास-स्ट्रेची रोड, सिविल लाइन्स, इलाहाबादकार्यालय-१२ डी,कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
प्रथम अपीलीय अधिकारी
श्री प्रदीप कुमार्,
सचिव,हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व अपर जिलाधिकारी(नगर्), इलाहाबाद।आवास-कलेक्ट्रेट, इलाहाबादकार्यालय-१२डी, कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
हिन्दुस्तानी एकेडेमी की स्थापनाहिन्दुस्तानी (हिन्दीऔरउर्दू) भाषाकोविकासकीसीढ़ियोंपरलेजानेवालेसभीसार्थकप्रयासोंकोएकऐसामंचदेनेकेउद्देश्यसेहुईथीजहाँमौलिकप्रतिभाओंकोअपनीरचनाधर्मिताकोप्रकाशितकरानेकाअवसरमिलेऔरविद्वानों-मनीषियोंकेशोधपरककार्योंकोसामान्यविद्यार्थियों, अध्येताओंऔरसाहित्यानुरागियोंकेउपयोगहेतुसहजढंगसेउपलब्धकरायाजासके।इनउद्देश्योंकीपुर्तिकेलिएएकेडेमीद्वाराकरीबडेढ़सौअमूल्यपुस्तकों का प्रकाशनकियागयाहैऔरसाहित्यिकगोष्ठियों, व्याख्यानमालाओं, सेमिनारऔरप्रतिभासम्मानसमारोहोंकाआयोजनअनवरतकियाजातारहाहै।
अपनीइसीउत्कृष्टपरम्पराकेनिर्वहनकेक्रममेंहिन्दुस्तानीएकेडेमीद्वारामहात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धाकेसौजन्यसेहिन्दीब्लॉगिंगकेसम्बन्धमेंएकराष्ट्रीयस्तरकेसेमिनारकाआयोजनआगामी२३-२४ अक्टूबर, २००९कोकियाजारहाहै।इसअवसरपरदेशभरसेअनेकचिठ्ठाकारोंकोआमन्त्रितकरअभिव्यक्तिकेइसनयेमाध्यमकेइतिहास, स्वरूपऔरप्रमुखप्रवृत्तियोंपरदोदिवसीयचर्चाकीजाएगी।इसअवसरपरपारम्परिकसाहित्यजगतकेअनेकप्रतिष्ठितविद्वानभीप्रतिभागीहोंगे।
इस अवसर पर एकेडेमी द्वारा एक पुस्तक का प्रकाशन कर उसके तत्समय लोकार्पण का निर्णय भी लिया गया है जिसमें लगभग पचास चिठ्ठाकारों की चुनी हुई एक-एक ब्लॉग पोस्टों को सम्मिलित कर एक प्रतिनिधि संकलन तैयार किया जाएगा। इसके लिए हिन्दी ब्लॉगर्स से प्रविष्टियाँ आमन्त्रित की जाती हैं। एक ब्लॉगर से केवल एक प्रविष्टि ही स्वीकार की जाएगी। हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा गठित सम्पादक मण्डल प्रविष्टियों के चयन पर विचार करेगा जिसकी संस्तुतियों के आधार पर पुस्तक का अन्तिम रूप निर्धारित किया जाएगा। एकेडेमी के ई-मेल पते (hindustaniacademy@gmail.com) पर अपनी प्रविष्टियाँ दिनांक ५.१०.२००९ की मध्यरात्रि तक अवश्य प्रेषित कर दें।
चिठ्ठाकार मित्रों द्वारा पुस्तक के शीर्षक व आवरण पृष्ठ के सम्बन्ध में यदि कोई सुझाव दिया जाता है तो उसका भी स्वागत है। यह पुस्तक हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से प्रिन्ट माध्यम के लिए एक अनुपम भेंट हो, यही हमारी आकांक्षा है। सचिव - हिन्दुस्तानी एकेडेमी
प्रयाग की हिन्दी संस्थाओं हिन्दी साहित्य सम्मेलन व हिन्दुस्तानी एकेडेमी तथा हिन्दी के मूर्धन्य विद्वानों एवं लेखकों ने हिन्दी को समृद्ध, समुन्नत व लोकप्रिय बनाने में महती भूमिका निभाई है। पिछलीपोस्टमें आपने ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी ’के बारे में जाना। आज प्रस्तुत है हिन्दीसाहित्यसम्मेलनका संक्षिप्त परिचय:
२. हिन्दीसाहित्यसम्मेलन
हिन्दीकीउन्नतिवप्रचार-प्रसारकेउद्देश्य से नागरी प्रचारिणी सभा के तत्त्वावधान में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना 1 मई, 1910 ई0 (संवत् 1967) कोकाशीमेंहुईथी।प्रयागमेंपहलेइसकाकार्यालयअहियापुर(वर्तमान मालवीय नगर)में था। महामना पं0मदनमोहनमालवीयजीकेसभापतित्वमेंइसकाप्रथम सम्मेलन10 अक्टूबर 1910 को काशी में हुआ। इस अधिवेशन में राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन हिन्दीसाहित्यसम्मेलन के प्रथम मन्त्री बनाए गए।
हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संस्थापक सदस्यों में पं. मदन मोहन मालवीय, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन, पं. गोविन्द नारायण मिश्र, डा. राजेन्द्रप्रसाद, पं. राम नारायण मिश्र, पं. जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, आचार्य रामचन्द्रशुक्ल, शिवप्रसाद गुप्त व पं. सुधाकर द्विवेदी प्रमुख थे।
हिन्दी साहित्य सम्मेलन के मुख्यउद्देश्य इस प्रकार निरूपित किए गए -
1.हिन्दी के सर्वांगीण उन्नति का प्रयास करना।
2.देवनागरी लिपि का देश भर में प्रचार-प्रसार करना।
3.हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना।
4.हिन्दी को सुगम, सरल व लोकप्रिय बनाना।
5.हिन्दी साहित्य के विद्वानों को समर्थ व योग्य बनाना।
6.हिन्दी की उच्चस्तरीय परीक्षाओं का आयोजन करना।
प्रयाग में 1911 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का द्वितीय अधिवेशन सम्पन्न हुआ। इसके सभापति थे पं.गोविन्दनारायणमिश्र। इनके अतिरिक्त अब तक जिन लब्धप्रतिष्ठ हिन्दी विद्वानों को सम्मेलनके अधिवेशनों में सभापति बनने का गौरव प्राप्त हुआ है उनमें उल्लेखनीय नाम इस प्रकार हैं:-
बाबू श्याम सुन्दर दास, महामहोपाध्याय पं. रामावतार शर्मा, मोहनदास करमचन्दगांधी, डा. भगवानदास, राजर्षि पुरूषोत्तमदास टण्डन, पं. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, पं. जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, पं. गौरीशंकर हीराचन्द्रओझा, श्री गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू जगन्नाथदास रत्नाकर, डा. राजेन्द्र प्रसाद, पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर, पं. अम्बिका प्रसाद बाजपेयी, डा. सम्पूर्णानन्द, डा. अमरनाथ झा, पं. माखन लाल चतुर्वेदी, श्री के.एम. मुंशी, श्री वियोगी हरि, महापण्डित राहुल सांकृत्यायन, आचार्य चन्द्रबलीपाण्डेय, श्री जयचन्द्रविद्यालंकार आदि।
सम्मेलन ने सन् 1918 में हिन्दीविद्यापीठ की स्थापना की। टण्डन जी इसके प्रथम प्रधानाचार्य थे। इसमें प्रथमा, मध्यमा(विशारद) और उत्तमा (साहित्य रत्न) की उपाधि प्रदान की जाती थी। वर्तमान में यह विद्यापीठइण्टरमीडिएटकालेजके रूप में परिवर्तित हो गया है। अब यह यमुना नदी के उस पार महेवा ग्राम में लगभग 55 एकड़ भूमि पर स्थित है। उपरोक्त परीक्षा उपाधियों के अतिरिक्त वर्तमान समय में सम्मेलन संगीत विशारद, संगीत मार्तण्ड, आयुर्वेद रत्न, आयुर्वेद विशारद, विज्ञान रत्न आदि उपाधियों के लिए परीक्षाओं का संचालन करता है।
सम्मेलन में स्थापित हिन्दी संग्रहालय का उद्घाटन 1936 में महात्मा गांधी ने किया था। इस संग्रहालय में लगभग 69,000 पुस्तकें हैं। साथ ही साथ हजारों बहुमूल्य व दुर्लभ हस्तलिखित पाण्डुलिपियाँ भी सुरक्षित हैं। हिन्दी संग्रहालय में एक पुस्तकालय भी है जिसमें लगभग 17,000 पुस्तकें हैं। इस पुस्तकालय में शोधार्थियों को पढ़ने की विशेष सुविधा है।
सम्मेलन का अपना मुद्रणालय भी है। जिसमें हिन्दी व संस्कृत की सैकड़ों पुस्तकें मुद्रित हो चुकी हैं। मुद्रणालय से मुद्रित प्रमुख पुस्तकों में मानकहिन्दीकोश, मानक अंग्रेजी-हिन्दी कोश, तेलगू-हिन्दी शब्दकोश, कन्नड़-हिन्दी शब्दकोश, मत्स्य पुराण, ब्रह्मपुराण, वायुपुराण, अग्निपुराण, बृहन्नारदीय पुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, सूरपद पंचशती, बिहारी वैभव, मानस में रीति तत्त्व, श्लेष अलंकार सिद्धान्त एवं प्रयोग, सनेही रचनावली, आचार्य सायण और माधव, आधुनिक कविमाला भाग-1 से भाग-23 तक, ब्रजमाधुरीसार, कबीर संग्रह, प्रेमधन सर्वस्व, हिन्दी विधि शब्दावली, पालि साहित्य का इतिहास, हिन्दी आन्दोलन जातक भाग-1 से भाग 6 तक, आयुर्वेदकाइतिहास उल्लेखनीय है।
वर्तमान में सम्मेलनभवन जहाँ पर स्थित है उसकी भूमि 1920 ई. में नगर महापालिका से प्राप्त हुई। इस स्थान पर सम्मेलन का कार्यालय 1923 से प्रारम्भ हुआ।
सम्मेलनद्वाराहिन्दीभाषावसाहित्यकेप्रचारप्रसारवहिन्दीमें शोधकार्यकोबढ़ावादेनेकीदृष्टिसे‘राष्ट्र-भाषा सन्देश’पाक्षिक पत्र का प्रकाशन किया जाता है। जबकि त्रैमासिक शोध पत्रिका के रूप में ‘सम्मेलन पत्रिका’ का प्रकाशन 1913 से ही किया जा रहा है। सम्मेलन पत्रिका के आदि सम्पादक गिरिजाकुमारघोष थे। हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा विगत 34 वर्षों से सम्मेलनदैनन्दिनी का प्रकाशन किया जा रहा है। दैनन्दिनी के प्रथम पृष्ठ पर भारतेन्दुहरिश्चन्द्रका यह दोहा अंकित रहता है-
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।।
सम्मेलन द्वारा विद्वानों को मानद उपाधि से अलंकृत भी किया जाता है। जैसे: साहित्यवाचस्पति, विधि वाचस्पति, साहित्य महोपाध्याय, संस्कृत महोपाध्याय।
साहित्यवाचस्पति उपाधि से सम्मानित कुछ विद्वानों के नाम इस प्रकार हैं - श्रीपदुमलालपुन्नालालबक्शी, श्री सुमित्रानन्दन पन्त, श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी, श्री वृन्दावनलाल वर्मा, आचार्य विनोवा भावे, आचार्य काकाकालेकर, पं. श्री नारायण चतुर्वेदी, डॉ. धीरेन्द्रवर्मा, श्री जैनेन्द्रकुमार, डॉ. नगेन्द्र, श्री अमृतलाल नागर आदि।
सम्मेलन की ओर से विधिवाचस्पतिकी उपाधि श्रीलक्ष्मीमलसिंधवी, साहित्यमहोपाध्याय की उपाधि डा0 विश्वनाथ मिश्र, श्री कवि वैरागी, संस्कृतमहोपाध्यायकी मानद उपाधि डा0 चंद्रिका प्रसाद शुक्ल, डॉ. सुरेश चन्द्रपाण्डेय, पं. तारिणीश झा, पं. रेवा प्रसाद द्विवेदी आदिकोदियागयाहै।
श्री पद्म सिंह शर्मा, प्रो. सत्यकेतु, डॉ. गोरखप्रसाद, श्री जयशंकर प्रसाद, रामचन्द्रशुक्ल, वासुदेव उपाध्याय, श्रीमती महादेवी वर्मा, आचार्य बलदेव उपाध्याय, डॉ.वासुदेवशरण अग्रवाल, श्री यशपाल, श्री नरेश मेहता, डॉ. गोविन्द चन्द्रपाण्डेय, डॉ. विद्यानिवासमिश्रआदि।
हिन्दीसाहित्यसम्मेलनने दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार व उन्नयन में उल्लेखनीय योगदान किया है। इसी क्रम में सम्मेलन के अनेक अधिवेशन दक्षिण भारत के महानगरों में आयोजित किए गए। जैसे 1937 में मद्रास, 1949, 1977 व 2005 में हैदराबाद, 1997 में तिरूपति, 2000 में बैंगलोर, 2001 में गोवा, 2002 में तिरूवनन्तपुरम।इससेएकओरजहाँदक्षिणभारतमेंहिन्दीको फूलने-फलनेकाअवसरमिलाहैवहीं राष्ट्रीयएकताऔरअखण्डताकोसुदृढ़ करनेवालीकड़ीकेरूपमेंभीहिन्दीसुस्थापितहुईहै।
इसी प्रकार हिन्दीतर क्षेत्रों के हिन्दी विद्वानों को सम्मानित कर के भी सम्मेलन ने हिन्दी को सर्वमान्यता, व्यापकतावस्वीकार्यताप्रदानकरने काकार्यकियाहै।ऐसेविद्वानोंमेंप्रमुखहैं:-
श्री जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन, श्री मोट्टरि सत्यनारायण, श्री जी. सुन्दर रेड्डी, डॉ. कर्णराज शेष गिरिराव, डॉ. एम. शेषन, डॉ. एम. के. वेलायुधन नायर, डॉ. श्रीमती राधाकृष्णमूर्ति, श्रीत्रिलोचनपाणिग्रही, श्री अर्जुन सत्पथी, श्री कृ.पा. पाटील, प्रो. आर. जनार्दनन पिल्लै, डॉ. वी0पी0 मुहम्मद कुजमेत्तर, डॉ. वी. गोविन्द शेनाय, प्रो. कण्ठमूर्ति आदि।
‘‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग भारत की ऐसी संस्था है जो अपनी व्यापकता और लोकप्रियता में कभी राष्ट्रीय कांग्रेस के बाद दूसरा स्थान रखती थी।’’
सम्मेलन ने अपना प्रेक्षागृह ‘‘राजर्षि टण्डन मण्डपम्’’का भी निर्माण परिसर में ही किया है। 2008में हिन्दीसाहित्यसम्मेलन के सत्रसभापतिडॉ. राममूर्तित्रिपाठीवप्रधानमंत्रीश्रीविभूतिमिश्रजीहैं।