हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जन सूचना अधिकार का सम्मान

जनसूचना अधिकारी श्री इंद्रजीत विश्वकर्मा, कोषाध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी,इलाहाबाद व मुख्य कोषाधिकारी, इलाहाबाद। आवास-स्ट्रेची रोड, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद कार्यालय-१२ डी,कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
प्रथम अपीलीय अधिकारी श्री प्रदीप कुमार्, सचिव,हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद व अपर जिलाधिकारी(नगर्), इलाहाबाद। आवास-कलेक्ट्रेट, इलाहाबाद कार्यालय-१२डी, कमलानेहरू मार्ग, इलाहाबाद
दूरभाष कार्यालय - (०५३२)- २४०७६२५

Saturday, October 2, 2010

नामवर सिंह ने अज्ञेय को साहित्य क्षेत्र का नेहरू बताया था- निर्मला जैन

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प्रसिद्ध समालोचक निर्मला जैन ने अपनी टिप्पणी से सभागार में ठहाके लगवा दिए जब उन्होंने नामवर जी के सामने ही यह कहा कि एक बार नामवर जी यह लिखा था कि राजनीति के क्षेत्र में जो नेहरू युग है वही साहित्य के क्षेत्र में अज्ञेय युग है। जब उन्होंने नामवर जी से इसकी पुष्टि चाही तो वे चुप्पी लगा गये। निर्मला जी ने कहा कि यह तो कूटनीति से प्रेरित चुप्पी है जिसे आप स्वीकृति के रूप में ही लें।

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निर्मला जी के उद्गार;

चारो कवियों में केदार सबसे अधिक स्थानीय कवि थे। बाकी तीनो कवि विकट यायावर थे। केदार गार्हस्थ्य प्रेम के कवि थे। अपनी पत्नी को प्रेयसी के रूप में निरूपित किया। वस्तुतः वे उनकी प्रथम श्रोता/पाठक थीं। उनमें गहन इंद्रीय बोध है।

स्त्री विमर्श की दृष्टि से इन कवियों को फिर से देखा जाना चाहिए।

समय की चमक के नीचे की धातु की पहचान करना अधिक महत्वपूर्ण है।

विचारधारा से युक्त होने और मुक्त होने का समय है। इसकी समीक्षा भी होनी चाहिए। विचारधारा के संतुलन के बिना अच्छी रचना संभव नहीं है।

चारो में सबसे गंभीर चिंतन अज्ञेय का है। आलोचना की भाषा अज्ञेय ने दी। करीने से, नफ़ासत से, तरतीब से रचने की कला अज्ञेय के पास थी।  

हिंदी संग्रहालय एवं अभिलेखागार की वेबसाइट का उद्घाटन: (१:१० pm)

प्रसिद्ध उपन्यासकार सुरेंद्र वर्मा ने विश्वविद्यालय की ओर से स्थापित गये हिंदी संग्रहालय की वेबसाइट (www.archive.hindivishwa.org) का बटन दबाकर उद्घाटन किया। इस संग्रहालय में हिंदी साहित्यकारों के हस्तलिखित पत्र, रचनाएँ, निजी चित्र इत्यादि का संग्रह किया गया है। अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रवेशांक भी विशेष आकर्षण हैं।

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यह पोस्ट इस कार्यक्रम के दौरान ही तैयार करते हुए प्रकाशित की गयी है। इसमें सजीव प्रसारण के तत्व तो हो सकते हैम लेकिन एक सातत्य की कमी भी दिखायी दे सकती है। कृपया इसे इसी रूप में देखें।(सिद्धार्थ)

2 comments:

  1. `नामवर जी से इसकी पुष्टि चाही तो वे चुप्पी लगा गये'

    आजकल शायद नामवरजी ऊंचा सुनने लगे है.... आयु जो ठहरी :)

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  2. बधाई! वेबसाइट अभी एक ही पोस्ट तक सीमित है!

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